1/11/2020

नए रूस में..

समाज का क्‍या कह कर लेंगे का सेर्गेई शुरोव का रास्‍ता..

तीन झलकियां:

वीडियो एक,
वीडियो दो,
वीडियो तीन..

11/04/2019

ज़ि‍ंंदगी तमाशा..

नजम सेठी के यूट्ययूब चैनल पर बतकही के एक शो में बात करती एक जवान लड़की दिखी. एमान सुलेमान. लम्‍बा चेहरा. छोटे-छोटे बाल. अटक-अटककर बोलना, मगर ठहरी हुई अपनी तरह की एक बेचैनी. बातों के दरमियान पता चला मॉडलिंग तो ठीक-ठाक करती ही रही है, हाल में एक फ़ि‍ल्‍म की है. तो यह उस फ़ि‍ल्‍म का ट्रैलर है. थोड़ा अलग सा है, इससे ज्‍यादा इसे यहां चढ़ाने की और वज़ह नहीं.
हां, एक वज़ह और यह थी कि शायद इसी बहाने सिलेमा के बंद पड़े ताले पर धूल-सूल झाड़ते रहने की हमें आदत पड़ जाये. मालूम नहीं पड़ेगी, नहीं पड़ेगी. पड़ेगी तो कितनी पड़ेगी. फ़ि‍लहाल आप ट्रेेेेलर देखिए. यूट्यूूूब पर ट्रेलर का लिंक यह रहा.   

7/07/2016

फिल्‍मी बातें..

कभी इटली में कुछ समय गुज़रा था, तो रह-रहकर वहां की फिल्‍मों में झांक आने का मोह स्‍वाभाविक है. कभी-कभी कुछ अच्‍छा हाथ चढ़ता भी है, लेकिन मोस्‍टली, ऐसे सिरजनहारे दिखते हैं कि दिल फांक-फांक हो जाता है. अभी एक, दो और तीन दिखे ये.. दिक्‍कत क्‍या है? पाओलो विर्जी की इटली में साख है, काफी सारे पुरस्‍कार मिलते रहे हैं, फिल्‍में दर्शकों में सराही जाती रही हैं, समीक्षकों का भी भाव मिलता रहा है, तो फिर..? वह पाओलो की ही नहीं, थोड़ा डिटैच होकर सोचने पर पूरे इटैलियन सिनेमा की दिक्‍कत लगती है. कि इतिहास, संवेदना, मन की उछाल, सबकुछ जैसे देश और समय की इतनी लकीरें खींच दी गई हों, उस समय-स्‍थान के खिंचे हुए दड़बे में बंद हो. कोई वृहत्‍तर विकलता, उक्षृंखलता उसे हवा में उछालकर पूरी दुनिया का होने से रोके रखती हो. मालूम नहीं, दुनिया भर में फिल्‍में स्‍थान-बद्ध होती हैं, अंग्रेजी में जिसे हम रूटेड कहते हैं, और जो हिन्‍दी सिनेमा का सबसे बड़ा दोष है कि वह स्वित्‍ज़रलैंड घूम आती है, छत्‍तीसगढ़ि‍या गाना आती है, सब कहीं फैली होती है मगर उसके किरदार, और न फिल्‍म, कहीं रूटेड होती है. तो स्‍थान-बद्धता तो अच्‍छा और फ़ायदे की चीज़ होनी चाहिए, मगर इटैलियन सिनेमा के लिए वह रेत में कुछ मुंह छुपाये की कला होकर रह गई है. पिछले बीस वर्षों से तो बहुत कुछ यही दुनिया देख रहा हूं.

जबकि थोड़े कम बजट और कम कमाई वाले अभिनेताओं की बुनावट की छोटी अमरीकी फिल्‍में कुछ इन्‍हीं गुणों की वजह से बार-बार दिखता रहा है कि कुछ स्‍पेशल एंटरटेनमेंट में बदलती रहती हैं. अभी हाल की देखी कुछ ऐसों की गिनती गिनाता हूं, इनमें से किसी फिल्‍म के पास बहुत पैसा नहीं था, कुछ लोग और कुछ जरा-सी स्थितियों की बतकहियां थीं, मगर ज़रा-सी स्थितियों की बत‍कहियों को गढ़ने का यह विशिष्‍ट अमरीकी सिनेमाई कौशल ओवरव्‍हेल्मिंगली इम्‍प्रेस करता रहता है. फंडामेंटल्‍स ऑफ केयरिंग, एडल्‍ट वर्ल्‍ड, द आर्ट ऑफ गेटिंग बाइ, स्‍टक इन लव सारी ऐसी फिल्‍में हैं जिसमें लोग सिर उठाकर ठीक से जीवन कैसे जियें की कला सीखने को कभी हल्‍के कभी ज़ोर से सिर फोड़ रहे हैं, और उनकी गुफ्तगू में आपका मन फंसा रहता है, वो कहीं का उड़ता जुलाब और खून खराब के ऊटपटांग अमानवीय कृ त्‍य होने को नहीं छटपटाते रहते.

5/26/2016

कुछ फिल्‍में क्‍यों अच्‍छी लगती हैं?

लगभग, अच्‍छे संगीत की ही तरह, यह ऐसी चीज़ है जिसे आम तौर पर बोल कर बताया नहीं जा सकता. (बोलने वाले बहुत-बहुत कुछ बोलते ही रहते हैं, मगर इन पंक्तियों के लिखनेवाले को हमेशा लगता है टाकिंग अबाउट द एक्‍सपीरियंस इस नॉट द एक्‍सपीरियंस. इट्स समथिंग रियली सबलाइम.) वही पहचानी दुनिया एकदम नए ढंग में आपके सामने खुलती, और आपको चमत्‍कृत करती है. उन्‍हीं पहचाने रंगों में एकदम अनएक्‍सपेक्‍टेड से सामना करने जैसा एक्‍सपीरियेंस.

द फिल्‍म यू सी इज़ नॉट द फिल्‍म आई सी, एंड फनीली, वी आर वाचिंग इट टुगेदर. सिनेमा हॉल में बैठे हुए सैकड़ों लोग एक ही फिल्‍म में बहुत सारी फिल्‍में देख रहे हैं. और बहुत बार, निर्देशक की अपेक्षाओं के परे भी देख रहे हैं. देखते हुए एक बार दिखता है, मगर वह 'दीखना' बाद में धीरे-धीरे, और काफी समय तक, खुलता रहता है. मन में उसकी एक स्‍वतंत्र दुनिया बन जाती है, और रहते-रहते, बाज मर्तबा आपके अजाने भी, आपकी उससे एक गुफ़्तगू चलती रहती है.

एक दूसरी मज़ेदार बात, वह ख़ास चाक्षुस, सिनेमैटिक एक्‍सपीरियंस, शब्‍दों में व्‍यक्‍त करना, कर पाना, ऑलमोस्‍ट 'असंभव' जान पड़ता है. खेल में तनाव का एक ख़ास क्षण, या प्रेम में सुख, या तक़लीफ़, या सांगीतिक अनुभूति की तरल विरलता पर देर तक कोई बातें करता रह सकता है, मगर ठीक-ठीक उसका कहा जाना फिर भी रह ही जाता है.