2/19/2007

कैसी है ये प्‍यास

गुरु दत्‍त की प्‍यासा के पचास वर्ष: एक


आज़ादी के बाद नेहरुमयी नये भारत का जो सपना लोगों की आंखों में बसना शुरु हुआ, उससे उनका मोहभंग भी उतनी ही तेज़ी से हुआ. हिंदी साहि‍त्‍य में इस मोहभंग को सबसे मुखरता से स्‍वर दे रहे थे गजानन माधव मुक्तिबोध. सिनेमा साहित्‍य से बहुत पीछे था. मगर आज़ादी के दस वर्ष भी नहीं बीते थे और गुरु दत्‍त ने फिल्‍म बनाई- ‘प्‍यासा’. यह फिल्‍म नये भारत का पतंग उडानेवालों के मुंह पर एक झन्‍नाटेदार तमाचा थी.

समय के असर में आज हमारी संवेदनायें काफी बदल चुकी हैं, समाज में अब हम सच्‍चे मन से यकीन नहीं रखते, राजनीति हमें धूर्तताओं का अखाडा लगती है, और बाज़ार की नुमायशों से अलग हमारी आत्‍माओं के तार कम ही जगहों पर जुडते हैं, और न ही सिनेमा अब पहले की तरह महत्‍वपूर्ण और मजबूत सामाजिक छतरी की भूमिका में रही है (इस सोच से कुछ बंधुओं को आपत्ति होगी, इस आपत्ति वाली सोच से हम फिर कभी संवाद में जायेंगे). कहने का मतलब यह कि छोटे शहरों के उजाड, बंद होते सिनेमाघरों और महानगरों की मैकडॉनल्‍डी-उपभोक्‍ता सिने-संस्‍कृति के वर्तमान परिदृश्‍य में सिनेमा का इस्‍तेमाल और उसकी सामाजिकता का बडा वर्ग भेद आ गया है. अब वह मालदार व आप्रवासी भारतीयों की तरफ ज्‍यादा और देहाती-देसी भारतीयों की ओर कम देखती है (फिल्‍म बनानेवालों की स्‍मृति से यह बात क्रमश: उतरती गई है कि इस देश में अभी भी बडे पैमाने पर गांव हैं. और इसकी उन्‍हें याद हो भी तो वह उनके लगावों-रुझानों से बाहर कर दी गई है. अपने यहां आखिरी गांव-केंद्रित बडी फिल्‍म शोले लगभग बत्‍तीस साल पहले 1975 में आई थी. उसके बाद एक और बडी फिल्‍म गदर-एक प्रेम कहानी हमने देखी मगर उसकी पृष्‍ठभूमि गांव से ज्‍यादा विभाजन थी. गांव लगान में भी था लेकिन वह उतना ही वास्‍तविक था जितना अलग-अलग मौकों पर केंद्रीय सरकार का देहातों से अशिक्षा और अस्‍वास्‍थ्‍य उन्‍मूलन के दावे हुआ करते हैं). बीसेक साल पहले एक साइकिल पर तीन-तीन बच्‍चे लदकर सिनेमाघर पहुंचा करते थे, टिकट खिडकी पर स्‍टॉक एक्‍सचेंज की मारामारी वाला नज़ारा रहता था, ‘चार का बीस, चार का बीस’ का सुरीला, लुभानेवाला कोरस चला करता था. इंदिरा गांधी की मौत और राजीव भैया के पर्दापण के साथ जितेंद्र के ‘कारवां’, धर्मेंद्र के ‘मेरा गांव, मेरा देश’ वाले इस लंबे दौर का पटाक्षेप हो गया.

राज्‍यश्री प्रॉडक्‍शन का रंग बदला और होनहार सूरज के ‘हम आपके हैं कौन’ के साथ एकदम से भारतीय सिनेमा की हवा उलट गई. सुभाष घई की परदेस, ताल और पीछे-पीछे यश बाबू और उनकी टोली सब पूरब से हाथ झाडकर पश्चिमामुखी हुए. ‘दुश्‍मन’ और ‘दो रास्ते’ के राजेश खन्‍ना की गरीबी से ‘कभी खुशी कभी ग़म’ के महल ज्‍यादा प्राथमिक हो गये. रुपये महत्‍वपूर्ण थे, लेकिन डॉलर और पाऊंड-स्‍टर्लिंग की कमाई और ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण हो गई. देश की अंतरात्‍मा और बाहरी अपीयरेंस दोनों का एक झटके में पुनर्संस्‍कार हो गया था. मूल्‍यों की चिंता और बदलाव का सपना संजोनेवाले पर नाना पाटेकर सिनिकली और गोविंदा टांग खींचते हुए हंसते थे. गरीब-गुरबाओं, अर्द्धशिक्षितों, चोट खायों का समूचा मुल्‍क उनके साथ समवेत हंसता था. क्‍योंकि आज़ादी एक राष्‍ट्रीय छुट्टी और तिरंगा खरीदने और लहराने से अलग अब और कोई मतलब नहीं रखती थी. मगर यह सब बहुत बाद की बातें हैं. बात तो दरअसल नेहरु के ताज़ा-ताज़ा खडे किये जा रहे नये भारत से मोहभंग के साथ शुरु हुई थी. आईये, वहीं लौटते हैं.

सिनेमा तब ताक़तवर माध्‍यम था और आज से बहुत ज्‍यादा ताक़तवर था. नये हिंदुस्‍तान की कोंपलें फूट ही रही थीं और ऐसे माहौल में ज़रा कल्‍पना कीजिये, सिनेमाघरों के शांत अंधेरों में साहिर और रफ़ी की जुगलबंदी- ‘ये महलों, ये तख्‍तों, ये ताज़ों की दुनिया... जला दो, जला दो, मिटा दो ये दुनिया’ गूंजना शुरु करती होगी, क्‍या असर होता होगा उसका लोगों पर? किस कदर रोयें खडे होते होंगे? मुक्तिबोध की रचनायें बहुत स्‍वाभाविक है नेहरु के सिपहसलारों की नज़रों तक न चढी हों, मगर प्‍यासा के गाने तो रेडीयो सीलोन से लेकर दिल्‍ली के पनवाडियों, चांदनी चौक के बाज़ारों- हर जगह दिल्‍ली के हुक्‍मरानों की खीझ और झुंझलाहट का सबब बन रही होंगी. यह भी क्‍या संयोग है कि मुक्तिबोध और गुरु दत्‍त की मौत एक ही वर्ष में नहीं हुई, नेहरु का देहांत भी उसी वर्ष, 1964, में हुआ था. मुक्तिबोध लंबी बीमारी के बाद ब्रेन हेमरेज से मरे, गुरु दत्‍त का अंत ओवर कंस्‍पंशन से हुआ. –‘कहां हैं, कहां हैं, जिन्‍हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं...’ की बेचैनियां ज़ाहिर करनेवाली ‘प्‍यासा’ शायद मेधावी गुरुदत्‍त के करियर की सबसे अच्‍छी फिल्‍म थी. आखिर वे क्‍या ज़ख्‍म थे जिनको कुरेदते हुए गुरुदत्‍त ने अनायास ही हिंदी सिनेमा को उसका एक बेशकीमती उपहार दे दिया था?

बाकी कल या परसों...

(सबसे ऊपर: वहीदा रहमान, गाईड में. ग़ौर से इन आंखों की सुलगन पढिये. ये आंखें दुनिया को कैसे देखें इसकी असल शिक्षा गुरु दत्‍त प्रॉडक्‍शंस में ही दी गई थी. नीचे प्‍यासा में गुरु दत्‍त: हाथ में फूल लिये धूप से ओट करता कलाकार. कुछ ही पलों में धूप और बढेगी, और फूल ज़माने के पैरों के नीचे बेरहमी से कुचल ‍दिया जायेगा)


4 comments:

Abhay Tiwari said...

प्यासा की याद हमेशा रोमांचित कर देती है...मोहभंग की बात भी सही पकड़ी है आपने... प्यासा ५७ में आयी थी आज़ादी के दस साल बीत चुके थे...और मोहभंग का दौर शुरु हो गया था...श्री ४२० की रुमानियत तब तक धूमिल हो चुकी थी और.. मदर इन्डिया और गंगा जमना के साथ साथ फिर सुबह होगी जैसी फ़िल्मों दौर शुरु हो गया था.. गुरु दत्त अपने समय के प्रति एक प्रतिबद्धता महसूस करते थे...एक कलाकार होने की प्रतिबद्धता...सिर्फ़ वही नही उस काल के अन्य फ़िल्मकार भी इस दायित्व को समझते थे.. पर अब कलाकार की मौत हो गयी है.. क्योंकि अब कला बाज़ार मे खरीदी बेची जाती है...स्वान्तः सुखाय जैसी मूल्यवान बात को पहले वामपन्थियों ने लतियाया और बची खुची कसर बाज़ार ने पूरी कर दी...

सागर चन्द नाहर said...

आपने बहुत सुन्दर लेख लिखा पर इन पंक्तियों ने व्यथित किया
यह भी क्‍या संयोग है कि मुक्तिबोध और गुरु दत्‍त की मौत एक ही वर्ष में नहीं हुई, नेहरु का देहांत भी उसी वर्ष, 1964, में हुआ था. मुक्तिबोध लंबी बीमारी के बाद ब्रेन हेमरेज से मरे, गुरु दत्‍त का अंत ओवर कंस्‍पंशन से हुआ
नेहरू जी का देहांत हुआ और बाकी सबकी मौत हुई? मुक्तिबोध मरे? आप भारत के महान लेखकों कलाकारों की बात कर रहे हैं या सड़क पर ट्रक के पहियों के नीचे मरने वाले कुत्ते की?
www.nahar.wordpress.com

indiaroad said...

नाहर साहब, क्षमा चाहता हूं आपकी भावनाओं को मेरे शब्‍दों के चयन से ठेस लगी. दिमाग में दूसरी पेचिदगियां चल रही होंगी. देहांत और मौत की गरिमा और सामान्‍यता के फ़र्क का ध्‍यान छूट गया होगा. माफ़ कीजिये.
-प्रमोद सिंह

अविनाश said...

एक तो नाहर जी की पीड़ा और दूसरे प्रमोद सिंह की सफाई, दोनों ने व्‍यथित किया। हर शब्‍द की अपनी गरिमा और किसी शब्‍द का कोई अस्तित्‍व नहीं है। अस्तित्‍व हमेशा उस निचोड़ का होता है, जो हज़ार हज़ार शब्‍दों और हज़ार हज़ार वाक्‍यों के माध्‍यम से कहते हैं। नाहर जी जैसों की दिक्‍कत ये है कि वे शब्‍द मैथुन में इस कदर रत रहते हैं कि उन्‍हें लेख को अच्‍छा कहने के सिवा कुछ सूझता नहीं और प्रमोद सिंह जैसों की दिक्‍कत ये है कि उन्‍हें अपने (सायास-अनायास) लिखे पर भी इतना भरोसा नहीं होता कि ऐसे सवालों और ऐसे दुख को देख कर किनारे कर दें। शुक्रिया।