2/26/2007

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या है

गुरु दत्‍त की प्‍यासा के पचास वर्ष: छह

पहले छूटी हुई कहानी निपटा लें. तो घर के लोगों का अपनापा, पुराने प्रेम की शोख कसक भरी यादों व समाज- सबसे दुत्‍कारा हुआ शायर शहर की सडकों पर आवारा भटकता है. एक तंगहाल पर पसीजकर उसे अपना कोट सौंप देता है. बेचारा तंगहाल भिखारी एक रेल दुर्घटना में मारा जाता है और कोट की बिना पर दुनिया समझती है शायर विजय मारा गया. उधर शायर और उसकी शायरी की हमेशा की दिवानी गुलाब जो भी थोडे-बहुत उसके साधन हैं सब जोडकर घोष से विनती करती है कि मरणोपरांत अब तो इस शायरी की कद्र करें और इसे छाप दें. रेल दुर्घटना से सन्‍न विजय की आवाज़ अपने नज़्मों की छपी किताब देखकर लौटती है. डॉक्‍टर यह देखकर कि वह अपने को एक मुर्दा शायर बता रहा है उसे पागल करार देता है. सगे भाई और जिगरी दोस्‍त की शह पाकर घोष साहब भी तय करते हैं कि जिंदा की बनिस्‍बत मुर्दा विजय ज्‍यादा फायदेमंद है, और विजय को पहचानने से इंकार कर देते हैं. पागलखाने से भागकर विजय अपनी ही मौत की शोकसभा में पहुंचकर अपनी पहचान खोलता है. लोग इस खबर से हैरान हैं मगर शायर आखिरकार अब अपनी शायरी की दाद पा रहा है. वह अंतत: सफल हुआ. मगर जिन हालातों में वह सफलता तक पहुंचा है विजय के लिए ऐसी शोहरत बेमानी हो जाती है. इस सफलता और ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या है’ की दुनिया को अपने लिए निरर्थक बताता विजय, उससे अपने संबंध तोडकर, वेश्‍या गुलाब का हाथ थामे एक नये सफर को निकल पडता है.
साहिर और सचिन देव बर्मन ने और कई फिल्‍में साथ-साथ की हैं मगर सुर और बयानी का जो मुकम्‍मल जोड उन्‍होंने प्‍यासा में साधा, वह अन्‍य किसी फिल्‍म में शायद ही प्‍यासा वाला पिच अख्तियार करता है. मीना का रोल अपने समय के लिए काफी जटिल और चैलें‍जिंग रहा होगा, और माला सिन्‍हा कभी कमाल की अभिनेत्री नहीं रहीं, लेकिन प्‍यासा की मीना को वह काफी अर्थपूर्ण बनाये रखती हैं. अबरार अल्‍वी साहब की लिखाई भी, सिर्फ प्‍यासा में ही नहीं, गुरु दत्‍त के पूरे फिल्‍म करियर का एक अभिन्‍न अंग और अच्‍छा सहयोगी रही है. उसी तरह जैसे वीके मूर्ति साहब का कमाल का कैमरा. हालांकि उन्‍होंने और निर्देशकों के साथ भी काम किया मगर वास्‍तविक लोकेशंस का जैसा रुमानी, और फिर भी, बंबईया सिनेमा से हटकर एकदम रियल का जो सेंस मूर्ति साहब ने गुरु दत्‍त के कॉलाबरेशन में क्रियेट किया, वह तब के ही नहीं, आजतक के हिंदी सिनेमा के लिए एक बेशकीमती उपहार है.

अपनी अगली फिल्‍म में गुरु दत्‍त ने प्‍यासा वाली ही पडताल को फिल्‍म इंडस्‍ट्री की तरफ शिफ्ट किया और ज्‍यादा महत्‍वाकांक्षी, ज्‍यादा भव्‍य तरीके के सिनेमा में पैर रखे; मगर ‘कागज़ के फूल’ बुरी तरह पिटी. निजी जीवन की दिक्‍कतों, सवालों को अपने सिनेमा में मिलाने, एकरुप करने का उनका जेनुइन प्रयास न केवल समाज ने अस्‍वीकृत कर दिया था, गुरु दत्‍त का कलाकार बंबई की दुनिया में और अलग-थलग व अकेला पडता जा रहा था. मगर उसके बारे में कल...

बाकी का आगे...

(ऊपर: अपनी ही मौत की शोकसभा में पहुंचा शायर, नीचे, कैमरामैन वीके मूर्ति के साथ गुरु दत्‍त: कमाल की जुगलबंदी)

2 comments:

मैथिली said...

गुरुदत्त के कृतित्व पर अच्छी प्रस्तुति है.
इतने पुराने पोस्टर्स कि फ़ोटो कहां से ली आते है आप?

Divine India said...

भाई साहब आप जिस व्यक्तित्व के उपर लिख रहे हैं वो भारतीय सिनेमा का महान स्तंभ था…प्यासा मेरी सबसे प्रिय मूंबी अबतक की रही है…और इसपर मैने काफी लिखा भी था…जो सराहा गया…।
कागज के फूल का वर्णन जिसप्रकार किया है शायद वह उस स्तर से अत्यंत ऊंचा है…फ्लाप तो मेरा नाम जोकर-तीसरी कसम आदि भी रही थी पर विडियो पर देखी जाने वाली पुरानी मूंबी में इनका ही सूमार है…।बहुत रेखाएँ अपने वक्त से काफी आगे होती हैं…जिसे समझना आसान नहीं होता…।