5/24/2016

हुर्राट

पिछले चौबीस घंटों में एक के बाद एक तीन फिल्‍में देखीं. घर पर तमिल देखी, सिनेमा में जाकर पहले मलयालम, और उसके पीठ पीछे, मराठी देखी. बहुत दिनों बाद ऐसा पागलपन किया, अपने यहां की फिल्‍मों के साथ आठ और नौ घंटे गुज़ारना मज़ाक नहीं है. मगर फिर माथे में आखिरी फिल्‍म का ऐसा जायका बना रहा कि अपनी पहले की दाेेनों गलतियां भूल गईं.

सैराट में यह अपनी ज़रा-ज़रा-सी की मामूली सोलह-साला हिरोईन है, चेहरे और देह में हिरोईन वाला पाव भर का मटिरियल नहीं. थोड़ी थुलथुल, सांवली है, नैन-नक्‍श भी ऐसे नहीं कि ऊपरवाले की बहुत कल्‍पना और मेहरबानी दर्शाते हों, मगर कुछ निर्देशक मंजुले की लिखाई का धन है, और कुछ भली लड़की के अपने अरमानों की मार्मिकता, होनहार क्‍या ऊंची पतंग उड़ाती है अपने किरदार के साथ, देखकर जी सच्‍ची लाजवाब हो गया. अपने यहां लड़कियों को ऐसे देख लेने की भेदकारी और भारी नज़र सचमुच विरल है.

प्रेम में ढेर हुए के डायलॉग बहुत सारी एक्‍ट्रेसेस के हाथ में धर दो, अच्‍छे से पढ़ देंगी, मगर जिस तरह से यह लड़की, रिंकु राजगुरु, उसे परदे पर जीती, एक्‍ट-आउट करती है, कि बड़े घर की बेटी हूं, ऐंठ में रहकर ही जीना सीखा है, लेकिन इस प्रेम में कैसी खुद से हारी हो गई हूं, और इस बदकार ने कैसे मेरी आत्‍मा में ऊष्‍मा का ताप और आग भर दिया है, और उस प्रेम के पीछे अपनी दुनिया फूंककर, सच्‍चाई से रुबरु होती, फिर कैसे खुद से भी परायी हुई जाऊंगी, सब जीती है यह ज़रा सी फुदनी लड़की, और क्‍या धमक और इलान से जीती है.

दसेक दिनों से फिल्‍म जाने देखना टाल रहा था. ट्रेलर में दिखी लाल, पीले, नीले कपड़ों में सजी कुछ चिरकुट-सी दिखती यह हिरोईन भी एक वज़ह रही होगी कि फिल्‍म के लिए निकलते-निकलते निकलना स्‍थगित हो रहा था. उन्‍हीं लाल, पीले, नीले सलवार-कुर्तों वाले 'सूट' में यह एंटी-छप्‍पन छूरी रहते-रहते रॉयल एन्‍फि‍ि‍ल्‍ड की सवारी करके कॉलेज पहुंच जाती है. कॉलेज ग्राउंड में लड़कियों के साथ खेल में बझी लड़के की नज़रों को अपने में अटका पाकर सधे कदमों से जवाब तलब करने पहुंच जाती है, 'तू क्‍या देख रहा है रे?' लड़का हकलाता जवाब देता है कि वह खेल देख रहा था. लड़की तमककर- 'मैं देख नहीं रही तू क्‍या देख रहा है?' और फिर उतने ही कैजुअलनेस से कहना, 'मैंने ये नहीं कहा तू देख रहा है मुझे पसंद नहीं!' और पलटकर निकल जातना..

ट्रैक्‍टर पर सवार लड़के की झोपड़ दुनिया में पहुंच जाती है, झोपड़े के बाहर बर्तन धोती 'संभावित' सास और तेरह-साला ननद के हाल-चाल लेती, मूलत: खुलेआम अपने दिल के लुटेरे को न्‍यौतने गई है, कि आकर उसकी संगत में उसके खेत टहल ले. यह जानते हुए कि घर पर किसी को खबर हुई, गुडा किस्‍म के भाई या रौबीले तबीयत के पाल्टिकल बाप के तो दोनों के लिए कितना खतरा होगा, फिर भी लड़की चार हाथ आगे निकलकर यह सब करती है, क्‍यों करती है? इसलिए कि प्रेम के हाथों बेसहारा हुई जाती है. वही बेसहारापन, अपने प्रेमी, और उसकी गरीबी की संगत में, उसकेे अमीर गुरुर के छाती पर सांप-सा लोटता उसे अब दूसरे छोर पर पराया और बेसहारा करके तोड़ता है तो लड़की उस टूट को भी उसी मार्मिकता से जीती है.

इन मार्मिकताओं को एक्‍सप्रेस करनेवाले गाने भी कुछ उसी चाल में दौड़ते हैं. और दुनिया, लगभग, मन के थापों के अनुरुप ढलती चलती है, इसे सिनेमा में इस सहजभाव हासिल कर लेना आसान नहीं है.

फिल्‍म में दसेक मिनट होंगे, मारा-मारी और लाचारी के कुछ मेनस्‍ट्रीम सिनेमाई लटके-झटके, बाकी खालिस सोना है. नागराज पोपटराव मंजुलेे की पहली, 'फंड्री' कहीं कोने में चुपचाप तैयार की गई, एक छोटी कलाकारी थी, 'सैराट' मेनस्‍ट्रीम के बीच मैदान में बजाया गया बड़ा वाला बाजा है, और बड़े अच्‍छे से बजाया गया है. मराठी लोग तो बढ़-बढ़कर देख ही रहे हैं, आप भी देख आइए.

3/08/2016

लड़कियों की, संयोग ही होगा, सिनेमा होगा..

औरतों के जीवन पर दो टेढ़ी-मेढ़ी फ़ि‍ल्‍में देखकर मन लाजवाब हुआ. मज़ेदार यह कि रात-रात भर उनींदे में यहां-वहां इतना-इतना बीनते रहते हैं, मगर इन- एक और दो- दोनों ही फ़ि‍ल्‍मकारों के काज से कभी भी पहले टकराहट नहीं हुई थी, और एक दूसरी वैसी ही मज़ेदार बात यह कि बॉयज़ आन द साइड हरबर्ट साहब की आखि़री फ़ि‍ल्‍म है (किसी करियर के अंत का फिर कैसा शानदार फिनिशिंग स्‍ट्रोक है, मेरी लुई पार्कर, व्‍हूपी गोल्‍डबर्ग और ड्रयू बैरिमोर की एक्टिंग के बाबत सोचता अभी भी भावुक हो रहा हूं, और फिर इतना तो सिनेमाई साउंड डिज़ाईन, और वैसी ही मन को ऊपर-नीचे करती उसकी साउंड-एडिटिंग), जैसेकि माई ब्रिलियेंट करियर माइल्‍स फ्रैंकलिन की पहली किताब है, कहते हैं हंसते-खेलते उसने सोलह साल की अवस्‍था में लिख ली थी, और यह सोचकर लिखी थी कि दोस्‍तों का एंटरटेनमेंट करेगी. जिलियन आर्मस्‍ट्रॉंग की फ़ि‍ल्‍म ने तो मेरा किया ही, और ऐसा किया जो बहुत-बहुत समय से नहीं किया था. जियो, लइकियो..

5/14/2015

देखना..

कभी फुरसत में इसके साथ थोड़ा समय बिताइयेगा.. भारत में नृत्‍य, आधे-आधे घंटे के दो टुकड़ों में है..

3/31/2015

दो पुरानी और एक नई शैतानी, के सुख

एक उम्र के बाद निर्मम होकर हिन्‍दी फिल्‍में देखनी बंद कर देनी चाहिये. मगर फिर, एक उम्र के बाद, निर्मम होकर आदमी गोलगप्‍पे और समोसे खाना नहीं बंद कर पाता तो खुद को बहलाने के लिए मन ही मन गुनगुनाता ‘जाने कहां गये वो दिन’ के रुमानी ख़्याल में फिल्‍म में जो नहीं है वैसे निहितार्थों को भी पढ़ता हुआ फ़ि‍ल्‍म के चैप्‍टर्स पलटने लगता है. और इस पुनर्दर्शन के बीस मिनट भी नहीं बीतते कि उसके लिए चोरी से गोलगप्‍पे खाने और बेहयायी से फ़ि‍ल्‍म देखने में कोई विशेष फर्क नहीं रह जाता. आज बहुत सारे फेसबुक कर रहे बच्‍चे उस वर्ष तक अभी पैदा नहीं हुए थे, तो 1970 की फि‍ल्‍म है. राज कपूर का स्‍वान सॉंग जैसा कुछ था. कहानी-पटकथा अपने हमेशा के ज्‍वलनशील, प्रगतिशील अब्‍बास साहब की होशियारी थी, लेकिन फिल्‍म से शंकर सिंह रघुवंशी और जयकिशन दयाभाई पांचाल की धुनें और शैलेंद्र और हसरत बाबू के चार और पांच गानों को हटा दीजिये तो आज के दर्शक के लिए फि‍ल्‍म में शायद ऐसी कोई गुफ्तगू नहीं बचती जिसके तारों में, कोशिश करके भी, वह कहीं उलझ, अटक सके. बारिश में कपड़े गीले करके दूर तक विरह गाती जाती पद्मिनी को 'मोहे अंग लग जा बालमा' को देखकर आप खुद को बहलाते रहते हैं, उसके सिवा बहुत सोचने को फिर बचता नहीं.. जय हो कपूर साहब और अब्‍बास साहेब का जा रे जमाना.

‘27 डाऊन’ चार वर्ष बाद, 1974 में बनी थी और उसका हिसाब ‘मेरा नाम जोकर’ की मल्‍टी-स्‍टारर वाली बराबरी का नहीं है, फिर भी, चालीस वर्षों के अन्‍तराल पर उसे देखते हुए, किसी महीन गुफ्तगू के अभाव में, मन वहां भी उसी तेजी से उखड़ना शुरू करता है. प्रथम पुरुष में रह-रहकर नायक की सोलोलॉकी चलती रहती है और उसका स्‍तर पिटे अस्तित्‍वादी चिंताओं की तिलकुट बुनकारी व अदाओं से बहुत ऊपर नहीं उठता. एमके रैना ने तीन या चार हिन्‍दी फिल्‍मों में जो अभिनय किया है, उन फिल्‍मों से यही अहसास होता है कि अपने चेहरे के भावों से ज्‍यादा उन्‍हें अपनी फैली दाढ़ी का आत्‍मविश्‍वास रहा है. अलबत्‍ता यहां उस दौर के उपनगरीय बंबई की छटा अपूर्व किशोर बीर की सिनेकारी में जिस धज और निखार के साथ देखने को मिलती है, फिल्‍म का वह पहलू अभी भी डेटेड नहीं हुआ है. उसी तरह बंसी चंद्रगुप्‍त का प्रोडक्‍शन डिज़ाईन. बाकी फिल्‍म में याद रखने लायक कुछ नहीं है, मानकर चलिये ट्रेन आई थी और निकल गई.

जैसे हाल में अभी एक और, सुचिंतित कलाकर्म, ‘बदलापुर’ की शक्‍ल में आई थी. फिल्‍म के आखिरी बीसेक मिनट के कसाव और लिखाई को हटा दें तो बकिया का डेढ़ घंटा आप गंभीरता से विचलित होते सोचने से नहीं ही बच पाते कि फिल्‍म के पीछे ऐसा चिंतन क्‍या है, और बदलापुर क्‍यों आई है, और उसमें दर्शक के तौर पर, हम क्‍यों आये हैं. पके और थके हुए लोग एक-दूसरे पर नीचता की हिंसा की तरकीबें आजमाते रहें का होनहार करम हमें क्‍या नई बात बता सकता है. नहीं ही बताता.

मैं फिर सोच रहा हूं एक उम्र के बाद हिन्‍दी फिल्‍में देखनी बंद कर देनी चाहिये. सवाल यही है कि मालूम नहीं वह उम्र क्‍या है.