3/11/2007

दीपा मेहता का जल, पानी, वाटर व्‍हॉटेवर

गंवई हरियाली के सुहानेपन के तीन-चार एस्टैबलिशिंग शॉट्स. यहां से वहां तक हरे पत्‍ते तैर रहे हैं. पानी में. छिपा है लेकिन दिखला दिया गया है. कोई प्रतीकात्‍मक उद्देश्‍य होगा तो वह पूरा हो गया है. फिल्‍म शुरु हो गई है. बैकग्राउंड में बैलगाडी हर्र-हर्र अपनी मंजिल को कुलांचे भर रही है (थोडी देर में मंजिल पहुंचने के बाद मैसेज मिलेगा कि मंजिलें और भी हैं). क्‍लोज़र कट. सात-आठ साल की लहंगे में हरी-भरी दक्षिण भारतीय बच्‍ची चाव से ईख चाभ रही है. बगल में एक अचेतन आदमी की ठूंठ लेटी हुई. बेजान पैरों का शॉट. बच्‍ची और हाथ आई स्थिति को चिंता से देखती बंगालन मां का क्‍लोज़-अप. उसके बाद पिता. चिंताग्रस्‍त वह भी हैं मगर थोडा अंडरस्‍टेटेड तरीके से. डॉली आहलू‍वालिया के कॉस्‍ट्यूम में यूपी वाले लगते हैं. नेक्‍स्‍ट. घाट के अंधियारे में पीछे जलती लाशों की रोशनी. छोटी बच्‍ची को पिता सूचित करता है कि ठूंठ रुपी उसके स्‍वामी ने प्राण-पखेरु छोड दिये हैं, वह अब बिधवा हो गई है. बच्‍ची के बाल पर कैंची के शॉट्स. तीन-चार एंगल से. फिर उस्‍तरा. सफेद धोती. बच्‍ची को आगे की फिल्‍म का कॉस्‍ट्यूम मिल गया है. अंदर अंधेरे से रंगी मनहूस इमारत का प्रवेश द्वार. पर्दे पर इंडिया, 1938 का कैप्‍शन आया है. मंजिल आ गई है. मां-पिता बेटी से विदा लेने की भूमिका बांध रहे हैं. आज के बाद यही उसका घर होगा. बच्‍ची ने राजी-खुशी से सिर मुंडवा लिया था (दर्शक समझ गए थे कि बच्‍ची एट्टीच्‍यूड वाली नहीं है, आज्ञा मानती है) लेकिन अबकी लडकी इधर-उधर भागती है, प्रोटेस्‍ट करती है. बिधवाआश्रम के निरीह, असहाय, पोपले बंगाली चेहरों के क्‍लोज़ शॉट्स. एक बैड टाईप ने बच्‍ची को घेर लिया है. एक मासूम बच्‍ची रुढ और राक्षसी परंपरा की ज़द में कैद कर ली जाने वाली है. सितार की करुणा का बिल्‍ड-अप. इस राक्षसी जाल से बंगालन मां और यूपी वाले बाप की दक्षिण भारतीय अनेकता में एकता वाली बच्‍ची को कौन मुक्ति दिलायेगा की भोली जिज्ञासा प्‍लस एआर रहमान के तीन कर्णप्रिय गाने और जाइल्‍स नटगेंस की एक्‍ज़ोटिक सिनेमाटॉग्राफी की संगत में आप आगे दीपा मेहता के फिल्‍मी जल में डुबकी लगाते रह सकते हैं.

चूंकि डेविड धवन और हैरी बवेजाओं को हम सीरियसली नहीं लेते (वे भी नहीं लेते). मगर दीपा मेहता अपने को लेती हैं. सीरियस आर्टिस्‍टों वाले एक्‍सप्रेशन के साथ फोटो-सोटो खिंचवाती रहती हैं. उनकी फिल्‍म श्रेष्‍ट विदेशी फिल्‍म वाली ऑस्‍कर कैटेगरी में नामांकित भी हो जाती है, तो आईये, ज़रा हम भी उनकी फिल्‍म के बारे में सीरियसली बात करें. फिल्‍म पश्चिमी दर्शकों के लिए अंग्रेजी में (मूलत: उन्‍हीं के लिए बनी है. बाल बिधवा और सितार वाली करुणा और अंधेरी रातों में दियों की टिमटिमाती बेचैनियां उन्‍हीं के मर्म पर ज्‍यादा मार करेगी) और भारतीय बाज़ार के लिए हिंदी में तैयार की गई है. हिंदी के संवाद दीपा के अंग्रेजी के लिखे का हिंदी अनुवाद हैं. अनुराग कश्‍यप को संवादों के अनुवाद का ही क्रेडिट दिया गया है. तो अनुराग ने ठीक काम किया है लेकिन चूंकि ऑरिजनल उसके नहीं हैं और निर्देशक अंतत: दीपा हैं और गुलाबी चेहरेवाली लिसा रे को बिधवा के रुप में मनवाकर करुणा वह जगवाना चाहती हैं तो लिसा के मुंह से ‘आंखें मींचो’ जैसे वाक्‍यांश सुनकर पहले अटपटा लगता है, फिर पीडा होने लगती है. जॉन अब्राहम लिसा को मेघदूत और विनय पाठक को गांधीवाद का पाठ समझाते हैं तब पीडा और ज्‍यादा बढ जाती है. बेचारी लिसा रे क्‍या करे. देह पर सफेद धोती लपेटने व गोद में काले पिल्‍ले को स्‍नेह देने मात्र से वह ऑथेंटिक बिधवा कैसे हो जायेगी. मगर दीपा के यहां कलालोक इसी तरह सरजा जाता है. कसूर न जॉन का है न लिसा का, दिक्‍कत इस तरह की फिल्‍म मेकिंग के फ्रॉड की है जो वैष्‍णव जन तो तेनें कहिये के गांधीवादी समां और सैंया बिना जग सूना के विरही श्रृंगार की वही घिसी-पिटी बैसाखियों पर तथाकथित मार्मिकता की एक्‍सोटिक खिचडी परोसकर उसे सामाजिक चेतना का दस्‍तावेज़ बतलवाना चाहती है. आप और हम जैसे चीन, वियतनाम, मलेशिया के फ़र्क के झमेले में न पडकर सबको एक ही तरह की आरती में निकाल देंगे, विदेश में बसी दीपा और उनके दर्शकों के लिए विविध भारत का सारा भेद भुलाकर एकमेव यथार्थ बन जाता है. जॉन सन् चालीस के हिंदुस्‍तान को अपनी सपाट संवेदनात्‍मकता से प्रकाशित करते रहते हैं और मैं हाय-हाय करता उस समूची चिरकुटई पर रोने लगता हूं जो इस फिल्‍म के कथ्‍य और पैकेजिंग के घालमेल को एक-दूसरे से कन्‍फ्यूज़ करके उत्‍साह में फिल्‍म के लिए तालियां बजा रही है.

जो अभी गंभीर सिनेमा का ककहरा नहीं जानते वे जायें और जाइल्‍स नटगेंस की अच्‍छी सिनेमाटॉग्राफी का स्‍वाद लें. आठ साल की चुइया (सरला) के अभिनय की तारीफ करें और सीता और गीता के बाद की बुरी मनोरमा की एक बार और झलकी लें. बाकी लोग इस बदलते वक्‍त के सिनेमा के कथ्‍य से ज्‍यादा उसकी पैकेजिंग और हल्‍ले की सामाजिकता पर विचार करें. दीपा मेहता का पानी मिस करके वे विशेष कुछ मिस नहीं कर रहे होंगे.

(ऊपर एक्‍ज़ोटिका, नीचे उसे रचनेवाली एक्‍ज़ोटिक दीपा)

4 comments:

Anonymous said...

true.. well anybody write comments or not. you keep writing blogs. i will read it.

Pramod Singh said...

गलत-सलत अंग्रेजी लिखनेवाला, और स्‍वयं को थोडा प्रकट और थोडा अप्रकट बनाये रखनेवाला शुभाकांक्षी, मेरे लिखे को समर्पित यह कौन मीरा दास या दासी है? ऐसे समर्पण की कल्‍पना मात्र से मेरी छाती शीतल नहीं होती, भय से रोंये खडे हो जाते हैं. प्रभु, बॉक्‍स ऑफिस आबाद करो, मगर संसार (कम से कम मेरे संसार)को ऐसे जुझारु पाठक ताले‍बानियों से भी मुक्‍त रखो. शांति, शांति.

ankur said...

ye film kai ghat ka pani piye hue hai,
aur aap?

somen said...

Sahi. Bikul sahi. widows + sex + sex + prostitution + child nmarriage + benaras + gandhiji!!! isse badhiya indian exotica aur kya ho sakta hai??