3/06/2007

हिंदी फिल्‍में कैसे बनती हैं

यह एक गंभीर, समाज शास्‍त्रीय विषय है लेकिन बंबई में इस प्रश्‍न का उत्‍तर गंभीर नहीं हो सकता. आदित्‍य चोपडा, फरहान अख्‍तर और हैरी बवेजा के यहा आपको इसका अलग-अलग जवाब (और फार्मूला) मिलेगा. कुछ वर्षों पहले गोविंदा के कान में आप यह सवाल करते तो वह हंसने लगता. फिर सीरियसली आपको देखकर कहता हमें साईन कर लो फिल्‍म बन जायेगी. जेपी दत्‍ता, संजय भंसाली और राजकुमार संतोषी की फिल्‍म समय व पैसा खाकर काफी अदाओं से बनती है. फिर एक फास्‍ट फुड वाली फिल्‍ममेकिंग भी है. महेश मांजरेकर, प्रियदर्शन और मुकेश भट्ट इसके सिद्धहस्‍त खिलाडी हैं. इन्‍होंने यह कला साध ली है कि एक फिल्‍म से अभी निकले नहीं और दूसरे में घुस गए. भंसाली ने पहला शॉट लिया नहीं और इस दरमियान प्रियदर्शन बाबू ने एक पूरी फिल्‍म छाप ली. डेविड धवन की एक नहीं दो-दो फिल्‍में एक साथ रीलीज़ हो रही हैं.

फिर कुछ डिटेल्‍स पर काम करनेवाले फिल्‍ममेकरों की एक नई पौध भी हैं. अपने विशाल भारद्वाज का नाम इसमें अग्रणी समझा जाना चाहिये. डिटेल, कैमरा, रियलिस्टिक कैरेक्‍टेराइजेशन में इतना उलझ जाते हैं कि कहानी का सुर मध्‍यांतर के बाद आप ही के लिए नहीं, इनके लिए भी गडबडाया रहता है. ‘ओंकारा’ प्रेम और विश्‍वासघात के पडताल का ही टेक ऑफ था न? अब आप ठीक से याद कीजिये कि आपको फिल्‍म के प्रेम की मार्मिकता याद रही या ओंकारा के अंदर उठी यह टीस और चोट कि वह अपनों से छला गया? अपनापे का ऐसा कोई मार्मिक बिल्‍ड-अप है ही नहीं फिल्‍म में. आपको फिल्‍म देखते हुए बस यह अच्‍छा लगता रहता है कि हिंदी पट्टी की गुंडई का सुर अच्‍छा पकडा है बंदे ने, और सैफ और दीपक डोभलियाल काम सही कर रहे हैं. कहानी-वहानी भूल जाईये. देखिये, मैं बहक रहा हूं. बात शुरु हुई थी हिंदी फिल्‍म बनती कैसे है. ठीक है प्रोड्यूसर के पास इतना काला धन है उसने तय किया कि नाली में बहाना है तो क्‍या बन गई फिल्‍म? नहीं बनी.

नाटक खेलने के लिए जैसे एक नाटक की ज़रुरत होती है फिल्‍म-फिल्‍म खेलने के लिए भी एक स्क्रिनप्‍ले, स्क्रिप्‍ट, पटकथा नामक चीज़ की ज़रुरत होती है. मनोहरश्‍याम जोशी और मन्‍नू भंडारी ने इस विषय पर एक-एक किताब भी लिखी है. फिल्‍मों का ज्ञानात्‍मक कीडा हो तो आप ज्ञानार्जन कर सकते हैं. तो पैसा बहाने की जिद पर अड जाने के बाद हिंदी फिल्‍मों का प्रोड्यूसर क्‍या अब एक पटकथा की खोज में निकलेगा? नहीं, बेवकूफ होगा तो शायद इस झोल में फंस जाये वर्ना पहले वह अपने हीरो-हिरोईन खोजेगा. दुनिया के अन्‍य देश इस मामले में चाहे जितने उल्‍लू हों, हिंदी फिल्‍मों का प्रोड्यूसर नहीं. फिल्‍म बनाने के लिए कहानी और पटकथा उसके लिए सबसे आखिर में आनेवाली और सबसे फालतू और नगण्‍य चीज़ें हैं. फिर कहां से शुरु होता है खेल? वह खेल हम फिर खेलेंगे...

(जारी...)

1 comment:

rituraj said...

hindi cinema ke baare mein padhna achcha lagta hai. hindi language ka jo rang aap dikhate hai, majedaar hai.