3/08/2016

लड़कियों की, संयोग ही होगा, सिनेमा होगा..

औरतों के जीवन पर दो टेढ़ी-मेढ़ी फ़ि‍ल्‍में देखकर मन लाजवाब हुआ. मज़ेदार यह कि रात-रात भर उनींदे में यहां-वहां इतना-इतना बीनते रहते हैं, मगर इन- एक और दो- दोनों ही फ़ि‍ल्‍मकारों के काज से कभी भी पहले टकराहट नहीं हुई थी, और एक दूसरी वैसी ही मज़ेदार बात यह कि बॉयज़ आन द साइड हरबर्ट साहब की आखि़री फ़ि‍ल्‍म है (किसी करियर के अंत का फिर कैसा शानदार फिनिशिंग स्‍ट्रोक है, मेरी लुई पार्कर, व्‍हूपी गोल्‍डबर्ग और ड्रयू बैरिमोर की एक्टिंग के बाबत सोचता अभी भी भावुक हो रहा हूं, और फिर इतना तो सिनेमाई साउंड डिज़ाईन, और वैसी ही मन को ऊपर-नीचे करती उसकी साउंड-एडिटिंग), जैसेकि माई ब्रिलियेंट करियर माइल्‍स फ्रैंकलिन की पहली किताब है, कहते हैं हंसते-खेलते उसने सोलह साल की अवस्‍था में लिख ली थी, और यह सोचकर लिखी थी कि दोस्‍तों का एंटरटेनमेंट करेगी. जिलियन आर्मस्‍ट्रॉंग की फ़ि‍ल्‍म ने तो मेरा किया ही, और ऐसा किया जो बहुत-बहुत समय से नहीं किया था. जियो, लइकियो..

5/14/2015

देखना..

कभी फुरसत में इसके साथ थोड़ा समय बिताइयेगा.. भारत में नृत्‍य, आधे-आधे घंटे के दो टुकड़ों में है..

3/31/2015

दो पुरानी और एक नई शैतानी, के सुख

एक उम्र के बाद निर्मम होकर हिन्‍दी फिल्‍में देखनी बंद कर देनी चाहिये. मगर फिर, एक उम्र के बाद, निर्मम होकर आदमी गोलगप्‍पे और समोसे खाना नहीं बंद कर पाता तो खुद को बहलाने के लिए मन ही मन गुनगुनाता ‘जाने कहां गये वो दिन’ के रुमानी ख़्याल में फिल्‍म में जो नहीं है वैसे निहितार्थों को भी पढ़ता हुआ फ़ि‍ल्‍म के चैप्‍टर्स पलटने लगता है. और इस पुनर्दर्शन के बीस मिनट भी नहीं बीतते कि उसके लिए चोरी से गोलगप्‍पे खाने और बेहयायी से फ़ि‍ल्‍म देखने में कोई विशेष फर्क नहीं रह जाता. आज बहुत सारे फेसबुक कर रहे बच्‍चे उस वर्ष तक अभी पैदा नहीं हुए थे, तो 1970 की फि‍ल्‍म है. राज कपूर का स्‍वान सॉंग जैसा कुछ था. कहानी-पटकथा अपने हमेशा के ज्‍वलनशील, प्रगतिशील अब्‍बास साहब की होशियारी थी, लेकिन फिल्‍म से शंकर सिंह रघुवंशी और जयकिशन दयाभाई पांचाल की धुनें और शैलेंद्र और हसरत बाबू के चार और पांच गानों को हटा दीजिये तो आज के दर्शक के लिए फि‍ल्‍म में शायद ऐसी कोई गुफ्तगू नहीं बचती जिसके तारों में, कोशिश करके भी, वह कहीं उलझ, अटक सके. बारिश में कपड़े गीले करके दूर तक विरह गाती जाती पद्मिनी को 'मोहे अंग लग जा बालमा' को देखकर आप खुद को बहलाते रहते हैं, उसके सिवा बहुत सोचने को फिर बचता नहीं.. जय हो कपूर साहब और अब्‍बास साहेब का जा रे जमाना.

‘27 डाऊन’ चार वर्ष बाद, 1974 में बनी थी और उसका हिसाब ‘मेरा नाम जोकर’ की मल्‍टी-स्‍टारर वाली बराबरी का नहीं है, फिर भी, चालीस वर्षों के अन्‍तराल पर उसे देखते हुए, किसी महीन गुफ्तगू के अभाव में, मन वहां भी उसी तेजी से उखड़ना शुरू करता है. प्रथम पुरुष में रह-रहकर नायक की सोलोलॉकी चलती रहती है और उसका स्‍तर पिटे अस्तित्‍वादी चिंताओं की तिलकुट बुनकारी व अदाओं से बहुत ऊपर नहीं उठता. एमके रैना ने तीन या चार हिन्‍दी फिल्‍मों में जो अभिनय किया है, उन फिल्‍मों से यही अहसास होता है कि अपने चेहरे के भावों से ज्‍यादा उन्‍हें अपनी फैली दाढ़ी का आत्‍मविश्‍वास रहा है. अलबत्‍ता यहां उस दौर के उपनगरीय बंबई की छटा अपूर्व किशोर बीर की सिनेकारी में जिस धज और निखार के साथ देखने को मिलती है, फिल्‍म का वह पहलू अभी भी डेटेड नहीं हुआ है. उसी तरह बंसी चंद्रगुप्‍त का प्रोडक्‍शन डिज़ाईन. बाकी फिल्‍म में याद रखने लायक कुछ नहीं है, मानकर चलिये ट्रेन आई थी और निकल गई.

जैसे हाल में अभी एक और, सुचिंतित कलाकर्म, ‘बदलापुर’ की शक्‍ल में आई थी. फिल्‍म के आखिरी बीसेक मिनट के कसाव और लिखाई को हटा दें तो बकिया का डेढ़ घंटा आप गंभीरता से विचलित होते सोचने से नहीं ही बच पाते कि फिल्‍म के पीछे ऐसा चिंतन क्‍या है, और बदलापुर क्‍यों आई है, और उसमें दर्शक के तौर पर, हम क्‍यों आये हैं. पके और थके हुए लोग एक-दूसरे पर नीचता की हिंसा की तरकीबें आजमाते रहें का होनहार करम हमें क्‍या नई बात बता सकता है. नहीं ही बताता.

मैं फिर सोच रहा हूं एक उम्र के बाद हिन्‍दी फिल्‍में देखनी बंद कर देनी चाहिये. सवाल यही है कि मालूम नहीं वह उम्र क्‍या है.


3/12/2015

काली और सफ़ेद

धूप में चुनचुनाते माथे, किसी का इंतज़ार करते, आइसक्रीम चुभलाते-सी कुछ छोटी फ़ि‍ल्‍में होती हैं, फिर मीठे-लाल लबालब तरबूज की उम्‍मीद वाली कुछ बड़ी फ़ि‍ल्‍में होती हैं, और छोटी-बड़ी इन रंग व मिज़ाज अनुभूतियों से बाहर, टेक्‍नोलॉजी व सिनेमाई वितरण के पारम्‍परिक अर्थतंत्र को धता बताता, फिर एक स्‍वायत्‍त संसार होता है काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍मों का, धीमे-धीमे फैलकर आपकी धमनियों में जगह बनाती और मन में एक अलग किस्‍म के गुफ़्तगू का आस्‍वाद छोड़कर माथे में डोलती, अटकी रहती हैं. आखिरी क्‍या ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फ़ि‍ल्‍म थी जिसके देखे का मीठा अब तक बसा है मन में, अभी भी याद है?

रहते-रहते प्रोड्युसरों को बुखार चढ़ता है और वो पुरानी काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍मों को रंगीन में बदलकर चार पैसा और कमाने के अरमान में कुलबुलाने लगते हैं, ऐसा करके काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍मों में जो उनका एक विशिष्‍ट ‘टाइमलेसनेस’ का एलीमेंट होता है, उसे रंगीन के स्‍थूल व भद्दे में बदलकर, कुछ पैसा भले कमा लेते हों, सिनेमाई तृप्ति कोई कैसे पाता है, यह सवाल मेरे लिए अब तक घनघोर मिस्‍ट्री है.

और वह दूसरा सवाल भी कि आखिरी वह कौन फ़ि‍ल्‍म थी, काली-सफ़ेद, जिसके चपेटे में आपका मन गुनगुनाकर (सुहाना सफ़र है ये मौसम हसीं) बहलता नर्गिस और प्रदीप कुमार के दिल की गिरहों को खोल देने की चुनौतियां देने लगता था, या ‘साहब बीवी और गुलाम’ की छोटी बहू की ‘अजीब दास्‍तां है ये, कहां शुरु कहां खतम’ का तराना छेड़कर फिर किन्‍हीं अंधेरों में गुम हो जाया करता..?

पिछले कुछ अरसों की मेरे ख़याल में घूमकर सबसे पहले नोआ बाउमबाक (उच्‍चारण सही है?) की ‘फ्रांसेस हा’ आती है, और उसके पीछे-पीछे अलेक्‍सैंडर पाइन की ‘नेब्रास्‍का‘. फिर गये साल की पोलिश, ऑस्‍कर नवाज़ी गई, ‘इदा’ का अपने ठहरावी बुनावट में, धीरे-धीरे लोग व सैरों को देखने का, एक ‘रंग नहीं, ये काला-सफ़ेद बोलता है’ जलवा था. और फिर अभी ताज़ा-ताज़ा डिलन टॉमस की सनकों के गिर्द बुनी, एंडी गोदार की ‘सेट फायर टू द स्‍टार्स’ देख रहा था, उतनी महीन नहीं, फिर भी काली-सफ़ेद का संगीन तो है ही..