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11/08/2021

द ग्रेट व्‍हॉट, नो क्‍लू

देह पर 'बावर्ची' का कॉस्‍ट्यूम  चढ़ाये वैसे भी तबीयत किसी को थप्पड़ मारने को मचल रही थी. थप्पड़ नहीं मारा, किताब हवा में उछाल दिया. पतला-सा नॉवल था, अंग्रेजी में, बेशऊर उड़ा, बेहया तरीके से जया के पैरों के पास गिरकर ढेर हुआ. जया सूती फूलदार सिंपल साड़ी में थी, घुटनों पर हाथ जोड़े, बरामदे की सीढ़ि‍यों पर गुमसुम बैठी, सामने तकती जाने क्या सोच रही थी, गिरी किताब का नहीं सोचा. किताब गिरी रही. पेपरबैक. अंग्रेजी की. राजेश झींकता, आकर सीढ़ि‍यों के पहलू खड़ा हो गया. जया अपने में थी, नहीं ली नोटिस. स्टार को तक़लीफ़ हुई. स्टार को हमेशा तकलीफ़ होती रहती थी. तक़लीफ़़ होने के पहले ही वह बेचैन होने लगता कि हो रही है, और आस-पास दूसरे परेशान कैसे नहीं हो रहे? दूसरों की परेशानी की स्टार बहुत सोचता. फ़ि‍लहाल वह जया के परेशान नहीं होने से परेशान था. 

राजेश : तुम्हारे लंबू ने पढ़ी है ये किताब?

राजेश ने ज़मीन पर बेमतलब हो रही पेपरबैक की तरफ़ इशारा किया. जया ने इशारा देखा, किताब नहीं देखी. 

जया : प्लीज़, काका, मैं फिर कह रही हूं, आप अमित जी को लंबू मत बुलाया करो! 

काके ने जवाब नहीं दिया. लेने का काका को शौक था, देना, साधारण जवाब भी, काका को बेचैन और परेशान करता. ऋषि दा को भी शिकायत थी काका आनसर क्यूं नई करता? माथाये पाथर कलेक्शन किया है, क्या  रे? नो जवाब. नथिंग. तुमारा आगे मैं टोटल टायर हो जाता, काका, सच्ची! 

अमित जी लंच के बाद अनवर अली और जलाल आगा के साथ जलाल की फियट में आये. फुसफुसाकर जया से कहा आपके हीरो ने मुझे हलो नहीं कहा. फिर. जया ने हाथ की किताब अमित के हाथ थमाते सवाल किया, ये पढ़ा है आपनेे?

फित्ज़जैरल्ड . ग्रेट गेट्सबाई. अमित ने सवा सौ पृष्‍ठों के पेपरबैक के पेज़ उलटे-पुलटे. जया को बुक बैक कि‍या, मुंह फेरकर कहीं और देखने लगेे. 

उस लड़की को नहीं देख रहेे थे जिसे उड़ती नज़रों से 555 के तीन कश लेते एक भरी नज़र काका ने देखा और थोड़ा असमंजस में परेशान होते रहे कि शायद बंगाली है. शायद ऋषि दा के पीछे-पीछे आई है. मगर अभी तक ऑटोग्राफ़ के लिए मेरे पास क्यों नहीं आई? इसने पढ़ी होगी किताब? चूमना जानती है? रियल चुम्मी ? तब तक फिर किताब का ख़याल आया और शक्ति (सामंत) से झुंझलाहट हुई. क्या सोचकर दी थी किताब? या सचिन (भौमिक) ने दी थी? राजेश को याद नहीं. राजेश याद करना चाहता है सुबह सात बजे किसी प्रोड्यूसर का फ़ोन आया था. गुजरात में प्रापर्टी खरीद देगा जैसी बकवास बातें कर रहा था. राजेश ने गालियां देकर उसका मुंह बंद किया था. या गालियां रुपेश (कुमार) ने दी थी? राजेश को याद नहीं. 

दादा का एक असिसटेंट भागता आया, सुरेश, या दिनेश. काका, आपके लिए फ़ोन है- नंदा मैम का! 

ये क्‍या चाहती है? मैं इसके साथ अब और फि‍ल्‍म करना नहीं चाहता! 

राजेश ने कहा जाकर बोलो, शॉट चल रहा है.  

सुरेश, या दिनेश, पलटकर जाने को हुआ, काका ने पीछे से आवाज़ दी, सुन! गाना जानता है?

लड़का अब लड़का नहीं रहा था, फिर भी काका को हमेशा समझ लेना उसी के क्या, उसके उस्ताद के भी वश की बात न थी.  

हां और ना और हां के बीच की किसी मुद्रा में उसने सिर हिलाया. 

राजेश ने एकदम से गाना शुरु किया. तुझपे फ़िदा, मैं क्यूँ हुआ, आता है गुस्सा मुझे प्यार पे, मैं लुट गया.. मान के दिल का कहा, मैं कहीं का ना रहा, क्या कहूँ मैं दिलरुबा, बुरा ये जादू तेरी आँखों का, ये मेरा क़ातिल हो गया.  गुलाबी आँखें, जो तेरी देखी, शराबी ये दिल हो गया. 

जा, नंदा से बोलना काका इज़ मिसिंग यू! और सुन, ये किताब लिये जा, पूछना उसने पढ़ी है?

(किताब अंजू महेन्‍द्रू ने भी कहां पढ़ी थी? मुमताज़ का मानना है उसने काका को भी ठीक से नहीं पढ़ा. शशि कपूर का मानना रहा खन्‍ना वॉज़ अ बैड बुक. यू कुड गो ऑन रीडिंग हिम फॉर आवर्स, दैन ‍रियलाइज़ यू वर नॉट रीडिंग, द बुक वॉज़ नेवर देयर, इन फैक्‍ट देयर वॉज़ नथिंग देयर. डिंंपल कहती हि‍ वॉज़ अ बैड एक्‍टर, शशि कपूर, एक्‍सेप्‍टेड. बट द मैन वॉज़ अ ग्रेट चार्मर. एंड अ गुड रीडर ऑफ पीपल. शशि साहब ने ही कहा तुम सत्‍यदेव दुबे के नाटकों से दूर रहो, बच्‍ची हो, बरबाद हो जाओगी.) 

12/06/2011

देव साहब और देवानंद

इस क़यास के अब क्‍या मायने कि ज़ीनत और ज़ाहिदा की नज़रों से खुद को देखने से अलग, देव साहब ने रोस्‍सेलिनी और दी सिका की फ़ि‍ल्‍में कभी देखी थी या नहीं. करीयर की शुरुआत के साथी गुरुदत्‍त के काम को ही कितना, किन नज़रों से देखते रहे थे, और ‘गाइड’ के सेट पर वहीदा से कभी कैज़ुअली पूछा था या नहीं कि “वहीदा, माई स्‍वीटहार्ट, मगर क्‍या ज़रुरत थी गुरु को ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या है’ जैसे नेगेटिव लिरिक्‍स रफ़ी साब से गवाने की? 'लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा' नहीं गवा सकते थे? द वर्ल्‍ड नीड्स पॉज़ि‍टिव एनर्जी, यू सी?” हो सकता है न पूछा हो. हो सकता है ‘वहीदा, माई स्‍वीटहार्ट’ कहने के बाद उदयपुर के महाराजा की भलमनसी और लंदन की सुरमई सांझों की याद में जाम पीते रहे हों, गुरुदत्‍त का एक मर्तबे ज़ि‍क्र तक न किया हो. हो सकता है देव साहब ने ‘क़ागज़ के फूल’ देखी भी न हो.

कौन थे देव साहब? क्‍या राजू गाइड उन्‍हें जानता था? छोटा भाई विजय आनंद तो उन देव साहब को नहीं ही जानता था जो टैड दानियेलेव्‍स्‍की और पर्ल बक के साथ नारायण की किताब ‘गाइड’ की एक अमरीकी खिचड़ी तैयार करने के बाद उसके एक हिंदुस्‍तानी ऑमलेट की तैयारी में (मदद के नाम पर) गोल्‍डी को ‘उलझाना’ चाह रहे थे. बाद में ‘गाइड’ का हिंदी वर्ज़न बना तो टैड और बक के पीछे-पीछे शामिल बाजा, सैंडविच होने के बिना, और विजय आनंद की अपनी शर्तों पर बना, क्‍योंकि देव साहब के रास्‍तों पर सिर्फ़ देव साहब ही चल सकते थे, वह बंशी और किसी से न बज सकती. वह फ़ि‍ल्‍म तो कतई न बन सकती जो कोई विजय आनंद बनाना चाहता. सन् सत्‍तर में ‘प्रेम पुजारी’ से शुरु करके सन् ग्‍यारह के ‘चार्जशीट’ तक के चालीस वर्षों में लगभग बीस फ़ि‍ल्‍मों का निर्देशकीय सफ़र निपटा चुके देव साहब का उत्‍साह बेमिसाल और लाजवाब है, मगर उस यात्रा के पीछे के व्‍यक्ति को समझना टेढ़ी खीर है, सबके बस की बात नहीं. शायद गोल्‍डी आनंद के बस की भी न रही हो. संभव है ‘स्‍वामी दादा’ और ‘अव्‍वल नंबर’ के आस-पास कभी हाथ जोड़ कर गोल्‍डी तक ने माफ़ी मांग ली हो कि “अब मैं आपकी फ़ि‍ल्‍में नहीं देख सकता, सॉरी,” और उन्‍नीस सेकेंड के गंभीरतम पॉज़ के बाद इतना और जोड़ा हो, “और हां, देव साहब, बुढ़ापे में अब जाकर यह बात समझ आई, कि मैं आपको कभी जान नहीं सका, हू आर यू?

यह अंतिम पंक्ति गोल्‍डी आनंद ने नहीं कही थी, मेरी कल्‍पना मुझसे कहलवा रही है. क्‍योंकि ‘गैंगस्‍टर’, ‘मैं सोलह बरस की’, ‘सेंसर’, ‘लव एट टाईम्‍स स्‍क्‍वॉयर’, ‘मिस्‍टर प्राइम मिनिस्‍टर’ (और देव साहब का बस चलता तो लंदन और न्‍यूयॉर्क से जाने अभी क्‍या-क्‍या शूट करते होते, इंटरनेट के दौर में वह अनंतकाल तक हमारी आंखों के आगे उतरता, तैरता रहता) के बाद सवाल रह ही जाता है कि कौन थे देव साहब? राजू गाइड तो उन्‍हें नहीं ही जानता था, गोल्‍डी आनंद भी नहीं जानते थे, फिर किशोर साहू, सचिन दा, ज़ाहिदा, ज़ीनी बेबी कौन जानता था उन्‍हें? पत्‍नी कल्‍पना कार्तिक जानती थी? पुत्र सुनैल आनंद? ग्रैगरी पेक, सुरैया, एनीवन, एनीबडी? वॉज़ देव साहब रियल? आई मीन रियली, रियल?

हमारे घर में देव साहब को कोई नहीं जानता था. जबकि देवानंद की बात एकदम अलग थी. चचेरी, ममेरी, फुफेरी बहनें ही नहीं, उनकी मम्मियां, मामा, हमारे स्‍कूल के पीटी टीचर से लेकर होम साइंस की आंटी और हमारे साइकिलों का पंचर पीटनेवाला नंदू, सब नाक-भौं बनाने की घटिया एक्टिंग (देवानंद की ही तरह) कितनी भी क्‍यों न करते रहे हों, मन ही मन सब देवानंद को पसन्‍द करते थे. रस्‍सी पर सूखने के लिए साड़ी डालते हुए कोई भी मौसी गाने लगती ‘दिल पुकारे, आ रे आरे आरे?’ आंखों में प्रेम के डोरे लहराती मौसी का देवानंद को पुकारना मौसों, चाचाओं और उनके भैयों को उलझन व तनाव में नहीं लपेटता था. सब जानते होते देवानंद को गुहारने में एक निर्दोष हंसी की निर्दोष कामना होती, कोई 'संसारी' स्‍वार्थ न होता, ‘फूल और पत्‍थर’ के धर्मेंदर की दैहिक ताप और ‘दिल एक मंदिर’ के राजिंदर कुमार की आंसू-बहावक भाप न होती. ‘अरे यार मेरे तुम भी हो ग़ज़ब’ और ‘शोखियों में घोला जाये थोड़ा-सा शबाब’ गाते हुए, गाल में हल्‍की दरार दिखाकर देवानंद ज़रा-सा हंस देते, मौसियों का मलिन फ़ीकापन, दिन, संवर जाता, ऐसे मीठे और इतनी ज़रा-सी ही तो उम्‍मीद थे देवानंद. मेले में मां की गोद के बच्‍चे को दीखे दूसरे बच्‍चे के हाथों लाल गुब्‍बारे की तरह. उसके बियॉंड सब जानते पैरों पर लंबे हाथ गिराये, ज़रा-सा कंधा उचकाये, उतरती ढलान पर ‘आज की सारी रात जायेगी, तुमको भी कैसे नींद आयेगी’ गुनगुनाते देवानंद एक छोर से भागते दूसरे छोर निकल जायेंगे, ‘खोया-खोया चांद’ और ‘खुले आसमानों’ का मोहक ख़्याल बचा रहेगा, गाने और देवानंद की चमकती, निर्दोष बहक गुज़र जाने की खाली जगह में उसके बाद कोई वास्‍तविक प्रेम और उसके निटी-ग्रिटी सोर्ट आउट करता वास्‍तव का प्रेमी- ‘आवारा’ का राज कपूर, या ‘देवदास’ का दिलीप कुमार-सा ही सही- नहीं होगा.

शायद इसीलिए सब, और अवचेतन में बहुधा बिना-जाने- और राज कपूर और दिलीप कुमार की बनिस्‍बत कहीं ज़्यादा- देवानंद को प्‍यार करते थे. क्‍योंकि देवानंद के होने में एक साफ़-सुथरी हंसी के आश्‍वासन से अलग समय और समाज की पेचिदगियों की कोई मांग न होती. समय और समाज में ‘जीने की तमन्‍ना’ को निरखती, सिरजती रोज़ी को कनखियों में सराहता राजू हमेशा निष्‍पाप और बहुत सच्‍चा लगता, हां, एक केले की भूख में चेहरा मरोड़ते उसे देखते ही मगर दर्शक जान जाता देवानंद भूखा होने की एक्टिंग कर रहा है. वास्‍तविक कैसी भी परिस्थिति में प्‍लेस होते ही देवानंद एकदम सहजता व आसानी से अवास्‍तविक हो जाते, जबकि ‘ओ मेरे हमराही, मेरी हाथ थामे चलना, बदले दुनिया सारी, तू ना बदलना’ में पक्‍का भरोसा होता कि देवानंद हमेशा हाथ थामे होंगे, उनकी हंसी कभी नहीं बदलेगी. यही, इतना देवानंद का चार्म था. उनकी विशिष्‍टता, उनका अनूठापन. वह अपनी हिरोइनों को सच्‍चे आशिक की तरह बराबरी की संगत देते थे, 'आवारा' के राजू की तरह कभी अपनी नर्गिस के बाल खींचकर मोहब्‍बत का इसरार न करते, किसी दु:स्‍वप्‍न में भी नहीं, न 'पत्‍थर के सनम, तुझे हमने खुदा जाना' का शिकायती शोर उठाते, दिल टूटता तो हाथ में जाम लिये दबी आवाज़ गुनगुनाते 'दिन ढल जाये, रात न जाये', और गा चुकने के बाद धुले चेहरे के साथ बाहर आते तो 'तीन देवियां' की नंदा ही नहीं, कल्‍पना और सिमी सब यक़ीन करतीं कि देवदत्‍त उनका और सिर्फ़ उन्‍हीं का है. 

देवानंद उतना ही रियल थे जितना रियल टिनटिन है, जैसे एक पूरी पीढ़ी के लिए एल्‍वीस प्रेस्‍ली का होना, उस रोमान में नहाये, जीवन जीना हुआ. इस मायने में वे शायद भारतीय सिनेमा के अकेले, अनूठे मिथकीय सुपरस्‍टार साबित हों. अलबत्‍ता ‘हम एक हैं’ से ‘चार्जशीट’ के देव साहब की कहानी कहीं ज़्यादा टेढ़ी है, मगर जैसा मैंने पहले कहा ही, देवानंद को प्‍यार करनेवाले ढेरों लोगों को मैं जानता हूं, देव साहब को कौन जानता है?

9/02/2011

बचपन के मॉर्निंग शोज़ और अन्‍य ब्‍ल्‍यूज़..

अब सोचकर हैरानी होती है, कि कैसा किस तरह की संगठनात्‍मक समझ थी, क्‍या इकॉनमी थी, कि आज से लगभग पैंतालीस साल पहले, उड़ीसा-से पिछड़े राज्‍य के एक टिनहा शहर में एक से एक सारी फ़ि‍ल्‍में पहुंच जाती थीं? रेगुलर रन में न भी हों तो मॉर्निंग शोज़ में जगह बनाई चली ही आती थीं. ग्रेगरी पेक की ‘रोमन हॉलिडे’, ‘मकेनाज़ गोल्ड‍’ से लेकर ‘ज़ुलू’, देवानंद की 'जाली नोट’, ‘काला बाज़ार’, ‘बात एक रात की’, लीन की ‘रायन्‍स डॉटर’, ‘ब्रीफ एनकाउंटर’, शेख मुख़्तार और संजीव कुमार की खूंखार काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍में, बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘प्रेमपत्र’ सारी की सारी तभी देखी थी जब अभी- अंग्रेजी नहीं हिंदी में ही- ग्रेगरी लिखने की तमीज नहीं बनी होगी, और ऑलमोस्‍ट सब फ़ि‍ल्‍में मॉर्निंग शोज़ में ही देखी थीं. ज़्यादातर कोर्णाक टाकीज़ में (कौन पागल था जो ऐसा सिनेमा चला रहा था? पिछले दस वर्षों की जितनी खबर है उसके अनुसार अब वहां सिर्फ़ उड़ि‍या फ़ि‍ल्‍में ही दिखाई जाती हैं!). मगर बचपन के उन भोले, तंगहाल दिनों में भी, बु‍द्धि इतनी खुल गई थी कि आमतौर पर अच्‍छे लगते बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’ के रोने-धोने से उकताहट होती; उस तरह के जितने रोवनिया, और फलतुआ के हंसोड़, चाइल्‍ड आर्टिस्‍ट थे उन सब रतन कुमारों, सुधीर और सुशील कुमारों को धर-धरके थुरियाने की इच्‍छा होती, कि अबे होनहारी के नालायको, तुम्‍हारी उम्र के बच्‍चे ऐसे होते हैं? (या होते होंगे तभी हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍में ऐसी रोवनिया-बहार, भदर-भदर भावकुंड में नहाई भावना-अंगार बनती हैं?). अपनी बुद्धि में रतन कुमारों, बेबी नाज़ों से तब भी शेख़ मुख़्तार ज़्यादा भला, भोला और निष्‍पाप लगते. कोई बच्‍चा अच्‍छा लगता तो वो ‘कारवां’ और ‘आन मिलो सजना’ का जूनियर महमूद होता. अच्‍छे बालकों की होनहार नालायकीयत की हाय-हाय की बनिस्‍बत उसके हरामीपने सॉलिड और सुहाने लगते.

ख़ैर, मैं फिर बहक गया (वैसे ईश्‍वर जहां कहीं भी हों जूनियर महमूद को सुखी रखे. ईश्‍वर जहां कहीं भी हैं या नहीं मालूम नहीं, मगर जानता हूं जूनियर महमूद इसी शहर में है, मगर कितना सुखी है नहीं जान रहा हूं. इसी शहर में रहते हुए मैं ही कहां सुखी हो पा रहा हूं?).. बात बचपन के मॉर्निंग शोज़ की हो रही थी. अच्‍छे लगते 'हाउस नंबर 44' की कल्‍पना कार्तिक और ‘दो बीघा ज़मीन’ के बाहर के बिमल रॉय की हो रही थी. याद है ‘प्रेमपत्र’ देखते हुए मैं बहुत भावुक हुआ था. तलत महमूद की आवाज़ में गाते हुए शशी कपूर और अच्‍छी साधना के बीच की ग़लतफ़हमी कितनी जल्‍दी खत्‍म हो (कि ओ भगवान, नहीं ही होगी?) के तनाव में बगल की सीट पर बैठे अपने दोस्‍त को किसी भी क्षण तीन थप्‍पड़ मार सकता था (या बाहर, साईकिल स्‍टैंड में जाकर बारह साइकिलों के ट्यूब की हवा खोल दे सकता था, ओ गॉड!). ओह, जीवन में कहीं नहीं था, मगर प्रेम की मिसअंडरस्‍टैंडिंग की भीनी अनुभूतियों के कैसे सुहाने दिन थे! तलत महमूद गाता शशी कपूर ही नहीं, एक और लव इंटरेस्‍ट प्‍ले कर रहा (बाद के दिनों में विलेन का टुटपुंजिया दाहिना हाथ) सुधीर भी अच्‍छा लगता.

समझदार लोगों ने ही नहीं, मैंने खुद तक, खुद से दर्जनों मर्तबा कहा है पीछे छूटी चीज़ों को पीछे मुड़कर मत पकड़ों, हाथ का करंट ही नहीं लगता, दिल पर भी बहुत ठेस पहुंचती है, मगर देखिए, हाथ हैं कि पीछे छूटकर बीच-बीच में कुछ टटोल आने से बाज नहीं आते. सदियों पहले अर्नस्‍ट लुबिश की कुछ फ़ि‍ल्‍में देखी थीं, फिर से टटोलता ‘द शॉप अराउंड द कॉर्नर’ और ‘टू बी ऑर नॉट टू बी’ में घुसा और उनकी सरल कसावट से लाजवाज हो गया. चालीस के दशक की फ़ि‍ल्‍में और अभी तक एकदम, ज़रा भी बासी नहीं हुई हैं. मगर वह सिर्फ़ लुबिश और अच्‍छे हॉलीवुड का मामला नहीं है, तिरालीस की बनी इटली के विस्‍कोंती की ‘ओस्‍सेसियोने’ देखिए, वह इतने वर्षों के फ़ासले पर अभी भी एकदम आधुनिक लगती है, या सत्‍तावन की ‘द व्‍हाइट नाइट्स’, कहीं से भी ‘डेट’ नहीं हुई. बचपन की देखी हिंदी की ‘गंगा जमुना’ थी (निर्देशक: नितिन बोस. शायद एक के बाद एक उसे तीन मर्तबा तो ज़रूर ही देखा होगा, अभी कुछ दिनों पहले फिर देखा तो मन के ट्यूब की सारी हवा निकल गई, बड़ा खाली-खाली-सा लगा कि दिलीप कुमार ही नहीं, वैजयंती माला, कन्‍हैया लाल तक अच्‍छे लगते हैं, डायलाग कसे लिखे गए हैं, मगर सब अंतत: शुद्ध किस्‍सागोई ही है, उससे ज्यादा की आकांक्षा फिल्‍म कहीं करता नहीं दिखता, और ढाई घंटे की फ़ि‍ल्‍म में शुद्ध सिनेमाई आनंद कहें तो आठ मिनट से ज्यादा आपको नहीं मिलता! मुझे नहीं ही मिला. वैसे ही बिमल राय की सन् साठ में बनी एक फ़ि‍ल्‍म है, ‘परख’. संगीत के साथ कहानी भी सलिल चौधुरी की है, मोतीलाल और अच्‍छी साधना है, (गाने सब प्‍यारे हैं. ग्रेट सलिल चौधुरी.) मगर एक बेसिक-सी कहानी कहने से अलग फ़ि‍ल्‍म और कुछ करती नज़र नहीं आती. एक गाने के पिक्‍चराइज़ेशन से अलग दस दिन पहले की देखी फिल्‍म का अब मैं अलग से कुछ भी और याद नहीं रखना चाहता.

इक ज़रा-सी पिद्दी किस्‍सागोई तक ही जाकर कहां, क्‍यों अटक जाती हैं हमारी हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍में? या हमारी हिन्‍दी का साहित्‍य ही? ऐसा बाहर के संसारों में ही होता है, क्‍यों होता है, कि पॉपुलर फ़ि‍ल्‍म बनानेवाले भी ‘जुलिया’ और ‘द फिक्‍सर’ जैसी पेचीदा, रिस्‍की स्‍टोरीटेलिंग में न केवल उतरें, उसे करीने से निबाह भी जायें? ‘हाई नून’ सा कसा वेस्‍टर्न बनानेवाला फ़ि‍ल्‍ममेकर ही ‘ए मैन फॉर ऑल सीजंस’ जैसी मुश्किल घड़ी में जीवन कैसे जियें की विमर्शवादी फ़ि‍ल्‍म भी किस सरस नफ़ासत से बनाये लिये जाता है? या ‘ग्रां-प्री’ और ‘द ट्रेन’ जैसी एक्‍शन फ़ि‍ल्‍मों का निर्देशकफिक्‍सर’ जैसी दार्शनिक स्‍टोरीटेलिंग में घुसने का रिस्‍क उठाता है! एलेन बेट्सज़ोरबा द ग्रीक’ का मानवीय उच्‍छावास ही नहीं, ‘वीमेन इन लव’, ‘एन अनमैरिड वुमन’ के साथ ‘द फिक्‍सर’ जैसी टेढ़ी, भारी फ़ि‍ल्‍म में अभिनय करने का ज़ोखिम उठाता है?

पूरा जीवन सिनेमाटॉग्राफी में खपाने, ‘मेफिस्‍टो’, ‘आंगी वेरा’ जैसी अनूठी से लेकर ‘मलेना’ सी चिरकुटई शूट कर चुकने के बाद, अपने लंबे करियर के दूसरे छोर पर आकर, लाजोस कोलताई- एक सिनेमाटॉग्राफ़र- अपनी पहली फ़ि‍ल्म‍ का निर्देशन अपने हाथ में लेता है तो वह ‘ज़ि‍न्‍दगी ना मिलेगी दोबारा’ का रोमानी कोलतार सजाने की जगह होलोकास्‍ट और ऑश्वित्‍ज़ के मुश्किल बीहड़ में न केवल उतरा जाता है, उसे बिना ˆलाइफ़ इज़ ब्‍यूटिफुल’ का भदेस बनाये खूबसूरत, सघन मार्मिक सिनेमाई पाठ भी बनाये लिये जाता है? एकदम उम्‍दा कास्टिंग, एन्नियो मोरिकोने का प्‍यारा बैकग्राउंड स्‍कोर, और उन्‍नीस सौ पचहत्‍तर में लिखे अपने पहले उपन्‍यास 'फेटलेसनेस' पर खुद इमरे कर्तेज़ की लिखी खूबसूरत स्क्रिप्‍ट (हिंदी में किताब का अनुवाद वाणी ने छापा है, किसी ने पढ़ रखा हो तो बताये कैसा अनुवाद है).

कैसे बना लेते हैं लोग मुश्किल सिनेमा, जुलिया के जेसन रोबार्ड्स जैसी बिना बहुत देह हिलाये अनोठी एक्टिंग कर ले जाते हैं, जबकि हमारे यहां हम फकत एक गाने का पिक्‍चराइज़ेशन तक करके रह जाते हैं?

7/15/2010

सिनेमा का गल्‍प..

क्‍यों जाने भी दें यारो?..

क्‍या होता है सिनेमा? पता नहीं क्‍या होता है. छुटपन में सुना करते बहुत सारे घर बरबाद कर देता है. बच्‍चों का मन तो बरबाद करता ही है. बच्‍चे थे जब बाबूजी अपनी लहीम-शहीम देह सामने फैलाकर, बंदूक की तरह तर्जनी तानकर हुंकारते, ‘जाओ देखने सिनेमा, बेल्‍ट से चाम उधेड़ देंगे!’ चाम उधड़वाने का बड़ा खौफ़ होता, मगर उससे भी ज्यादा मोह खुले आसमान के नीचे 16 एमएम के प्रोजेक्‍शन में साधना, बबीता और आशा पारेख को ईस्‍टमैनकलर में देख लेने का होता. उन्हीं को नहीं जॉय मुखर्जी और शम्‍मी कपूर के फ़ि‍ल्‍मों के राजेंदर नाथ को, मुकरी, सुंदर, धुमाल, मोहन चोटी को देखने का भी होता. शंकर जयकिशन और ओपी नय्यर के गानों के पीछे सब कुछ लुटा देने का होता. मोह. जबकि उस उम्र में पास लुटाने को कुछ था नहीं. इस उम्र में भी नहीं है. तो वही. पता नहीं क्‍या होता है सिनेमा कि जीवन में इतने धक्‍के खाने के बाद अब भी ‘आनन्‍द’ के राजेश खन्‍ना को देखकर मन भावुक होने लगता है, जबकि बहुत संभावना है स्‍वयं राजेश खन्‍ना भी अब खुद को देखकर भावुक न होते होंगे.

सिनेमा सोचते ही ‘गाइड’ के पीलापन लिए उस पोस्‍टर का ख़याल आता जिसमें देवानंद के बंधे हाथों वहीदा रहमान का सिर गिरा हुआ है, और वह प्‍यार की आपसी समझदारी का चरम लगती, इतना अतिंद्रीय कि मन डूबता सा लगे. डूबकर फिर धीमे गुनगुनाने लगे, ‘लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा, आके मेरे हाथों में, हाथ न ये छूटेगा, ओ मेरे जीवनसाथी, तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं..’ कितने तो रंग होते सिनेमा के. इतने कि बचपन के हाथों पकड़ में न आते. ‘जुएलथीफ़’ का वह सीन याद आता है? भरी महफ़ि‍ल में अशोक कुमार हल्‍ला मचाते कि झूठ बोलता है ये आदमी, नहीं बोल रहा तो सबके सामने दिखाए कि इसके पैर में छह उंगलियां नहीं हैं? फिर देवानंद दिखाने को धीमे-धीमे अपने जूते की तस्‍में खोलते, फिर मोज़े पर हाथ जाता, देवानंद का टेंस चेहरा दिखता, महफ़ि‍ल के लोगों के रियेक्‍शन शॉट्स, अशोक कुमार की तनी भौंहें, फिर कैमरा मोज़े पर, धीमे-धीमे नीचे को सरकता, आह, उस तनावबिंधे कसी कटिंग में लगता देवानंद के पैर में पता नहीं कितनी उंगलियां होंगी मगर हम देखनेवालों का हार्ट फेल ज़रूर हो जाएगा! जैसे ‘तीसरी कसम’ के क्‍लाइमैक्‍स में वहीदा के रेल पर चढ़ने और हीरामन के उस मार्मिक क्षण ऐन मौके न पहुंच पाने के खौफ़ में कलेजा लपकता मुंह को आता. एक टीस छूटी रह जाती मन में और फिर कितने-कितने दिन मन के भीतर एक गांठ खोलती और बांधती रहती. फिर ‘पाक़ीज़ा’ का वह दृश्‍य.. कौन दृश्‍य.. आदमी कितने दृश्‍यों की बात करे? और बात करने के बाद भी कह पाएगा जिसकी उसने सिनेमाघर के अंधेरों में उन क्षणों अनुभूति की? ठाड़े रहियो ओ बांके यार, कहां, चैन से ठाड़े रहने की कोई जगह बची है इस दुनिया में?

चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो.. भाग जायें? छोड़ दें सबकुछ? और उसके बाद?

पता नहीं सिनेमा क्‍या होता है. सचमुच.

मगर यह सब बहुत पहले के सिनेमा की बातें हैं. टीवी, डिजिटल प्‍लेटफॉर्म, इंटरनेट से पहले की.

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इटली के तवियानी भाइयों की 1977 की एक फ़ि‍ल्‍म है, ‘पादरे पदरोने’, क्रूरता और अशिक्षा की रोटी पर बड़ा हो रहा एक गड़रिया बच्‍चा. दरअसल किशोर. सार्दिनीया के उजाड़ मैदानों में अपने भेड़ों के पीछे, कुछ उनकी तरह ही बदहवास और अचकचाया हुआ. रास्‍ता भूले दो मुसाफ़ि‍र उसी मैदान से गुजर रहे हैं. एक के हाथ में खड़खड़ाती साइकिल, दूसरा कंधे से लटकाये अपना अकॉर्डियन बजाता जा रहा है. उस बाजे के स्‍वर में, उस धुन में, कुछ ऐसी सम्‍मोहनी है कि गड़रिया किशोर तीरबींधा अपनी जगह जड़ हो जाता है. जड़ माने, जड़. कुछ पलों बाद चेतना लौटती है तो दूर सुन रहे बाजे के जादू में मंत्रमुग्‍ध पागलों की तरह फिर उसके पीछे भागा-भागा जाता है. अपने दर्शक को संगीत के जादू में, प्रत्‍यक्ष की उस इंटेंस अनुभूति में बांध लेने, बींध देने की यह अनूठी ताकत, यही है सिनेमा. जिन्‍होंने फ्रेंच फ़ि‍ल्‍मकार फ्रांसुआ त्रूफो की ‘400 ब्‍लोज़’ देखी है उन्‍हें खूब याद होगा फ़ि‍ल्‍म के आखिर का वह लंबा सीक्‍वेंस जब बच्‍चा आंतुआं कैद से भागकर ज़्यां कोंस्‍तांतिन के कभी न भूलनेवाले संगीत की संगत में समुंदर की तरफ दौड़ता है, जीवन के सब तरह के कैदों को धता बताती मुक्ति का जो वह निर्बंध, मार्मिक, आह्लादकारी ऑर्केस्‍ट्रेशन है वह मन के पोर-पोर खोलकर उसे आत्‍मा के सब सारे उमंगों में रंग देता है! यह ताक़त है सिनेमा की. और हमेशा से रही है, चार्ली चैप्लिन के दिनों से, और जब तक लोग सिनेमाघरों के अंधेरे में बैठकर फ़ि‍ल्‍में देखते रहेंगे तब तक रहेगी.

मगर रहेगी? क्‍यों रहेगी? ‘गाइड’ के राजू को रोजी़ की मोहब्‍बत तक न बचा सकी, फिर आज की रोज़ी तो आईपीएल के अपने स्‍टॉक की चिंता में रहती है, किसी राजू और राहुल के मोहब्‍बत को बचाने की नहीं, फिर किस मोहब्‍बत के आसरे सिनेमा अपने सपनों को संजोये रखने की ताक़त के सपने देखेगा? देख पाएगा? दिबाकर बनर्जी के ‘लव सैक्‍स और धोखा’ में कैसा भी मोहब्‍बत बचता है? माथे में ऐंठता गुरुदत्‍त के ‘प्‍यासा’ का पुराना गाना बजता है- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है!

अच्‍छाई के दिन गए. जीवन में नहीं बचा तो फिर सिनेमा में क्‍या खाकर बचता. जो बचा है वह पैसा खाकर, या खाने के मोह में बचा है. बॉक्‍स ऑफिस के अच्‍छे दिनों की चिंता बची है, अच्‍छे दिनों की अच्‍छाई की कहां बची है, क्‍योंकि आदर्शों को तो बहुत पहले खाकर हजम कर लिया गया. और ऐसा नहीं है कि कुंदन शाह के ‘जाने भी दो यारो’ में पहली बार हुआ कि सतीश शाह केक की शक्‍ल में आदर्शों को खाते दीखे, तीसेक साल पहले गुरुदत्‍त ऑलरेडी उन आदर्शों को फुटबाल की तरह हवा में लात खाता देख गए थे. समझदार निर्माता और बेवकूफ़ दर्शक ही होता है जो मोहल्‍ले के लफाड़ी किसी मुन्‍ना भाई की झप्पियों से आश्‍वस्‍त होकर मुस्‍कराने लगता है, या चिरगिल्‍ले सरलीकरणों के इडियोटिक समाधानों का जोशीला राष्‍ट्रीय पर्व मनाने, ऑल इज़ वेल को राष्‍ट्रीय गान बनाने, बजाने लगता है.

कहने का मतलब हम सभी जानते हैं ‘ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना’ गाने का मतलब नहीं. जीवन से अच्‍छाई के गए दिन फिर लौट कर नहीं आते. सिनेमा के झूठ की शक्‍ल में भी नहीं.

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झूठ कह रहा हूं. बुरे दिनों की कहानियां अच्‍छे अंत के नोट पर खत्‍म होती ही हैं. अच्‍छे दिन सिनेमा की झूठ की शक्‍ल में लौटते ही हैं. बार-बार लौटते हैं. न लौटें तो मुख्‍यधारा के हिंदी सिनेमा के लौटने की फिर कोई जगह न बचे. श्री 420 से शुरू होकर मिस्‍टर 840 तक हीरो का अच्‍छाई पर अंत लौटाये लिये लाना ही हिंदी फ़ि‍ल्‍म में समाज को संदेश है. अच्‍छे रुमानी भले लोगों का इंटरवल तक किसी बुरे वक़्त के दलदल में उलझ जाना, मगर फिर अंत तक अच्‍छे कमल-दल की तरह कीचड़ से बाहर निकल आना के झूठे सपने बेचने की ही हिंदी सिनेमा खाता है. एक लातखाये मुल्‍क में दर्शकों के लिए भी सहूलियत की पुरानी आदत हो गई है. कि लातखाये जीवन में शाहरुख और आमिर के न्‍यूयॉर्क या मुंबई की जीत को वह बिलासपुर और वैशाली के अपने मनहारे जीवन पर सुपरइंपोज़ करके किसी खोखली खुशहाली के सपनों की उम्‍मीद में सोये रहें. जीवन में कैसे अच्‍छा होगा से मुंह चुराते, सिनेमा में अच्‍छा हो जाएगा को गुनगुनाते सिनेमा में जागे और जीवन में उनींदे रहें.

जबकि सिनेमा, सिनेमा में सोया रहेगा. वह बुरे दिनों के इकहरे, सस्‍ते अंत के सपने खोज लाएगा, बुरे दिनों की समझदार पड़ताल में उतरने की कोशिश से बचेगा. उसके लिए कितने रास्‍तों का आख्‍यान बुनना, कैसी भी जटिलता में पसरना, मुश्किल होगा. क्‍योंकि अपनी लोकोपकारी (पढ़ें पॉपुलिस्‍ट) प्रकृति में वह राज खोसला के ‘दो रास्‍ते’ के बने-बनाये पिटे रास्‍ते पर चलना ज़्यादा प्रीफर करेगा, जिसमें लोग, लोग नहीं, कंस और कृष्‍ण के अतिवादी रंगत में होंगे. अच्‍छे (बलराज साहनी) और बुरे (प्रेम चोपड़ा) की दो धुरियां होंगी और नायक जो है, हमेशा अच्‍छे के पक्ष में खड़ा दीखेगा और फ़ि‍ल्‍म का अंत हमेशा ‘बिंदिया चमकेगी, चूड़ी खनकेगी’ के खुशहाल ठुमकों के पीछे अपने को दीप्ति दे लेगी. मतलब राय के बांग्‍ला ‘अरेण्‍येर दिन रात्री’ से परिवेश व जीवन के अंतर्संबंधों की व्‍याख्‍या तो वह नहीं ही सीखेगा, गुरुदत्‍त के ‘प्‍यासा’ की पारिवारिक और प्रेम (माला सिन्‍हा) की भावपूर्ण समीक्षा को भी अपनी अपनी समझ की परम्‍परा में जोड़ने से बचा ले जाएगा. ‘सारा आकाश’ और ‘पिया का घर’ की टीसभरी सफ़र पर निकलनेवाले बासु चटर्जी को चित चुराने और कुछ खट्टा कुछ मीठा बनानेवाले लाइट एंटरटेनर में बदल देगा. मतलब हिंदी सिनेमा में बुरे दिनों का एंटरटेनमेंट बना रहेगा, अच्‍छे दिनों को पहचानने की समझदारी की उसमें जगह नहीं बनेगी.

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एक कैमरामैन मित्र मुझसे कहता है इतने वर्षों बाद भी हम वही रामायण वाली कहानी ही कह रहे हैं. रावण को धूल चटाकर रामबाबू सीताबाई के संग अयोध्‍या लौटे टाइप. मैं खीझकर कहता हूं कुछ महाभारत वाला तत्‍व भी होगा. मित्र कहता है होगा ही, लेकिन महाभारत की जटिलता हम सीधे मन के टेढ़ों लोगों के लिए अपच पैदा करती है, तो वहां से भी उठाई चीज़ भी भाई लोग रामायण के सांचे में ढालकर ही सुनायेंगे!

एक बड़ा तबका है, बुद्धिभरा तबका भी है, जो हिंदी सिनेमा के हमारी अति विशिष्‍ट भारतीय शैली के कसीदे गाता है. माने हमें दुनिया से कुछ सीखने की ज़रूरत नहीं, हम दुनिया को सीखा देंगे वाला गाना. पिटे हुए मुल्‍कों में ऐसा अहंकारी राग गानेवाले हमेशा ऐंठे हुए कुछ कैरिकेचर टाइप होते हैं. वे यह तक नहीं मानते कि पिटे हुए हैं. बिना बात रहते-रहते हम तब से लगे हैं जब दुनिया कहीं नहीं थी जैसा डायलॉग बोलने लगते हैं. दम भर सांस लेकर फिर हमीं ने दुनिया को सबसे पहले चेतना, विमान, म्‍यूजिकल और सपना देखने के अरमान दिये, फिर आप भूलो मत! टाइप चुनौती. ऐसे अति विशिष्‍टी अहम को फिर कहां कुछ सीखने की ज़रूरत है? भले सिनेमा में अगले हफ़्ते ‘मस्‍ती: पार्ट टू’ और ‘गोलमाल: पार्ट थ्री’ चढ़ रही हो!

सही भी है दुनिया हमसे सीखे, इरान ने आखिर हिंदी फ़ि‍ल्‍में देख-देखकर ही अपने यहां सिनेमा की नींव डाली, और नब्‍बे के बाद से घूम-घूमकर दुनिया भर के फ़ि‍ल्‍म समारोहों में इनाम पर इनाम बटोर रही है, तो इरान को फ़ि‍ल्‍म बनाना हमने सीखाया नहीं? अच्‍छा है इनाम बटोर रही है लेकिन हम भी तो पैसा बटोर रहे हैं. और ईनाम भी बटोरा है. डैनी बॉयल का बटोरना और हमारा एक ही बात है. आशुकृपा और कृपादृष्टि तो अंतत: हमारी ही है. जो लंबी यात्रायें की हैं हिंदी सिनेमा ने वह तुम्‍हारा मलिन मन कहां से देखेगा? कितना बटोरा है इसका कोई अंदाज़ है? शक्ति सामंत और मनमोहन देसाई के ज़माने में रुपल्लियों में बटोरते थे, अब करण जौहर और चोपड़ाओं के दौर में डॉलर और यूरो में बटोर रहे हैं. समूची दुनिया का भट्टा बैठ जाएगा मगर आप सुन लो, हमारा बॉलीवुड फिर भी बैठेगा नहीं, राज करेगा, यू गेट ईट? वी आर लाइक दिस ऑनली!

पश्चिम में भी कुछ तिलकुट इंटैलेक्‍चुअल टाइप हैं, पीछे कोरस में स्‍माइल देकर गाते हैं, नथिंग गोन्‍ना चेंज द वर्ल्‍ड, दे आर लाइक दिस ऑनली!

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ये मैं कहां किन ओझाइयों, ओछाइयों में उलझता, गिरता गया हूं? सिनेमा को इतने ओछे स्‍तर तक उतारते लाने की कोई वज़ह है? जो सलीका और तमीज़ सिनेमा से पाया, उसे इस बेमतलब, पैसातलब नज़रिये के सियाह धुंओं में बिसरा दें? इसी दिन के लिए देखा था व्‍ही शांताराम की ‘माणुस’ और महबूब ख़ान की ‘रोटी’, ‘अंदाज़’, ‘अमर’ ? केदार शर्मा की ‘जोगन’? उलझी दुनिया को पढ़ने की वह सुलझी नज़र भूल गया? यही दिन देखने के लिए दिलीप साहब ने ‘गंगा जमुना’ लिखी, पैसे लगाये, नितिन बाबू ने जान झोंककर फ़ि‍ल्‍म खड़ी की? ‘बसंत क्‍या कहेगा’ की कहानियां लिखनेवाले बलराज साहनी ने सलीम मिर्जा़ का सबकुछ एक लंबी सांस खींचकर बरदाश्‍त करते जाने वाला ज़ि‍न्‍दा किरदार निभाया (‘गर्म हवा’)?

जीवन में प्रेम हमेशा ज़रूरी नहीं मिले, एक शादी मिल जाती है और उसे निभाना पड़ता है. खुद मैं कितने वर्षों निभाता रहा, चार साल की उम्र रही होगी जब से देखता रहा हिंदी फ़ि‍ल्‍में. ‘हरे कांच की चूड़ि‍यां’, ‘काजल’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘बीस साल बाद’, ‘प्‍यार का मौसम’, ‘सावन की घटा’, ‘जब प्‍यार किसी से होता है’, ‘दस लाख’, ‘साथी’, ‘शागिर्द’, ‘एक सपेरा एक लुटेरा’, ‘तुम हसीं मैं जवां’. कुमकुम की ‘गंगा की लहरें’ और आईएस जौहर की फ़ि‍ल्‍में और राजेश खन्ना का ‘बंडलबाज’ तक देखी. छुटपन के आवारा भटकन के जो भी हाथ चढ़ता, सब बराबर के श्रद्धाभाव से देखता. परदे पर हरकत करती, घूमती तस्‍वीरों को फटी आंखों तकने में कोई अपूर्व रोमांच, कोई जादुई अनुभूति मिलती होगी जभी स्‍कूली पढ़ाई के दौरान एक दौर था पड़ोस की तमिल सोसायटी के माहवारी सोशल ड्रामा और कॉमेडी फ़ि‍ल्‍मों की स्क्रिनिंग में भी भागा पहुंच जाता. मतलब तमिल का बिना एक शब्‍द समझे नागेश, जेमिनी, शिवाजी गणेशन की करीब सौ फ़ि‍ल्‍में तो उस बचपन में ज़रूर ही देखी होंगी. कहां जानता था कुछ वर्षों बाद विश्‍वविद्यालय की फ़ि‍ल्‍म सोसायटी की चार सालों की संगत में समांतर सिनेमा की भी सीमायें और बोझिलता गिनाने लगूंगा? हॉलीवुड के जॉन फोर्ड और इलिया कज़ान और फ्रांकेनहाइमर ही नहीं, यूरोप से बाहर, अर्जेंटिना, जापान, कोरिया कहां-कहां तक नज़रें फैलाने लगूंगा?

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जीवन में जिस तरह के लोगों की संगत बनती है कोई वज़ह होती है कि क्‍यों बनती है. इनमें मन रमता है तो वह दूसरा क्‍यों फूटी आंखों नहीं जमता. मुमताज़ को, बबीता और साधना को चाहती होगी पूरी एक दुनिया, लेकिन कोई एक दीवाना मन किसी एक रेहाना सुल्‍तान में जाकर अटक जाता होगा. करनेवाले संजय, शशी कपूर की चिकनाइयों का ज़ि‍क्र करते होंगे, न करनेवाला शेख़ मुख़्तार को अच्‍छा बताता होगा. राजेंदर और प्रदीप कुमार की दुनिया में जयंत, मोतीलाल, बलराज साहनी का होना गिनाता होगा. कोई वज़ह होती है दुनिया का हर एक्‍टर ऑस्‍कर पाने में अपने पूरे जीवन की कमाई, काम की गिनाई देखता है, हमारी हिंदी इंडस्‍ट्री के भी ऐसे अमीर हैं जो ऑस्‍कर की हल्‍की गुहार पर सब काम छोड़े भागे-भागे हॉलीवुड जाते हैं, मगर फिर कोई मारलन ब्रांडो भी होता है जो ऑस्‍कर पुरस्‍कारों को आलू का बोरा बताता है, गोद में आई को बेपरवाही से ठुकराता है. कोई वज़ह होती है लोग जो होते हैं वैसा क्‍यों होते हैं.

कोई वज़ह होती होगी अपने यहां हीरोगिरी की हवा छोड़ने वाले ढेरों एक्‍टर मिलते हैं, कोई जॉर्ज क्‍लूनी या शान पेन नहीं होता जो सिर्फ़ अपने स्‍टारडम की ही नहीं खाता, समय और अपने समाज के बारे में साफ़ नज़रिया भी बनाता हो. इव्‍स मोंतों जैसी कोई शख्‍सीयत नहीं मिलती जिसके चेहरे की हर लकीर, हर भाव बताते कि बंदे ने सख्त, एक समूची ज़िंदगी जी है. दुनिया में डिज़ाइनर कपड़ा पहनने आए थे और टीवी के लिए सजीली मुस्‍की मुस्कराने की अदाकारियां मिलती हैं, परदा अभिनय की भव्‍यता और मन जीवन की उस समझ के आगे नत हो जाए, एक्‍टिंग की जेरार् देपारर्द्यू वाली वह ऊंचाई नहीं मिलती. मारचेल्‍लो मास्‍त्रोयान्‍नी की तरह मन लुभाना ढेरों जानते हैं, मगर विस्‍कोंती की ‘सफ़ेद रातें’ और फ़ेल्‍लीनी की ‘आठ और आधे’ की महीन वल्‍नेरिबिलिटी में रुपहले परदे को जीवन से भर सकें का ककहरा अभी तलक नहीं पहचानते. बहुत सारी लड़कियां होंगी कमाल का नाचती हैं, लेकिन जुलियेट बिनोश की तरह कुर्सी पर बैठे-बैठे संवाद बोलना नहीं जानतीं, एडिथ पियाफ़ को परदे पर मारियों कोतियार की तरह भरपूर आत्‍मा से गा सकें (‘ल वियों रोज़’), अभिनय और जीवन के उस विहंगम संसार को दूर-दूर तक नहीं पहचानतीं. कोई तो वज़ह होती है कि सबकुछ वैसा क्‍यों होता है जैसा वह होता है.

अपने यहां एक्‍टर चार पैसे कमाकर एक दुबई में और दूसरा अमरीका में फ्लैट खरीदने के पैसे जोड़ता है, दूसरी ओर चिरगिल्‍ली भूमिकाओं की ज़रा सी कमाई को जॉन कसेवेट्स ऐसी अज़ीज़ फ़ि‍ल्‍मों को बनाने, बुनने में झोंकता है जो फ़ि‍ल्‍म नहीं, लगता है हमसे जीवन की अंतरतम, अंतरंग गुफ़्तगू कर रही हों. तुर्की का स्‍टार अभिनेता यीलमाज़ गुने अपने विचारों के लिए जेल जाता है, जेल में रहकर फ़ि‍ल्‍में बनाता है, हमारे यहां स्‍टार होते हैं, राजनीति में वह भी जाते हैं, कभी दूर तो कभी अमर सिंह को पास बुलाते हैं. कोई वज़ह होती होगी कि अपने यहां फ़ि‍ल्‍मों से जुड़े लोगों को हम जो इज़्ज़त देते हैं, क्‍यों देते हैं.

रोज़ इतने डायरेक्‍टर पैदा होते रहते हैं, एक सच्‍चा दिबाकर बनर्जी पैदा होता है, बाकी के कच्‍चे दरज़ी जाने क्‍या सिलाई सीलते रहते हैं, क्‍या वज़ह होती है?

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आख़ि‍र क्‍या वज़ह है हिंदी सिनेमा के अरमान इतने फिसड्डी, इतने दो कौड़ी के हैं? ऐसा क्‍यों होता है कि ‘रंग दे बसंती’ के कलरफुल फ्लाइट के ठीक अगले कदम वह ‘दिल्‍ली 6’ के दिशाहारे मैदान में जाकर ढेर हो जाता है? सिनेमा की अपनी आंतरिक है या यह हिंदी संसार के सपना देख पाने की कूवत के भयावह दलिद्दर की दास्‍तान है? क्‍योंकि ऐसे ही नहीं होगा कि पूरी आधी सदी में एक ‘प‍रती परिकथा’, एक ‘आधा गांव’ के साहित्‍य और आधे ‘राग दरबारी’ के एंटरटेनमेंट के दम पर एक पूरा समाज अपनी ठकुर सुहाती गाता, ऐंठ के गुमान में इतराता होगा? उसकी अपनी ज़बान में अंतर्राष्‍ट्रीय तो क्‍या राष्‍ट्रीय ख्‍याति का भी कोई अर्थशास्‍त्री, इतिहासकार, समाजशास्‍त्री क्‍यों नहीं की सोचता वह कभी नहीं लजाता? इसलिए कि लोगों को वही सरकार मिलती है जितना पाने के वह काबिल होते हैं? हिंदी का साहित्‍यकार भी हमें उतना ही साहित्‍य देता है जितने की राजा राममोहन राय लाइब्रेरी खरीदी कर सके? सौ लोग लेखक को लेखक मानकर पहचानने लगें, साहित्‍य अकादमी रचना-पाठ के लिए उसे बुला सके, शिमला या बीकानेर की कोई कृशकाय कन्‍या एक भटके, आह्लादकारी क्षणों में लेखक की तारीफ़ में तीन पत्र लिख मारे कि फिर लेखक उसे पटा सके, आगे का अपना चिरकुट जीवन खुशी-खुशी चला सके?

चंद तिलकुट पुरस्‍कार और इससे ज़्यादा हिंदी का लेखक यूं भी कहां कुछ चा‍हता है? प्रूस्‍त और बोदेलेयर बनने के तो उसके अरमान नहीं ही होते, वॉल्‍टर बेन्‍यामिन बनने का तो वह अपने दु:स्‍वप्‍न में भी नहीं सोचता, फिर हिंदी सिनेमा ही ऐसी क्‍यों बौड़म हो कि अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारे?

साहित्‍य को तो साहित्‍यकार के यार लोग ही हैं जो अपने सिर लिए रहते हैं, हिंदी सिनेमा की दिलदारी का तो व्‍यापक विस्‍तार भी है, देश में ही नहीं, समुंदरों पार भी है. बिना कुछ किये, दिलवाले दुल्‍हनिया ले जाएंगे का हलकान गा-गाकर ही वह सफल बनी हुई है, तो ख्‍वामख्‍वाह अपनी सफलता का फॉर्मूला वह क्‍यों बिगाड़े? चौदह सौ लोगों के बीच के हिंदी साहित्‍य तक ने जब रिस्‍क नहीं लिया तो चालीस करोड़ों के बीच घूमनेवाला हिंदी सिनेमा किस सामाजिकता की गरज में अपना बना-बनाया धंधा खराब करे? कोई तुक है? नहीं है.

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सवाल पूछनेवाले अलबत्‍ता पूछ सकते हैं इतना किस बात का रोना? क्‍या ऐसा नहीं है कि हाल के वर्षों में हिंदी सिनेमा ने अनुराग कश्‍यप और विशाल भारद्वाज जैसे फ़ि‍ल्‍मकार दिए हैं? सही है अनुराग की फ़ि‍ल्‍में हताशाओं व जुगुप्‍साओं के मेलों में भटकती फिरती हैं मगर उतना ही यह भी सही है कि ‘देव डी’ का अभय देओल इकहरा काठ का पुतला नहीं लगता, कमरे की अराजकता के बीच लाल अंडरवेयर में हम उसे सिर खुजाता देखते हैं, निस्‍संग, जीवन की नाउम्‍मीदी से वह किस कदर पका हुआ है के भाव हमेशा उसकी उपस्थिति को रेसोनेट करते हैं. वैसे ही उतना यह भी सही है कि विशाल बंबइया स्‍टारों के फेर में भले पड़े रहें, मिज़ों सेन सजाना जानते हैं, कहानी अपने को ठीक से भले न कह पाये, फ़ि‍ल्‍म की पैकेजिंग की कला है उनके पास, असमंजस के धुएं में फ़ि‍ल्‍म गहरे अर्थ दे रहा है की गलतफ़हमी भी बनी रहती है, मगर इससे ज़्यादा फिर कोई एक हिंदी फ़ि‍ल्‍मकार से फिर क्‍या चाहता है?

बहुत पहले की बात है, कुछ वर्षों के लिए मुझे इटली में रहने का सुअवसर मिला था. रफ़्ता-रफ़्ता इतालवी ज़बान पकड़ में आ गई थी, मगर लोग तब भी पकड़ में आने से रह जाते. समाज जो नज़रों के आगे रोज़ दीखता, वह समझ नहीं आता, गो फ़ेल्‍लीनी साहब की फ़ि‍ल्‍में खूब समझ आतीं, उनके ही रास्‍ते फिर समाज को समझने और उससे स्‍नेहिल संबंध बनाने की कुंजी भी मिलती रहती. अपने हिंदी सिनेमा की संगत में जबकि मामला ठीक इसके उल्‍टा होता है. देश और लोग बाज मर्तबा, लगता है बहुत सारे स्‍तरों पर, परतों में समझ आते हैं, लेकिन बचपन की पुरानी दीवानगी के बावजूद अब भी हिंदी फ़ि‍ल्‍म में उतरते ही लगता है यहां जाने किस दुनिया की बात हो रही है. और जिस भी दुनिया की हो रही है उसका हमारे रोज़-बरोज़ की वास्‍तविकता से कोई संबंध नहीं. समय और समाज को समझने की कुंजी तो वह किसी सूरत में नहीं बनती. यहीं यह सवाल भी निकलता है कि फ़ि‍ल्‍मों से, इन जनरल, हमारी अपेक्षाएं क्‍या हैं? जीवन से, सिनेमा के रागात्‍मक, कलात्‍मक अनुभव से हम उम्‍मीदें क्‍या पालते हैं.

सिनेमा यथार्थ नहीं. फ़ेल्‍लीनी की फ़ि‍ल्‍में यथार्थ नहीं, सिनेमा के अंधेरों में हमारे अवचेतन से खेलता वह कोई सपनीला जादू है जिसके भीतर उतरकर, कुछ घंटों के लिए हम अपने यथार्थ से एक नए तरह के संवाद में जाते हैं, और उस यथार्थ को समृद्ध करने की एक नयी ताक़त लिए सिनेमाघर से बाहर आते हैं, ऐसा कुछ?

स्‍पेन के होसे लुईस गेरीन की 2007 की अपेक्षाकृत गुमनाम सी फ़ि‍ल्‍म है, ‘इन द सिटी ऑफ़ सिल्‍वी’, चौरासी मिनट की फ़ि‍ल्‍म में कुल जमा पांच-सात मिनट के संवाद होंगे, बाकी जो है नौजवान पर्यटक नायक की नज़रों- कुछ वर्षों पहले घटित किसी मीठी मुलाक़ात की महीन याद की दुबारा ‘खोज’ के बहाने अजाने शहर में भटकने, ‘देखने’ का अंतरंग भावलोक है. कैमरे की आंख से जगह विशेष में लोगों का यह उनकी आन्‍तरिकता में ‘दिखना’; कामनाओं, अनुभूति, जुगुप्‍साओं की यह दबी-छुपी ताकझांक खास सिनेमाई रसानुभव है और वह किसी अन्‍य कला-माध्‍यम से सब्‍स्‍टि‍ट्यूट नहीं हो सकता था.

अमरीकी निर्देशक रॉबर्ट ऑल्‍टमैन की एक म्‍यूज़ि‍कल है, 1975 में बनी थी, ‘नैशविल’. राष्‍ट्रपति के चुनाव अभियान वाला मौसम है, नैशविल के छोटे शहर में राजनीतिक गहमा-गहमी के दिन हैं. कंट्री और गॉस्‍पल संगीत से जुड़े लोगों की दुनिया में ज़रा समय को घूमती (159 मिनट की अवधि) इस फ़ि‍ल्‍म में तकरीबन 24 मुख्‍य किरदार हैं, चूंकि गवैयों की दुनिया है सो घंटे भर का वक़्र्त उनके परफ़ॉरमेंस व गाने का है, जाने कितनी सारी स्‍टोरीलाइन है. ऑवरलैपिंग संवादों का साउंडट्रैक है और फ़ि‍ल्‍म इतने सारे स्‍तरों पर चलती है कि कभी भरम होता है आप फ़ि‍ल्‍म नहीं देख रहे, बाल्‍जाक का उपन्‍यास पढ़ रहे हैं.

अर्थशून्‍य जीवन में प्रेम चला आये तो वह ऐसी ही सघन नाटकीय अपेक्षाओं की लड़ी बुनने लगता है. फिर सरल सिनेमा के देश में तरल वाचन की प्रत्‍याशाएं जीवन को खामख्‍वाह मुश्किल बनाने लगती हैं.

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सवाल फिर वही है सिनेमा से हमारी अपेक्षाएं क्‍या हैं? क्‍या चाहते हैं? स्‍वयं सिनेमा हमसे क्‍या चाहता है? महज़ क्‍या ‘कूल’ हैं की एक बार और आश्‍वस्ति चाहते हैं? या ज़रा और उदार, महात्‍वाकांक्षी होकर इच्‍छाओं, कामनाओं के एक सघन ऐंद्रिक अनुभव से गुज़रना भर चाहते हैं? और सिनेमा? अपने अंधेरों-उजालों के जादू में बांधकर जीवन जैसा ही कुछ दीखते किस यथार्थ के पीछे अवचेतन की कैसी यात्राओं पर हमें वह लिए जाना चाहती है? सिनेमाघर से बाहर के जटिल यथार्थ को समझने में वह किसी भी तरह से हमारी मदद करती है? लेकिन हम ‘प्‍यार बांटते चलो’ गाना चाहते हैं, किसने कहा जटिल यथार्थ का बाजा सुनना चाहते हैं?

1974 की जॉन कैसेवेट्स की अमरीकी फ़ि‍ल्‍म है, ‘ए वुमन अंडर द इन्‍फ्लुयेंस’. बिना किसी भावुकता के प्रेम और परिवार की ही अंतर्कथा ही है, और बहुत धीमे-धीमे बहुत गहरे धंसती चलती है. बहुत सारे तारे हैं और सब ज़मीन पर ही गिरे हैं मगर फ़ि‍ल्‍मकार उसका रंगीन पोस्‍टर सजाने की ज़रूरत नहीं महसूस करता, जीवन की ज़रा और मार्मिक समझदारी हम आपस में शेयर कर सकें, जैसे कभी कोई मार्मिक नाट्य-मंचन कर ले जाता है, फ़ि‍ल्‍म वैसी ही कुछ हमसे अपेक्षा करती है, और प्रेम व परिवार की अपनी समझ में हम थोड़ा और अमीर होकर फ़ि‍ल्‍म से बाहर आते हैं.

कुछ वैसी ही अर्जेंटिना के पाब्‍लो त्रापेरो की फ़ि‍ल्‍म है, ‘फमिलिया रोदांते’ (रोलिंग फैमिली, 2004), सुदूर देहात में किसी बिसराये रिश्‍तेदार के यहां शादी का न्‍यौता है जहां पहुंचने के लिए एक बुढ़ि‍या अपने सब बेटी, बेटा इकट्ठा करती है, और एक खड़खड़ि‍या खस्‍ताहाल वैन में पूरा कुनबा सुदूर देहात के सफ़र पर निकलता है. हमारे लिए वह सफ़र अपने समय और पारिवारी बुनावट को समझने की मार्मिक कथा बनती है.

अर्जेंटिना की ही एक अन्‍य महिला निर्देशक, लुक्रेसिया मारतेल की 2001 की फ़ि‍ल्‍म है, ‘ला सियेनागा’, या जापान के मिवा निशिकावा की 2009 की फ़ि‍ल्‍म, ‘डियर डॉक्‍टर’, जो ऊपरी तौर पर नितांत साधारण सी दिखती- परिवार, परिवेश और उस समाज की कथा भर लगे, मगर फिर बड़े धीरज और करीने से हमारे आगे उसके भीतरी गांठों को एक-एक करके खोलती चले. आपस में बांटी गई संगत की यह समझ भी सिनेमा की अपनी विशिष्‍ट ताक़त है, खेद कि हिंदी सिनेमा के पास नहीं है.

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पांचवे दशक के आखिर तक (और कुछ-कुछ छठवें दशक के शुरुआती दौर में भी खिंचे जाते हुए) रही थी हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की अपनी एक सामाजिकता, सौद्देश्‍यता. उसके बाद लगता है, शनै-शनै देश ने जैसे जान लिया कि आज़ादी का ठीक मतलब जो भी है, जीवन की खुशहाली के लिए बहुत नहीं है, और आदर्शवादी सपनों की जैसे-जैसे हवा निकलती गई, वैसे-वैसे हिंदी सिनेमा कैमरे से अपने परिवेश की पड़ताल करने की बजाय शंकर जयकिशन व ओपी नय्यर के संगीत पर सवार पहाड़ोन्‍मुखी होता गया. नितिन बोस, केदार शर्मा, व्‍ही शांताराम, बाबू महबूब ख़ान, बिमल रॉय पीछे छूटते गए. शम्‍मी कपूर, जॉय मुखर्जी, विश्‍वजीत का पहाड़ी वादियों में जीप पर घूमना और स्‍की पर फिसलना चालू हो गया. पीछे-पीछे बाबू राजेशजी खन्‍ना आए तो उन्‍हें ‘मेरे सपनों की रानी’ गवाने के लिए शक्ति‍ सामंत श्रीनगर की बजाय दार्जिलिंग लिवाये गए. गनीमत है अमिताभ तक ड्रामा फिर पहाड़ से हटकर वापस बंबई और नज़दीक के मैदानों में लौटा, लेकिन वह ज़मीन पर लौटी है के नाटकीय सलीम-जावेद वाले डायलॉगबाजी में भले लौटी, कायदे से ज़मीन पर कहां लौटती? सुपरहीरो और सुपर ड्रामा की दुनिया थी, अंतत: ‘मेरे अंगने में तुम्‍हारा क्‍या काम है’ ही गाती, समाज को अपने साथ कहां, किधर लेकर जाती? कहीं नहीं गई. नब्‍बे के दशक में, ‘हम आपके हैं कौन’ के बाद से बड़ी तसल्‍ली से शादी के वीडियो छापने लगी. दुनिया आंख फाड़-फाड़ कर देखती रही हिंदुस्‍तानी शादियां क्‍या अनूठी चीज़ हैं, हिंदुस्‍तानी परिवार कैसी लाजवाब संस्‍था है. फिर जैसे इतना प्रहसन काफ़ी न हो, आगे शादियां और अनूठे पारिवारिक प्रसंग भी सीधे लंदन और न्‍यूयॉर्क में ट्रांसपोर्ट कर दिये गए. दलिद्दर देश के कंगले रुपल्‍ली से हाथ झाड़कर सीधे डॉलर और स्‍टर्लिंग से हाथ जोड़ लिया गया.

भावुकता के उद्रेक में मैंने अतिशयता की थोड़ी ज़्यादा भोंडी तस्‍वीर खींच दी होगी, मगर कमोबेश आजा़दी के बाद के पांच दशक हिंदी सिनेमा जिन रास्‍तों चली कुछ इसी तरह का उसका स्‍थूल वनलाइनर समअप है. अब इस समअप में समाज को देखने की सचमुच कहां गुंजाइश निकलती है? काफी नहीं है कि अभी भी बीच-बीच में ऐसी फ़ि‍ल्‍में बन जा रही हैं जिसकी शूटिंग जोहानसबर्ग और ज्‍युरिख़ की बजाय हिंदुस्‍तान में ही कहीं हो जाती है?

सच्‍चाई है हिंदी सिनेमा का दरअसल अपना कोई समाज है नहीं. पंजाबी, राजस्‍थानी, बंबई सबकी मिलाजुली पॉटपूरी है, कोई एक ऐसा भूगोल नहीं जिसे केंद्र में करके कहानी घूम रही है. अब चूंकि जब केंद्र ही नहीं है तो फ़ि‍ल्‍म फ़ोकस कहां होगी? बेचारी नहीं हो पाती और यहां और उसके बाद वहां फुदकती रहती है. बीच में जब असमंजस बढ़ जाता है और बात भूल जाती है कि फ़ि‍ल्‍म की कहानी दरअसल थी किसके बारे में तो एक गाना और कॉ‍मेडी का सीन डल जाता है. उसके बाद भी बना रहे, असमंजस, तो पूरी यूनिट घबराकर विदेश चली जाती है, कि शायद विदेशी लोकेल फ़ि‍ल्‍म में अर्थवत्‍ता फूंक सकें!

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कोई वज़ह होगी, मगर जो भी है सोचनेवालों को सोचना चाहिए कि ऐसा क्‍यों है कि अमरीकी फ़ि‍ल्‍मों की नकल से थके हुए हमारी हिंदी सिनेमा के दरजी नयेपन की गरज में, फिर चोरी के लिए फ्रांस तो कभी हॉंगकांग और ताइवान की तरफ़ नज़र दौड़ाते हैं, क्‍यों दौड़ाते हैं? इरान, कोरिया, चीन ही नहीं, बांग्‍लादेश और वियतनाम तक अपने परिवेश की कथा बुनकर मार्मिक फ़ि‍ल्‍में खड़ी कर लेते हैं, बस यह हिंदी सिनेमा का ही निर्देशक है जो लगातार अपनी जी हुई सच्‍चाइयों से मुंह चुराता, दिल्‍ली का होकर गुजरात और मुंबई का बंगाली बच्‍चा फिर राजस्‍थान अपनी शूटिंग सजाने जाता है. ऐसा क्‍यों है कि लोग वही कहानी कहते जो जीवन में उन्‍होंने जीया है? इसलिए कि उनके पास ज़िंदगी है लेकिन उसके जीये की कहानी नहीं? मम्‍मीजी की गोद में वे अमिताभ और रेखा का नाचना और श्रीदेवी का फुदकना देखते हुए बड़े हुए? फ़ि‍ल्‍म बनाना चाहते हैं और बनाते रहेंगे इसलिए नहीं कि कहानियां कहने को हैं, बल्कि इसलिए कि ए‍क पिटे हुए समाज में ऐश और स्‍टारडम के नशे में जीने की वही एक इकलौती जगह दिखती है?

हिंदी का हर निर्देशक दो फ़ि‍ल्‍में बनाने के बाद तीसरी बड़े स्‍टार के साथ बनाना चाहता है, क्‍यों बनाना चाहता है, भई? इसलिए कि फ़ि‍ल्‍म को एक्‍सपोज़र मिल जाता है, बाज़ार बनाने में आसानी हो जाती है. तो वही बात है. बाद में बाज़ार और निर्देशक के निजी जीवन की बेहतरी ही बनती रहती है, फ़ि‍ल्‍म की बेहतरी का सवाल पीछे कहीं पृष्‍ठभूमि में छूट जाता है. दिक़्क़त वही है, अपने यहां लोगों के मन में चिंता फ़ि‍ल्‍मों की बेहतरी से ज़्यादा जीवन को सेट कर लेने की है. जैसे हिंदी साहित्‍यकार की चिंता अपने साहित्‍य से ज़्यादा साहित्‍य अकादमी से अपने संबंधों की है.

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जून्‍हो बॉंग की 2003 की एक कोरियन फ़ि‍ल्‍म है ‘मेमरीज़ ऑफ़ मर्डर’. जो दर्शक रामगोपाल वर्मा की ‘सत्‍या’, ‘कंपनी’ और ‘सरकार’ देखकर दांत में हाथ डालते रहे हैं, उन्‍हें ज़रूर देखनी चाहिए. एक कस्‍बाई शहर में एक के बाद एक हत्‍यायें हुई हैं और स्‍थानीय पुलिस हत्‍यारे की पहचान में माथा फोड़ रही है. मगर उसमें कोई हिरोइकपना या नाटकीयता नहीं. पुलिस की नौकरी में लगे किरदारों की अपने जीवन के टंटे हैं, केस की जटिलता में थकते अधिकारी एक कमज़ोर, अर्द्ध-विक्षिप्‍त को फांसकर उसे हत्‍यारे की तरह पेश करने की कोशिश करते हैं, मगर मामला फिर और उलझता जाता है. राजधानी सेओल से मामले की तफ़तीश को आया अपेक्षाकृत ज़्यादा शिक्षित एक दूसरा अफ़सर अचानक समझता है उसकी खोज रंग लाई, असल हत्‍यारे की उसने पहचान कर ली है, मगर वहां जीवन का एक अन्‍य घाव खुलता है, असल हत्‍यारे की पहचान नहीं होती. असल हत्‍यारे की पहचान फ़ि‍ल्‍म के आखिर तक नहीं होती, और हमारे मन में कड़वा सा कोई स्‍वाद छूटा रह जाता है, जैसा बहुधा जीवन में होता है, मसले सॉल्‍व नहीं होते, हमेशा कथार्सिस की मुक्ति नहीं होती.

एक दूसरी फ़ि‍ल्‍म है, हिंदी में है, अभी तक अनरिलीज़्ड, बेला नेगी की उनकी पहली, ‘दायें या बायें’. उत्‍तराखंड की दुनिया में खुलती है. नायक मुंबई से अपने गांव लौटा है. मगर वह औसत नायकों की तरह का नायक नहीं, उसके जिज्ञासु बेटा है, शहराती अरमानों वाली बीवी है, टीवी देख-देखकर अपना सपना बुनती साली है, कंधे के झोले में कलेजा लिये घूमता बचपन का यार है, गांव का पूरा उबड़-खाबड़ जाने कितने परतों में खुल रहा, बदलता संसार है, और फ़ि‍ल्‍म नायक के बहाने इन सबकी कहानियों में उतरती है. इकहरी कथा कहने की जगह मल्‍टीपल लेवल पर नैरेटिव खोलती चलती है. वह सब आसानी से करती लिये जाती है जो कांख-कांखकर भी कोई बड़ा बंबइया फ़ि‍ल्‍म निर्देशक नहीं कर पाता, और ठहरकर सोचिए तो सोचते हुए यह बात भी सन्‍न करती है कि समझदारी भरा यह काम एक लड़की की पहली फ़ि‍ल्‍म है.

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कहने का मतलब अपने परिवेश को केंद्र में रखकर फ़ि‍ल्‍में बन सकती हैं. और कलात्‍मक फ़ि‍ल्‍मों का दुखड़ा रोती, बिना देह पर उनका जामा डाले बन सकती हैं. दिबाकर बनर्जी की अब तक की बनाई तीनों फ़ि‍ल्‍में इसका अच्‍छा उदाहरण हैं कि धौंस और धमक में बन सकती हैं. एक के बाद एक क्रियेटिव उछालें ले सकती हैं. समाज की सच्‍चाइयों को सांड़ के सींग पर उठाकर चौतरफ़ा चक्‍कर घुमवा सकती हैं. हां, उसके लिए अपने समाज के प्रति वैसी ही करुणा, समझ और दिल की उछाल चाहिए. जिगरा. चाहिए. दिबाकर ने दिखा दिया है कि यह सब हो तो समाज में अच्‍छे सिनेमा की जगह है. इस पतित समय में भी. हिंदी सिनेमा के गिरे संसार में भी!

‘खोसला का घोंसला’ में ही कहीं-कहीं प्रियदर्शन टाइप फिल्‍मी तत्‍व हैं, मगर पहली फ़ि‍ल्‍म के नर्वस असमंजस के लिए उन्‍हें नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए, दूसरी, ‘ओये लकी, लकी ओये’ से दिबाकर जैसे अपना सुर साधने लगते हैं. अपने बचपन की जानी-पहचानी दिल्‍लीवाली दुनिया के पोर-पोर की उनको पहचान है, उसके चिथड़े वह सिरे से सजाते चलते हैं. सब घर में ठेल लेने की कामनाओं में, भूख की बदहाली और आत्‍मा की तंगहाली एक चोर की नहीं, समूचे समाज की कहानी होने लगती है. उस चोरमन समाज के बीच घूमते हुए दिखता है कि चोरी पर जी रहा फ़ि‍ल्‍म का नायक ही इकलौता रिडेम्प्टिव कैरेक्‍टर है. बाकी जो तथाकथित शरीफ़, धुले हुए हैं वह इस मूल्‍यहीन, पतित संसार के सबसे बड़े अधम हैं. वह दुनिया उदास करती है, मगर अपने समय और समाज की समझ में हमें ज़रा बड़ा भी कर जाती है. समांतर सिनेमा की तरह सिनेमाघर से हम डिप्रैस हुए बाहर नहीं निकलते.

दिबाकर की तीसरी फ़ि‍ल्‍म, ‘लव, सैक्‍स और धोखा’ में कहीं और ज़्यादा क्रियेटिव छलांग है, अबकी वह अपेक्षाकृत पहचाने अभय देओल जैसे किसी स्‍टार चेहरे के फेर में भी नहीं पड़ती. दरअसल पारंपरिक तरीके से किसी को नायकत्‍व देती भी नहीं. समाज के नंगे हमाम में कैमरा लेकर उतरती है, जहां पारंपरिक कैमरावर्क की पॉलिशिंग और कंफर्ट तक नहीं है, और मनोरंजक तो कुछ भी नहीं है. क्‍योंकि आंखों के आगे जिस समाज के दृश्‍य खुलते हैं, वह सिर से पैर तक बीमारियों में रंगी है, अपने दो कौड़ी के फौरी स्‍वार्थों से अलग उसकी आत्‍मा खाली है. खोखली. कहीं कोई वह सामाजिकता की करुणा, आपसी बंधाव नहीं है जो इस पिटी दुनिया का किसी तरह बेड़ा पार लगायेगा, मालूम नहीं इस हालत में भीतर से पूरी तरह जर्जर यह समाज फिर कहां जाएगा? एक बार फिर, इतनी उदास दुनिया है, मगर मन डिप्रैस नहीं होता. अपने घटियापे में लोग विलेन नहीं लगते, विलेन वह समाज दीखता है जिसमें अपने फ़ायदे के होड़ ने सबकी यह दुर्गति, परिणति की है. और जिस तरह से अभिनेताओं का इस्‍तेमाल है, रोज़मर्रा की ज़िंदगी से गहरे जुड़े संवादों का, और सबके बावज़ूद (फ़ि‍ल्‍म के टाइटल से अलग) कहीं कोई नाटकीयता नहीं, आप फ़ि‍ल्‍म देखकर सोचते हैं और आपका मन लाज़वाब हुआ जाता है.

हिंदी सिनेमा अब भी संभावना है. शाबास दिबाकर!

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दिसम्‍बर 1995 में तब फ़ैशन पत्रिका, फ्रेंच ‘एल’ के ज़्यां दोमीनीक बोबी एडिटर इन चीफ़ थे, जब एक मैसिव स्‍ट्रोक के बाद पूरी तरह पैरालाईज़्ड हो गए. सारे अंग बेमतलब हुए, सिर्फ़ उनकी आंख, एक आंख, अपना काम करती रही. अस्‍पताल के बिस्‍तरे से लगे, उस आंख के सहारे ही उन्‍होंने अपने संस्‍मरण डिक्‍टेट कराये, उसकी किताब तैयार हुई. ‘द डाईविंग बेल ऐन्ड द बटरफ्लाई’ उसी किताब पर आधारित जुलियेन श्‍नाबेल की 2007 की फ़ि‍ल्‍म है. डाईविंग बेल, माने पानी की अतल गहराई में ऐसे डूबना जिससे बाहर सिर्फ आंख से दिखते उजाले की चौंध भर ही हो. और बटरफ्लाई? मन की ऐसी उड़ान जो शरीर के कैद से किसी पंछी के गहरे आसमान में निकल पड़ना हो जैसे, अंतहीन विस्तार. एक आंख से देखी दुनिया की यादों के उमंगों की, हृदयविदारक कहानी है फ़ि‍ल्‍म. एक ही समय में मार्मिक और अदम्य जिजीविषा की कहानी जो अपने तरल क्राफ्ट में लगभग एक विज़ुअल कविता सी बहती रहती है, या कहें कि निर्देशक जुलियन श्‍नाबेल की पेंटिंग जैसी..

एक पैरालाईज़्ड लेखक के बायोपिक को इतना जीवंत, कोमल और जिजीविषा के स्‍वप्निल रंगों में पेंट करते जाना आसान नहीं रहा होगा. जैसा कि ज़्यां दो ने अपनी किताब में कहा है कि अब मैं खदबदाती स्मृतियों की कला सीख रहा हूं, श्‍नाबेल की फ़ि‍ल्‍म उस खदबदाहट को एक अलौकिक आश्‍चर्यलोक में बदलता-सा चलती है. इतने सारे तक़लीफ़ों के नीचे दबा जीवन भी कैसी उमंग और दीप्तिमय कविता होती रह सकती है ‘द डाईविंग बेल ऐन्ड द बटरफ्लाई’ लगातार हमें उन ऊंचाइयों तक लिये जाता है.

कविता की ऊंचाइयां, समझ की गहराइयों तक, उड़ने, उड़ाये जाने का काम बखूबी करती है सिनेमा, सवाल है फ़ि‍ल्‍म बनानेवाला निर्देशक जीवन से, व अपने माध्‍यम से ऐसे गहरे संबंध रखता हो, फ़ि‍ल्‍म देखनेवाले दर्शक सिनेमा में जीवन को मार्मिकता से उतरता देखने का मान, ऐसे अरमान रखते हों..

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किसी सपनीले लोक में, गाढ़े अंधेरों की गहिन दुनिया में चमकते जुगनुओं सी चमकीली, एकदम पास-पास, फिर भी हाथ न आती रौशनी.. दिलफ़रेब ख़्वाब कोई.. मनहारे अंधेरों में छुपी किसी रौशन दुनिया का अव्‍यक्‍त अहसास बना रहे.. नमी, एक ताप कोई बना रहे.. अजाने वाद्य के किसी अनूठे संगीतबंध सा जीवन की उलझी परतें एक-एक करके खुलती रहें.. और यह खुलना किसी जादू से कम न हो.. वैसे ही जैसे मर्मस्‍पर्शी नितांत अंतरंग क्षणों में जीवन का साक्षात् करना.. जीवन को उसके समूचे ताप में, आत्‍मा के गहिन माप में जीना, और सृजनशीलता को.. कितना सुंदर हो सकेगा सिनेमा.. हो सकेगा, ज़रूर.. बशर्ते उसे बनानेवाला जानता हो मन के धन, बिछे धूल के मणि-कण.. अपनी ज़मीन को पहचानता हो, उसकी अंतरंग विद्युत तरंगों को.. और इन सब को जोड़ने वाले उस तार को और ये कि जो जितना सरल है उतना ही गूढ़ है और इसी के बीच न दिखने वाली कोई बहती नदी की धार है जो सिर्फ अपने होने भर से उस सरल दुरूह में कोई ऐसा मायने भर जाती है जिसके पीछे कोई तर्क नहीं होता, कोई नाटक नहीं होता.. और ये कि उस सिनेमा को देखने वाला दर्शक भी किसी अबूझ प्रक्रिया से उस कहानी की गहराईयों और ऊंचाइयों में ठीक उसी सुर में डूबे जैसे कोई अदृश्य सूत्र से सब बंधे हों. सिनेमा फिर जीवन को उसकी पूरी सच्चाई में, उसके समूचेपन में खोल देने का ज़रिया हो.. कि लो देखो यही जीवन है अपने समस्त जीवंत रंगों में, अपनी समूची मार्मिकता में. यही जीवन है यही तो इसलिये सिनेमा भी है.. या होना चाहिये..

अप्रैल, 2010

(ज़रा अनजान, नई पहचान के एक नौजवान की चिरौरी पर एक साहित्‍यि‍क मासिक के विशेषांक के लिए यह लेखनुमा जो भी चीज़ है, लिखी थी. कुछ गल्‍प जैसा बंधता चले का आग्रह था, मगर लिखे को पाकर नौजवान मित्र खुश होने की जगह कातर होते रहे, कि लय नहीं है, लुत्‍फ़ नहीं है, आदि. उन्‍हें पसन्‍द न आया, उनके पास वजह होगी. कुछ समय तक लेख मेरे पास पड़ा रहा, फिर किन्‍हीं दूसरे मित्र की कृपा से लख़नऊ से छपनेवाली एक पत्रिका 'लमही' के पास पहुंचा, उनकी कृपा हुई, लेख वहां जुलाई-सितम्‍बर के अंक में छपा जैसा सुन रहा हूं, स्‍वयं पत्रिका अभी मैंने देखी नहीं है.

जो बंधुवर धीरज से आखिर तक लेख निकाल जायेंगे, उनकी हिम्‍मत की अग्रि‍म दाद दिये देता हूं, शुक्रिया.)

4/03/2009

तीन का एक: फिर एक बार हिंदी फ़ि‍ल्‍में..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों पर लिखना, लिखते रहना सचमुच कलेजे का काम है. ऐसा नहीं है कि हिंदी साहित्‍य पर लिखना कलेजे का काम नहीं है, लेकिन साहित्‍य के साथ सहूलियत है कि आप किताब बंद कर देते हैं चिरकुटई ओझल हो जाती है, जबकि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की रंगीनियां आपका पीछा नहीं छोड़तीं, बस के पिछाड़े से लेकर बाथरुम के आड़े तक ‘मसक अली, मसक अली!’ की मटक का सुरबहार तना रहता है. बार-बार याद कराता कि अभीतक हमको नहीं देखे? जन्‍म फिर ऐसे ही सकारथ कर रहे हो? आप अस्तित्‍ववादी चिंताओं में घबराकर ‘दिल्‍ली 6’ की ज़द में घुस ही गये तो फिर दूसरी वैचारिक घबराहटें शुरू हो जाती हैं. पहली तो यही कि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का निर्देशन करनेवाले ये प्रतिभा-पलीता किस देश के कैसे प्राणी हैं? और जैसे भी प्राणी हैं भक्ति व श्रद्धा में भले इनका रंग निखरता हो, फ़ि‍ल्‍म बनाने का करकट करतब किस भटके डॉक्‍टर ने इन्‍हें प्रीसक्राइब किया है? माने अभी ज्यादा वक़्त नहीं हुआ आपने ‘रंग दे बसंती’ के तरबूज के फांक काटे थे, और इतनी कर्कटता से अब तरबूज की तरकारी (या ‘दिल्‍ली 6’) परस रहे हैं? कहां गड़बड़ी कहां है, भाईजान? काम की कंसिंस्‍टेंसी कोई चीज़ होती है? कि स्‍टील की फैक्‍टरी में आप प्‍लास्टिक की चप्‍पल मैनुफैक्‍चर कर आते हैं? और बाहर आकर दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए मुस्‍कराते भी रहते हैं कि इट्स अ ट्रिब्‍यूट टू माई सिटी! इज़ दिज़ सम ट्रिब्‍यूट, मिस्‍टर मेहरा, ऑर हाथी की लीद? इट्स रियली नॉट फ़नी!

माने सचमुच यह दार्शनिक प्रश्‍न होगा कि आप किस एंगल से ‘दिल्‍ली 6’ को एक फ़ि‍ल्‍म मानें. माने इसलिए मानें कि फ़ि‍ल्‍म में बहुत सारे एक्‍टर हैं और वो बहुत सारी बकबक करते हैं और किसी घटिया वाईड एंगल वीडियो की तर्ज़ पर रामलीला जैसा कुछ जाने कितने जन्‍मों तक चलता रहता है? मैंने काफी समझा-बुझाकर खुद को तैयार किया था कि कम से कम मिस्‍टर जूनियर बच्‍चन को अमरीका से लौटा हुआ मान लूं, मगर इतनी रियायत भी मन पचा ले लगता है अभिषेक बाबा इतने पर के लिए भी तैयार नहीं थे. अमरीका से नहीं प्रतापगढ़ के किसी टैक्‍सी यूनियन के सेक्रेटरी के छुटके भइय्या रौशन ख़ानदान हैं पूरे वक्त इसीकी प्रतीति होती रही! कास्टिंग के बारे में सचमुच क्‍या कहा जाये, फ़ि‍ल्‍म की इकलौती अच्‍छी बात ‘मसक अली’ वाले गाने को देखते समय लगता है कबूतर की कास्टिंग सही हुई है. दिल्‍ली और चांदनी चौक लगता है मुमताज़ के 'दुश्‍मन' के ‘देखो, देखो, देखो, बाइस्‍कोप देखो’ से इंस्‍पायर होकर डायरेक्‍टर साहब कैप्‍चर कर रहे थे.

अबे, सचमुच कोई हिंदी फ़ि‍ल्‍म क्‍यों देखे? मगर यह फिर वही बात हुई कि कोई हिंदी में किताबें क्‍यों पढ़े. आदमी अकेलेपन से घबराकर जैसे शादी कर लेता है, मैं हिंदी की किताब एक ओर हटाकर हिंदी फ़ि‍ल्‍म देखने चला जाता हूं! इसी तरह के मानसिक भटकाव में ‘गुलाल’ देखने चला गया होऊंगा. फ़ि‍ल्‍म के दस मिनट नहीं बीते होंगे, ख़ून खौलानेवाली बहुत सारी बड़ी-बड़ी बातें होने लगीं, मैं भी खौलता हुआ वयस्‍क दर्शक बनने की भूमिका बनाने लगा. मगर फिर बहुत जल्‍दी थियेट्रिकल गानों की थियेट्रिकल अदाओं से ऊब इस समझ पर भी आकर आराम करने लगा कि फलां जगह घुसा देंगे, डंडा कर देंगे की महीन बुनावट वाली ये दुनिया हमें पारंपरिक हिंदी सिनेमा से अलग दुनिया देखने के क्‍या नये मुहावरे दे रही है, सचमुच दे रही है?देव डी’ पर बड़े सारे भाई और बच्‍च लोग गिर-गिरके बिछते और बिछ-बिछके गिरते रहे मगर वह टुकड़ा-टुकड़ा दिल की कौन नयी दुनिया खोल रही थी? या ड्रग्‍स, सैक्‍स, वॉयलेंस का एक ज़रा सा हटके वही पुराना कॉकटेल ठेल रही थी? कुछ लोग मेरे कहे से संभवत: नाराज़ हो जायें, कि मैं फ़ेयर नहीं कह रहा एटसेट्रा मगर माफ़ कीजिये, दोस्‍तो, मेरे पास इस सिनेमा के लिए ‘सिनेमा ऑफ़ डिसपेयर’ से अलग और कोई नाम नहीं सूझता. एंड इन माई अर्नेस्‍ट सिंसीयरिटी आई जेनुइनली क्‍वेश्‍चन ऑल दोज़ फ़ि‍ल्‍म एंथुसियास्‍ट्स हू आर गोइंग गागा ओवर गुलाल..

गुलाल से निकलकर ‘बारह आना’ लोक में गया, और सच कहूं फ्लैट, इकहरा डायरेक्‍शन, खराब ऐक्‍टरों व निहायत सिरखाऊ बैकग्राउंड स्‍कोर के बावज़ूद फ़ि‍ल्‍म देखने का मलाल नहीं हुआ. आसान रास्‍तों की सहूलियत से मुक्‍त, नेकनीयती और मुश्किल स्क्रिप्‍ट धीरे-धीरे अपने को संभाले ठीक-ठाक निकल जाती है. गुलाल की बजाय बारह आना वाली दुनिया में होना ज़्यादा अर्थपूर्ण लगता है.

2/11/2009

देव डी, अनुराग, डैनी बॉयल और हमारा समय इत्‍यादि..

बॉलीवुड की ऐसी दुनिया में जो विश्‍व सिनेमा के बरक्स अभी तक अपना ककहरा भी ढंग से दुरुस्‍त नहीं कर पायी है, अनुराग में ढेरों खूबियां हैं. अपनी और अपनी से ज़रा ऊपर की पीढ़ी के बाकी सेनानायकों के उन नक़्शेकदमों- जिनमें लोग किसी अच्‍छी-खराब कैसी भी शुरुआत के बाद सिर्फ़ और सिर्फ़ बड़ी फ़ि‍ल्‍में, और बड़े स्‍टारों का रूख करते हैं- से निहायत अलग अनुराग का अभी तक का ग्राफ़ परिचित बंबइया मुहावरों से बाहर के एक्‍टरों को इकट्ठा करके अपने ढंग की फ़ि‍ल्‍म बनाना रहा है. ‘नो स्‍मोकिंग’ जैसी फ़ि‍ल्‍म में उसका सुर बिगड़ भले गया हो, अनुराग की बुनावट की कंसिस्‍टेंसी अपनी उन्‍हीं पहचानी बारोक रास्‍तों पर चलती दिखती है. बॉलीवुड की बंधी-बंधायी इस अटरम-खटरम राग में अनुराग ने एक और दिलचस्‍प और नये एलीमेंट का जो इज़ाफा किया है वह बंधे-बंधाये लोकेशनों से बाहर फ़ि‍ल्‍म के एक्‍चुअल शूट को बाहरी वास्‍तविक संसार की खुली बीहड़ता में ले जाकर एकदम से बेलौस तरीके से फैला देना है, और इस लिहाज से अनुराग मणि रत्‍नम की ‘सजायी’ और डैनी बॉयल की ‘स्‍लमडॉग मिलिनेयर’ की ‘बुनाई’ सबसे चार कदम आगे चलते हैं. आज के बॉलीवुडीय वास्‍तविकता के मद्देनज़र अनुराग की इन अदाओं में ऐसा ‘इलान’ है कि तबीयत होती है जाकर बच्‍चे का कंधा ठोंक आयें. वाकई यह बड़ा अचीवमेंट है. फिर? अनुराग में यह प्रतिभा भी है कि छोटे-छोटे सिनेमाई क्षणों में कैज़ुअल तरीके से खूब सारे डिटेल्‍स पिरो लें, और ऐसा नहीं कि फिर वहां अपनी मोहिनी पर इतराते अटके रहें, बिंदास तरीके से आगे निकल जायें, तो इतने सारे तो हाई पीक्‍स हैं अनुराग की सिनेमायी संगत में, फिर भी कल ‘देव डी’ देखी और दिल एकदम टूट सा गया! क्‍यों टूटा में इंडल्‍ज नहीं करूंगा, यह अनुराग नहीं समाज के फलक के बड़े सवाल हैं इनके बारे में चंद बातें करूंगा, अकल में और चीज़ें घुसीं तो उनकी चर्चा आगे फिर होती रहेगी..

तक़लीफ़ के एकांतिक क्षणों में व्‍यक्ति की वल्‍नरेबिलिटी के कुछ बड़े प्‍यारे मोमेंट्स हैं ‘देव डी’ में- कोमल, एक अकेले पत्‍ते की तरह लरज़ता, कांपता व्‍यक्ति. लेकिन प्रेम और सांसारिक अनुभव की इतनी भर गरिमा की अंडरस्‍टैंडिंग के बाद देव डी आगे कहीं नहीं जाती, सीधे यहीं बैठ जाती है. मैंने गिनती गिनना (या कायदे से उनको सुनना, समझना भी) भी बंद कर दिया था, लेकिन समीक्षक बताते हैं फ़ि‍ल्‍म में अट्ठारह गानों को बखूबी कहानी के तार में पिरोया गया है, अभय देओल ही नहीं, कल्‍की, माही सबके बड़े उम्‍दा परफ़ारमेंसेस हैं, एक हिंस्‍त्र किस्‍म की एनर्जी फ़ि‍ल्‍म की शुरुआत से लेकर आखिर तक बनी रहती है, लेकिन फ़ि‍ल्‍म में आप किसी सामूहिक मानवीयता का कोई गाना सुनने की उम्‍मीद पाले बैठे हों, तो जाने क्‍यों मन एकदम खाली-खाली सा महसूस करने लगता है, फ़ि‍ल्‍म तेजी से ऊब पैदा करना शुरू करती है, मानो कोई बड़ा विहंगम बारॉक कैनवस अचानक आंखों के आगे खुल गया हो, लेकिन उसकी कोई आत्‍मा न हो!

मगर उदासियों और नयी सम्‍भावनाओं का ककहरा बांचने में लगे बच्‍चों को फ़ि‍ल्‍म जंच रही है, इतनी जल्‍दी एक छोटे-से बड़े संसार में ‘इमोशनल अत्‍याचार’ एक बड़े अरबन मुहावरे की शक्‍ल में हिट हो गया है तो हम भी सोच में पड़े हैं, कि गुरु, चक्‍कर क्‍या है. पार्टनर, गिरे क्‍यों पड़ रहे हैं, लोग? अभी चंद महीनों पहले हमने ‘ओये लकी..’ के दिबाकर को शाबासीमाल पहनाया था, मज़े की बात वहां भी अभय थे, पतित नायक का नायकत्‍व था, लेकिन ओह, कैसी तो उदात्‍तता थी, एक मानवीय डिग्निटी थी दिबाकर की फ़ि‍ल्‍म में, चरित्रों की तक़लीफ़ में आपका मन फड़फड़ाता रहता है, देव डी में कभी आपकी आत्‍मा में ऐसे तीर नहीं धंसते, फिर भी फ़ि‍ल्‍म ने एक बड़े शहरी समुदाय का स्‍नेह फंसा रखा है (और वह सैक्‍स की वज़ह से है ऐसा मैं नहीं मानता), क्‍यों?..

शायद यह ऐसे ही नहीं हो गया है कि ‘देव डी’, और बड़े अर्थों में ‘स्‍लमडॉग मिलिनेयर’ भी, एक बड़े शहरी समुदाय के मन को भा रही है. ‘स्‍लमडॉग..’ तो भारतीय यथार्थ का एक क्रूड ऐसा पिक्‍चर पोस्‍टकार्ड है जो खास फिरंगी कंस्‍पंशन के लिए तैयार किया गया है, फिर यह यहां की इंडियन क्राउड को क्‍यों रास आ रहा है? शायद इसीलिए रास आ रहा है कि हमारे देखते-देखते यहां भी बड़े शहरों में एक ऐसी आबादी बड़ी हो गयी है जो अपने आसपास के यथार्थ को उन्‍हीं चश्‍मों से देखती है जिन चश्‍मों से कोई फिरंगी आंख हमारे समाज को देखेगी? थोड़ा पहले तक हक़ीकत यह थी ‘लगान’ के हाइजेनिक गांव इस शहरी तबके के मन में गांव की वास्‍तविकता का परिचायक थे, उसके बाद ‘रंग दे बसंती’ के म्‍यूजिकल फ्लाईट में इसने देशभक्ति का थोथा सबक पा लिया, अब यह अपने समाज को अपनी आंखों पहचानने, पहचान पाने की बनिस्‍बत डैनी बॉयल के स्‍केची, एक्‍सप्‍लॉयटेटिव ‘स्‍लमडॉग..’ की मार्फ़त पहचान लेने की सहूलियत में सुखी होती है. फ़ि‍ल्‍म और समाज दोनों ही के लिए यह शुभ संकेत नहीं है, बाह्य सामाजिक यथार्थ के वास्‍तविक रेशों से कटे, चरम सेल्‍फ़ इंडलजेंस के ये नये मेनीफ़ेस्‍टों हैं. ‘स्‍लमडॉग..’ के साथ यहा ‘देव डी’ की याद महज इस संयोग के लिए नहीं कर रहा हूं कि फिल्‍म में डैनी बॉयल के आभार का एक क्रेडिट टाइटल है, नहीं, देव डी भी अपनी समूची एनर्जी में चीख-चीखकर उसी सेल्‍फ़ इंडलजेंस का बड़ा घोषणापत्र बनाती रहती है जिसमें भयानक सोशल डिसकनेक्‍ट है, सिर्फ़ मैं है मैं है, सामाजिक रेफ़रेंसेस महज बैकग्राउंड डिटेल्‍स हैं (स्क्रिप्‍ट व फिल्‍म में यह गूंथ लेना अनायास ही नहीं रहा होगा कि देव नशे की हालत में अपनी कार से सात लोगों को कुचलता उनकी मौत का कारण बनता है, दर्शकों के लिए यह कहीं कंसर्न व टेंशन का विषय बनने की मांग नहीं करता!), समाज नहीं है. ऐसा सिनेमा अत्‍याचारी गानों का जश्‍नगाह भले बन जाये, भारतीय सिनेमा को कहीं ले जानेवाला सुरीला गान तो क्‍या बनेगा. एन एक्‍स्‍ट्रीमली सैड फेनोमेनन..

2/15/2008

मिथ्‍या

डाइरेक्टर: रजत कपूर
लेखन: रजत कपूर, सौरभ शुक्‍ला
कैमरा: राफे महमूद‍
साल: 2008
रेटिंग: **

मिथ्‍या के साथ एक बड़ा सच यह है कि फ़ि‍ल्‍म बड़ी ‘मीठी’ है. बेसिक कहानी व उसकी एब्‍सर्ड त्रासदी की बुनावट ऐसी है (एक एक्‍टर क्‍या करे जब उसका अभिनय ही उसकी पहचान खा जाये?) कि ढेरों कड़वाहट के मौके बनते हैं, लेकिन फ़ि‍ल्‍म उन कड़वाहटों में धंसती नहीं. बाजू-बाजू लुत्‍फ़ उठाती रहती है. डिटैचमेंट बना रहता है. तो मीठे के सुर का यह बेसिक कथात्‍मक बेसुरपना ही फ़ि‍ल्‍म का डिज़ाईन बनकर मिथ्‍या का बंटाधार कर देती है. बात समझ में नहीं आई? इससे ज़्यादा मैं समझा भी नहीं सकता. क्‍योंकि मिथ्‍या की मुश्किलों की इतनी ही समझ मेरी भी बन पा रही थी. लचर और ढीली फ़ि‍ल्‍म कहकर फ़ि‍ल्‍म से हाथ झाड़ लेने के आसान रास्‍ते पर मैं जाना नहीं चाहता. क्‍योंकि जिन्‍होंने रजत की दूसरी फ़ि‍ल्‍में देखी हों उनके रेफरेंस में फिर याद कर लेना चाहता हूं कि मिथ्‍या रजत की सबसे बेहतर फ़ि‍ल्‍म है- अपने क्राफ्ट पर कंट्रोल के लिहाज़ से. कहानी व उसे कहने के सुर का कंट्रोल नहीं है मगर शायद वह रजत की फिल्‍ममेकिंग है नहीं. आनेवाले समयों में भी दिखेगी, मुझे नहीं लगता.

सस्‍ते में स्‍मार्ट फ़ि‍ल्‍ममेकिंग का जो रजत ने एक खास स्‍टाईल इवॉल्‍व किया है, वह काबिले-दाद है. मिथ्‍या में वह काफी रिफांइड लेवल की है. छोटे-छोटे सिनेमेटिक इंडलजेंसेस हैं जो कभी उसे फ्रेंच कॉमिक फ़ि‍ल्‍मों के पज़लिंग लोक में उतार देते हैं, तो कभी फ़ि‍ल्‍म में हल्‍के से कोई ‘बुनुएलियन’ टच चला आता है. नेहा धूपिया जैसी सपाट एक्‍टर फ्रेंच मिस्‍टीक अक्‍वायर किये रहती है, यह अपने में अचीवमेंट नहीं लेकिन अम्‍यू‍ज़िंग ज़रूर है. रणवीर को एक्टिंग करते देखना और देखते रहने से पूरी फ़ि‍ल्‍म में आप कभी थकते नहीं. इतने थोड़े समय में टीवी पर डीजेगिरी करते हुए रणवीर ने एक्टिंग में जो हाई जंप्‍स लिये हैं वह हिंदी फिल्‍मों के संदर्भ में सचमुच बड़ा अचीवमेंट है. छोटे रोल में विनय पाठक, ब्रि‍जेंद्र काला समेत बाकी एक्‍टरों को देखना भी कंटिन्‍युसली एंटरटेन किये रहता है. कहानी के लोचे हैं, अग्रीड, लेकिन वह रजत के साथ हमेशा रहेंगे, अदरवाइस मिथ्‍या वैसी मिथ्‍या नहीं है जैसी बॉक्‍स ऑफिस की खिड़की पर नज़र आ रही है.

सिर्फ़ कहानी देखने के लिए आप फ़ि‍ल्‍म देखनेवाले दर्शक न हों, और रजत की फ़ि‍ल्‍ममेकिंग में आपकी कुछ दिलचस्‍पी हो तो एक मर्तबा मिथ्‍या देख आइए. रेकमेंडेड.

1/31/2008

संडे

वर्ष: 2008
भाषा: हिंदी
लेखक: रॉबिन भट्ट और जाने कौन-कौन
डायरेक्‍टर: रोहित शेट्टी
रेटिंग: ?

चिरकुटई की कोई सीमा होती है? बहुत बार हिंदी फ़ि‍ल्‍म देखते हुए लगता है नहीं होती. संडे देखते हुए कुछ ऐसी ही विरल अनुभूति हुई. सिनेमा हॉल में मालूम नहीं कितने अभागे (या सुभागे?) थे, छूटे हुए पटाखों की तरह हीं-खीं हंस रहे थे. मुंह ही से हंस रहे थे. हमें समझ नहीं आ रहा था कैसे और कहां से हंसें.. कस्‍बाई शादियों के बारात में दलिद्दर ऑर्केस्‍ट्रा के लौंडे हाथ में माइक थामे जो रोमांचकारी मनोरंजन मुहैय्या करवाते हैं, कुछ वैसा ही आह्लादकारी मनोरंजन रोहित शेट्टी की यह फ़ि‍ल्‍म ठिलठिला रही थी. डायरेक्‍टर के आदर्श काफी कॉस्मिक ऊंचाइयों को छूते कभी अब्‍बास-मुस्‍तान तो कभी अनीस बज़्मी जैसी उन्‍नत प्रतिभाओं के पीछे दौड़ती कला, कौशल और कॉमर्स की नयी मंज़ि‍लें तय करती रहती है. डायरेक्‍टर और संडे लिखनेवालों की कल्‍पनाशीलता की ही तरह अजय देवगन की एक्टिंग भी लगातार दंग करती रहती है. चेहरे पर ऐसी-ऐसी सूक्ष्‍म अनुभूतियां आती हैं कि आदमी सोचने पर मजबूर हो जाये कि भई, भावप्रवण अभिनय का यह चरम तो सुनील शेट्टी के चेहरे पर कहीं ज्यादा इंटेंसिटी से एक्‍सप्रेस होता है! फ़ि‍ल्‍म के लगभग सभी ही डिपार्टमेंट ऐसी ही सूक्ष्‍म और उन्‍नत कलात्‍मक भागदौड़ मचाये रहते हैं.. आपका दिमाग उन्‍नत हो तो आप सीट पर बैठे-बैठे दौड़ते हुए वैसी ही उन्‍नतावस्‍था की हींहीं-ठींठीं में अपने दो घंटे सार्थक कर सकते हैं.. हमारी तरह फंसी दिमाग के मालिक हों तो फ़ि‍ल्‍म देखने से बचिये क्‍योंकि संडे आपकी नाक में दम कर सकता है.. नाक ही नहीं शरीर के अन्‍य हिस्‍सों की फंक्‍शनिंग भी दुलम कर सकता है..

12/24/2007

तारे ज़मीन पर

अपने देश में नेकनीयती और साफ़गोई का ऐसा भयानक दलिद्दर है कि एक आदमी भीड़ से हटकर ज़रा भी अलग रास्‍ते पर पैर रखे ऐसा हल्‍ला होने लगता है मानो परमहंस का नया अवतार हो रहा हो, या गांधी बाबा नया आश्रम खोलनेवाले हों! फिर वह आदमी आमिर खान जैसा बड़ा, सेलेक्टिव स्‍टार हो तब तो कहना ही क्‍या. ‘तारे ज़मीन पर’ के रिलीज़ होने के साथ पत्रिकाओं में दो पेज़ के फीचर से लेकर कवर स्‍टोरी तक हर जगह अभी कुछ ऐसी ही छटा फैल गई और बनी रहनेवाली है कि फ़ि‍ल्‍म कैसी अद्भुत, और उसे सिरजनेवाली शख्‍सीयत कैसी अनोखी है! दिक़्क़त इन सुपरलेटिव्‍स की है, बाकी मामला दुरुस्‍त, स्‍वस्‍थ्‍य, खुशग़वार है. ‘तारे ज़मीन पर’ में तारे भी हैं और साफ़-सुथरी ज़मीन भी. आमिर खान की पहली डायरे‍क्‍टोरियल कोशिश है तो उसे ज़रा ऊंची आवाज़ में ताली सुनने का हक़ बनता भी है..

आमिर पॉपुलर सिनेमा के आदमी हैं और पॉपुलर सिनेमा की उनकी जो, जैसी समझ होगी उस पैरामीटर्स में कंसिस्‍टेंट रहते हुए आमिर ने एक ठीक-ठाक मनोरंजक और समझदार फ़ि‍ल्‍म बनाई है. दर्शील सफारी एक सुलझा और समझदार बच्‍चा है. पारंपरिक रूप से सफल बच्‍चे जो सबकुछ कर सकते हैं, उन्‍हें न कर पाने के तनाव और दबाव में जीवन के साथ उसके संबंध व दुनिया को देखने के उसके अंदाज़ के मोह में हम गिरफ़्तार बने रहते हैं, और मनोरंजक तरीके से बने रहते हैं. फ़ि‍ल्‍म का फर्स्‍ट हाफ लगभग दर्शील के कौतुक देखते, उनमें उलझे कैसे गुजर जाती है आपको ख्‍़याल भी नहीं रहता. इंटरवल में आमिर की एक हें-हें, ठें-ठें गाने के साथ एंट्री होती है और हीरो की चिंताओं को एस्‍टेबलिश करने के चक्‍कर में स्क्रिप्‍ट फ़ि‍ल्‍म के असल नायक दर्शील को काफ़ी वक़्त तक चुप करा देती है. ठेंठे वाले गाने के बाद परेशान बच्‍चे के बारे में परेशान होता आमिर का राम शंकर निकुंभ एकदम-से गंभीर हो जाता है और फ़ि‍ल्‍म का यह तीस-चालिस मिनट का ‘आमिरी’ समय उतना एंटरटेनिंग नहीं, उसके बाद फ़ि‍ल्‍म फिर अपना लय पकड़ती है और आखिर तक पकड़े रहती है. अंतिम क्षणों के करीब सिनेमा हॉल के अंधेरे में ज़रा-सी मानवीयता कैसे बचाये रखी जाये के लिए आंसू बहाते हुए हम भोले, भावुक दर्शक‍ क्षणिक तौर पर सुखी बन जाते हैं.

दर्शील सफारी फ़ि‍ल्‍म की उपलब्धि है. उसकी स्‍वाभाविकता, स्‍पॉंटेनिटी, उसकी मैच्‍यूर समझदारी- सब. फिल्‍म के काफी सारे हिस्‍से काफी ढंग से लिखे और एक्‍ट भी किये गए हैं. दर्शिल का स्‍कूल बंक करके आवारा भटकना और दर्शिल के पैरेंट्स से मिलने निकले आमिर की सड़क यात्रा छोटे, दिलचस्‍प सिनेमेटिक मोमेंट बनते हैं. हालांकि दर्शिल के पिता और बोर्डिंग के अध्‍यापकों को विलेन बनाने के कैरिकेचर से बचा जाता तो शायद फ़ि‍ल्‍म और उम्‍दा बनती. गाने कहानी में ठीक से गुंथे हुए हैं और उनके साथ अच्‍छी बात है कि उनमें ऑर्केस्‍ट्रेशन का हल्‍ला नहीं है. उनमें एक कथात्‍मकता है लेकिन बुरी बात यह भी है कि उनमें मेलॅडी की अमीरी नहीं. तो अपने खत्‍म होने के साथ वे उतनी ही आसानी से भुला भी दिये जाते हैं. शायद यह एक कॉंशस प्रयोग हो और खुद में ऐसी बुरी बात न भी हो. सेतु का कैमरावर्क अच्‍छा, फ्रेंडली, एक्‍सेसिबल और कल्‍पनाशील है. वैसा ही प्रॉडक्‍शन डिज़ाईन और एनिमेशन का इस्‍तेमाल भी. अपने व अपने बच्‍चे पर उखड़ने के बाद आप जाकर फिल्‍म देख आयें, गिनकर पांच दफ़ा आंख के कोनों पर नमी महसूस करें, देखिए, मज़ा आयेगा. इससे अलग काम की एक और बात. . जहां तक अपने यहां समस्‍या-प्रधान चरित्रोंवाली संजय भंसाली की 'ब्‍लैक' टाइप फ़ि‍ल्‍मों की बात है, 'तारे ज़मीन पर' उससे दस नहीं तीस कदम आगे है और सिर्फ़ इसी बिना पर उसे मुहब्‍बत से देखी जानी चाहिए.

12/23/2007

दो फ़ि‍ल्‍म और आधी..

Two and Half Films…

Having been stuck by monetary troubles, later on rescued and taken to theatres by UTV ‘Khosla ka Ghosla’ (2006) is quite an amusing and titillating film about life and living in Delhi. Other than the last half an hour or so when the elder son plans and executes to get back the money stolen from his family by the baddie land mafia, the film runs pretty smoothly with nice character etchings and intelligent dialogues. Till date the six films that Jaideep Sahni has written, three (Company, Chak de! India and Khosla ka Ghosla) are quite decent accomplishment. Even actors do their part pretty all right. Its first film for director Dibakar Banerjee. We should hope to see more interesting outputs from him in coming years.

The second film, ‘Manorama Six Feet Under’ is a also a first film for director Navdeep Singh written with Devika Bhagat. Though considering it to be a thriller, the writing could have been more tight and intriguing. Writers mix up the laid back set-up with the story telling as well and the ploy kills the viewers’ interest for the whole two-third of the film. The film moves tiredly and a flat performance by Abhay Deol hardly infuses with any warmth or intelligence. Though it’s a pleasing to watch Vinay Pathak, Gul Panag and Raima Sen in cameo roles. The camerawork by Arvind Kannabiran is very impressive. But watching the film one feels one is in company of a good and sensitive director. Lets wait and see what twists and turns Navdeep gives us in future.

The remaining half film that I am going to write about is not by a first timer. Its more expensive, more ambitious but after first three minutes or so, one realizes its going to be a hopeless journey. In fact it doesn’t even become any journey as it just refuses to go anywhere. Whatever the prmos, producer say or media blabbers about, the film doesn’t have a story. It doesn’t even have a sequence worth mentioning about. The whole thing is just a compilation of glossy images hopelessly going nowhere. Well, it’s pretty ‘Khoya Khoya…’ whatever.

By Jainarain

12/08/2007

पुरानी फ़ि‍ल्‍म रीविजिटेड..

बचपन में देखी, और देखकर लहालोट हुई फ़ि‍ल्‍मों पर दुबारा लौटना, देखना ख़तरनाक खेल है. अब तक मेरा अनुभव तो यही रहा है (हो सकता है सिनेमा से ज़रा ज़्यादा जुड़े रहने और उसके विविध पहलुओं की छांट-छटाई के स्‍वाभाविक अभ्‍यास ने यह ‘खेल’ मेरे लिए थोड़ा ज्यादा निर्मम बना दिया हो, मगर कमोबेश ऐसे अनुभव अन्‍य लोगों को भी हुए ही होंगे. फिर, यह भी सच है कि कुछ फ़ि‍ल्‍में- इसलिए कि उनकी फ़ि‍ल्‍ममेकिंग विशिष्‍ट है- सदाबहार बनी भी रहती हैं). ख़ैर, मैं बचपन की देखी फ़ि‍ल्‍मों के ‘री-विजिट’ के ख़तरों की बाबत कह रहा था. और विनम्रता के साथ ज़ोर देकर कहना चाह रहा हूं कि इन मान्‍यताओं को किसी व्‍यक्ति या काम-विशेष के विरूद्ध न समझा जाये. तो पहले भी ऐसे मौके आये थे. राजेश खन्‍ना और नन्‍दा की एक थ्रिलर थी, ‘द ट्रेन’. बचपन में देखने पर बड़ा मज़ा आया था कि क्‍या धांसू स्‍टंट हैं, कहानी का कसाव है इत्‍यादि-इत्‍यादि. गाने तो बढ़ि‍या थे ही (गुलाबी आंखें जो तेरी देखीं शराबी ये दिल हो गया; किसलिए मैंने तुझे प्‍यार किया, किसलिए इक़रार किया, सांझ-सबेरे तेरी राह देखी), बहुत वर्षों बाद कहीं से सीडी लेकर फ़ि‍ल्‍म लगाई, फिर वही मज़ा लेने की कोशिश की तो हाथ-पैर फूलने लगे! चेतन आनंद ने इन्‍द्राणी मुखर्जी और राजेश खन्‍ना के साथ एक फ़ि‍ल्‍म की थी- आख़ि‍री ख़त, चेतन साहब का अपना ‘बेबीज़ डे आऊट’. गाने उसमें भी मस्‍त थे- बहारों मेरा भी जीवन संवारो, भूपिंदर का ‘रुत जंवा, जवां, रात मेहरबां’), बचपन में खूब आंखें गीली हुई थीं, दुबारा देखने पर चेतन साहब की पूरी फिल्‍ममेकिंग रहस्‍यवाद लग रही थी. लग रहा था कैमरा चालू करने के बाद भूल गए हों कि इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस चालू किया क्‍यों था और चालू कर दिया तो ‘कट’ जैसी कोई चीज़ बोली भी जाती है!

ओपी रल्‍हन एक कॉमेडियन हुआ करते थे, धर्मेंद्र और मीना कुमारी को लेकर एक सोशल ड्रामा बनायी थी (डायरेक्ट्रियल डेबू)- फूल और पत्‍थर. धमाल फ़ि‍ल्‍म थी, धमाल चली भी थी. दुबारा प्‍लेयर पर चढ़ाने के बाद हमसे दस मिनट चलाते नहीं चली. इस श्रृंखला में और नाम हैं- मनोज कुमार की ‘पहचान’ (बस यही अपराध हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्‍यार करता हूं.. पाक़ि‍ज़ा को फेल करके उस साल फिल्‍मफेयर के अवार्ड्स हथियानेवाली फिल्‍म पहचान ही थी!), चेतन आनंद की ‘हंसते ज़ख़्म’, विजय आनंद की ‘तेरे मेरे सपने’, यश चोपड़ा की ‘इत्‍तेफ़ाक’, कि कभी मज़ा आया था लेकिन दुबारा देखने पर क्‍यों मज़ा आया था का सवाल पहेली बनकर रह गया. यही बात विमल राय की ‘मधुमती’, ‘देवदास’, के आसिफ के ‘मुग़ले-आज़म’ और साऊथ की ‘राम और श्‍याम’ और रमेश सिप्‍पी के ‘शोले’ देखने पर नहीं होता. मगर कल फिर खेल में फंस गया और मुंह की खायी.

जब आयी थी तो मैंने ही नहीं, बहुतों ने आनन्‍द लिया था और फिल्‍म को हिट बनायी थी. बासू चटर्जी की ‘रजनीगंधा’. मन्‍नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित अमोल पालेकर और विद्या सिन्‍हा की पहली, प्रेम त्रिकोण फिल्‍म (1974). कल फिल्‍म दुबारा देखना हुआ तो मन में बार-बार यही बात आ रही थी कि कुछ फिल्‍में अपने समय का मिज़ाज भले पकड़ती हों, होती निहायत ‘डेटेड’ हैं, और बतौर फिल्‍म उनका भविष्‍य नहीं होता! माने स्क्रिप्‍ट और संवाद ऐसे थे कि उसे पढ़ने का ख़्याल आते बोरियत होने लगे. बहुत सारे संवाद दो नहीं, लगता था चार-चार बार बोले जा रहे हैं. फिर हंसी और उदासी के बने-बनाये चार एक्‍सप्रेशंस. केके महाजन का कैमरा वर्क ऐसा मानो आज के सीरियल एपिसोड की फिल्‍म बारह दिन में छापने की हड़बड़ी हो. कोई कल्‍पनाशीलता नहीं. सब बड़े सीधे-सपाट इमेज़ेस. कभी-कभी सलिल चौधरी के बैकग्राउंड स्‍कोर और मुकेश का ‘कई बार यूं ही देखा है..’ से अलग पूरी कसरत अब एक भयानक थकान की तरह याद रहनेवाली है. जय हो बचपन की मधुर स्‍मृतियां..

10/30/2007

नो स्मोकिंग



साल: २००७
भाषा: हिन्दी
लेखक/ निर्देशक: अनुराग कश्यप
रेटिंग:*
अवधि: १२० मिनट


अनुराग कश्यप की नो स्मोकिंग बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह फ़्लॉप है। मुझको और मेरे मित्र को मिलाकर आज दोपहर के शो में कुल आठ लोग थे। किसी भी फ़िल्मकार के लिए दुःखद है यह, और खासकर अनुराग के लिए तो और भी जिन्हे मैं बहुत ही काबिल फ़िल्मकार मानता हूँ। उनकी फ़िल्म ब्लैक फ़्राईडे को मैं पिछले सालों में देखी गई सबसे बेहतरीन फ़िल्म समझता हूँ। मगर नो स्मोकिंग निराशाजनक है। एक स्वर से सभी समीक्षकों ने इसे नकार दिया है और दर्शको का हाल तो पहले ही कह दिया।

कहा जा रहा है कि अनुराग की अतिरंजना है यह फ़िल्म- इनडलजेंस। सत्य है आंशिक तौर पर। मगर उच्च कला, कलाकार की अतिरंजना ही होती है। जहाँ कलाकार सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी कल्पित संसार के प्रति प्रतिबद्ध होता है, और दूसरे के लिए उसका संसार कितना सुगम होगा इसकी चिंता नहीं करता। मेरा निजी खयाल तो यह है कि अनुराग अपनी अतिरंजना के स्तर एक तल और ऊपर ले जाते तो शायद फ़िल्म बेहतर बनती। अभी यह बीच में कहीं अटक गई है। ना तो यह अपने सररियल ट्रीटमेंट के कारण दर्शकों की एक सीधी सादी कहानी सुनने की भूख को पूरा करती है और न ही यथार्थ के बहुस्तरीय स्वरूप की परतें को अपनी बुनावट में उघाड़ने का कोई प्रयत्न। उलटे एक सरल रूपक के चित्रण में नितान्त एकाश्मी बनी रहती है। जिसकी वजह से सामान्य दर्शक और कला प्रेमी दोनो ही मुतमईन नहीं होते। फ़िल्म की असफलता इस बात में नहीं है कि यह आम दर्शक के लिए कुछ ज़्यादा जटिल बन गई या वित्तीय पैमाने पर चारों खाने चित है बल्कि अपने मूल मक़सद- अपने दर्शक तक अपने संदेश का अपनी कलात्मक एकता में संप्रेषण- में नाकामयाब रही है।

अपनी असफलता के बावजूद अनुराग ने हिस्सों में अच्छा प्रभाव छोड़ा है। बाबा बंगाली के पाताल-लोक का चित्रण देखने योग्य है। पर उनका आरम्भिक और आखिरी उजबेकी बरफ़ीले मैदानों का स्वप्न कोई प्रभाव नहीं छोड़ता। खैर! अब उनकी अगली फ़िल्म का इंतज़ार रहेगा।

-अभय तिवारी

जब वी मेट





भाषा: हिन्दी

साल: २००७

लेखक/निर्देशक:इम्तियाज़ अली

रेटिंग:**

उदीयमान निर्देशक इम्तियाज़ अली की पहली फ़िल्म ‘सोचा न था’ भी कुछ छोटी-मोटी कमियों के बावजूद एक ऐसी ताज़गी से भरी फ़िल्म थी जो किसी नए फ़िल्मकार से ही अपेक्षित होती है। मगर अपनी दूसरी फ़िल्म ‘जब वी मेट’ से उन्होने अपने भीतर की कलात्मक ईमानदारी का मुज़ाहिरा कर के फ़िल्म इंडस्ट्री के मठाधीशों के चूहे जैसे दिल को भयाकुल हो जाने का एक बड़ा कारण दे दिया है। क्योंकि वे हर सफल व्यक्ति की तरह वे दूसरों की सफलता की धमक से डरते हैं।

मैं उनके दिल को चूहेसम बता रहा हूँ क्योंकि करोड़पति अरबपति होने के बावजूद उनके भीतर अपनी ही बनाई किसी पिटी-पिटाई लीक छोड़कर कुछ अलग करने का साहस नहीं है। चूंकि पैसे के फेर में अपने दिल की आवाज़ सुनने का अभ्यास तो खत्म ही हो चुका है यह उनकी फ़िल्मों से समझ आता है। और दूसरों की दिलों की आवाज़ पर भरोसा करने की उदारता भी उनमें नहीं होती इसीलिए किसी नए को मौका देने के बावजूद उसकी स्वतःस्फूर्तता को लगातार एक समीकरण के अन्तर्गत दलित करते जाते हैं।

जब वी मेट एक रोमांटिक फ़िल्म है। एक लम्बी परम्परा है हमारे यहाँ रोमांटिक फ़िल्मों की। मगर पिछले सालों में मैने एक अच्छी रोमांटिक फ़िल्म कब देखी थी याद नहीं आता। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ और ‘कुछ कुछ होता है’ को मात्र मसाला फ़िल्में मानता हूँ, उसमें असली रोमांस नहीं है। असली रोमांस देखना हो तो जा कर देखिये जब वी मेट।

-अभय तिवारी

8/25/2007

चक दे! इंडिया

साल: 2007
भाषा: हिंदी
डायरेक्‍टर: शिमित अमीन
लेखक: जयदीप साहनी
रेटिंग: ***

डिसग्रेस्‍ड हीरो की शुरुआत हमेशा फ़ि‍ल्‍म को एक अच्‍छी बिगनिंग देती है.. आगे इस तनाव का सस्‍पेंस खिंचा रहता है कि हीरो के ग्रेस की वापसी कैसे होगी.. होगी या नहीं (होगी कैसे नहीं, भई, फ़ि‍ल्‍म है, वास्‍तविक जीवन नहीं?). उस लिहाज़ से ‘चक दे! इंडिया’ की शुरुआत तनी और कसी हुई नहीं.. लिखाई में भी इकहरापन है.. मगर उसके बाद फ़ि‍ल्‍म एकदम-से अपनी चाल पकड़ लेती है.. आमतौर पर हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के घटियापे से अलग कैरेक्‍टराइज़ेशन पर ध्‍यान देती दिखती है.. चरित्रों के अंर्तलोक की जटिल परतों को बीच-बीच में मज़ेदार तरीके से पकड़ती है.. दर्शकों की दिलचस्‍पी बांधे रखती है.. और बड़ी मस्‍तानी चाल से आगे दौड़ती रहती है.. बीच-बीच में ऐसे डायलॉग आते रहते हैं कि आपको हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के लेखन को दो कौड़ी का तय करने के फ़ैसले में असुविधा हो.

सबसे मज़ेदार है चक दे! इंडिया की लड़कियां.. कोमल चौटाला, प्रीति सबरवाल, विद्या शर्मा, बिंदिया नायक ऐसी लड़कियां है जिन्‍हें सोचते और अपनी बात कहता देख खुशी होती है.. कभी-कभी आगे बढ़कर उनसे हाथ मिलाने का मन करता है.. वे ऐसी लड़कियां हैं जिन्‍हें आप शायद आगे किसी फ़ि‍ल्‍म में न देखें.. क्‍योंकि वे ख़ूबसूरत और सेक्‍सी- कोई प्रीति झिंटा या रानी मुखर्जी नहीं.. अपने पैरों व दिमाग़ पर खड़ी आज की ज़िंदा लड़कियां हैं.. चक दे! इंडिया की व्‍यावसायिक सफलता के पीछे भी शायद दर्शकों का इन लड़कियों में अपना अक़्स देख लेना ही है.

लड़कियां कमाल की हैं, शाहरूख नहीं, जैसाकि प्रैस फ़ि‍ल्‍म के बारे में लिखते-बताते हुए बार-बार बोलती रही है.. हिंदी फ़ि‍ल्‍मों के ढेरों दुर्गुणों से मुक्‍त चक दे! की लिखाई, कैरेक्‍टराइज़ेशंस, अच्‍छी कास्टिंग फ़ि‍ल्‍म का अच्‍छे पहलू हैं.. तो कुछ बुरे पहलू भी हैं.. मसलन पूरी फ़ि‍ल्‍म में अनाप-शनाप बजता सलीम-सुलैमान का बैकग्राउंड स्‍कोर और वैसे ही ऊटपटांग गाने.. आप उसपर कान न दीजिए तो बाकी फ़ि‍ल्‍म फिट है.. हिट तो है ही.

ट्रेड के लिहाज़ से यह तथ्‍य भी मज़ेदार है कि यशराज की ज़्यादा महात्‍वाकांक्षी, मुख्‍यधारा के टंटों में ज़्यादा रची-बसी ‘झूम बराबर झूम’ बाज़ार से हवा हो जाती है.. और शिमित अमीन जैसे एक ‘अब तक छप्‍पन’ के ऑफ़बीट, अनफमिलियर निर्देशक की लाटरी निकल पड़ती है.

8/12/2007

ब्लू अम्ब्रेला

छतरी चोर

डाइरेक्टर: विशाल भारद्वाज
कहानी: रस्किन बांड
पटकथा: विशाल भारद्वाज,
अभिषेक चौबे, मिंटी कुंवर तेजपाल
संवाद: विशाल भारद्वाज
कैमरामैन: सचिन के क्रिश्‍न
संगीत: विशाल भारद्वाज
साल: 2007
अवधि: 90 मिनट
रेटिंग: ***

मैने विशाल भारद्वाज की सभी फ़िल्में देखी हैं.. मेरे ख्याल में ब्लू अम्ब्रेला उनकी सबसे बेहतर फ़िल्म है.. फ़िल्म की कहानी बहुत मामूली है.. एक पहाड़ी कस्बे की एक दस ग्यारह बरस की लड़की बिनिया को एक जापानी छतरी मिल जाती है.. जिसे पा कर वह उड़ती फिरती है.. मगर कस्बे के अधेड़ परचूनी नन्दू की भी नज़र छतरी पर है.. और एक दिन छतरी चोरी हो जाती है.. बिनिया को शक़ है कि छतरी नन्दू ने ली है जो पहले भी छतरी हथियाने के लिए उसे तरह तरह के प्रलोभन दे चुका है.. मगर तलाशी लेने पर भी छतरी नन्दू के पास से नहीं मिलती..बाकी फ़िल्म बिनिया और नन्दू के बीच छतरी को लेकर इसी तनाव की कहानी है..

फ़िल्म बच्चों की निश्छल दुनिया को दिखाती है.. काफ़ी हद तक और काफ़ी देर तक बच्चों की मासूम नज़र से भी दिखाती है.. इन्टरवल के बाद के एक गाने और कुछ दसेक मिनट को छोड़ दें तो फ़िल्म में एक कसाव बना रहता है.. बच्चों की उस भूली बिसरी दुनिया को मैं देखता सुनता रहा जो काफ़ी सालों से हिन्दी फ़िल्मों के लिए अनजानी है.. सत्तर के दशक में गुलज़ार ने उसे कभी छुआ था.. और अस्सी के दशक में शेखर कपूर ने.. नहीं तो बचपन का वह संसार हिन्दी फ़िल्मों में निरापद ही रहा है..

फ़िल्म हिमाचल के किसी छोटे कस्बे में फ़िल्माई गई है.. और गर्मी, बरसात और बरफ़ानी सर्दी सभी मौसम की रंगत दिखलाती है.. पहाड़ों पर आप किसी भी तरफ़ कैमरा रख कर चला दीजिये कुछ खूबसूरत क़ैद हो ही जाएगा.. लिहाज़ा फ़िल्म खूबसूरत बनी रहती है.. शायद और खूबसूरत भी हो सकती थी.. संगीत विशाल का अपना है.. और एक गीत को छोड़कर बचपन का संसार का जादू बनाये रखने में मदद करता है.. संवाद हमेशा की तरह इस फ़िल्म में भी विशाल के ही हैं.. और बहुत उम्दा हैं.. पंकज कपूर कमाल के अभिनेता है.. एक बार फिर साबित करते हैं.. दो चार अन्तराष्ट्रीय अवार्ड अगर वह बटोर लायं तो कोई हैरानी नहीं होगी..

और आखिर में कथानक जिसमें विशाल हमेशा चित हो जाते हैं.. इस बार ज़्यादा नियंत्रण में नज़र आते हैं.. कहानी में मौजूद दुनिया का माहौल बनाने में विशाल भारद्वाज का कोई जवाब नहीं.. शायद इस वक़्त के सारे फ़िल्मकारों में वे सबसे अच्छा महौल बना सकने की क्षमता रखते हैं.. मगर जब कहानी सुनाने की और ड्रामा की बारी आती है.. वे लड़खड़ा जाते हैं.. मकड़ी की बात न करें.. उसमें दूसरे मामले थे.. मक़बूल में भी यही हुआ और ओंकारा में भी.. कमाल का माहौल बनाया गया.. मध्यांतर तक फ़िल्म ऐसी जादुई समा बाँधे रहती है कि आप को लगता है कि बवाल है बाबू बवाल.. मगर इन्टरवल के बाद कहानी को आगे बढ़ाते हुए विशाल को पता नहीं क्या हो जाता.. वे ऐसे गिरते पड़ते हुए चलते हैं.. जैसे कोई ज़बरदस्ती उनसे ड्रामा करवा रहा हो.. और उस ड्रामा में उनकी कोई श्रद्धा कोई भरोसा न हो..

ब्लू अम्ब्रेला में भी ये समस्या है.. मगर इतनी कम कि मैं उस का ज़िक्र सिर्फ़ इसलिए कर पा रहा हूँ क्योंकि मैं उसे पहले ही मक़बूल और ओंकारा में चिह्नित कर चुका हूँ.. इस फ़िल्म के आखिर में नन्दू परचूनी का समाज द्वारा बहिष्कार और उसका दुख थोड़ा ज़्यादा खिँच गया लगता है..साथ ही छतरी खो जाने के बाद बिनिया की भावानात्मक जगत का प्रतीकात्मक चित्रण भी.. हो सकता है वह लड़की की अभिनय क्षमताओं की सीमाओं के चलते भी किया गया हो.. मगर बिनिया के दुख को दिखाने के और भी तरीके हो सकते थे.. जो फ़िल्म के मूड के साथ तालमेल रखते.. और बचपन की जिस मासूमियत और भारहीनता के साथ आप शेष फ़िल्म का आनन्द ले रहे होते हैं इन हिस्सों पर आ कर वह जादू टूट जाता है.. और फ़िल्म आप को भारी लगने लगती है..

मेरे इस महीन पाठ से ज़रा भी हतोत्साहित मत होइये.. मैं फिर कहता हूँ.. कि यदि हिन्दी फ़िल्मों की नकली, हिंसक और बाज़ारू दुनिया से आप तंग आ चुके हैं और हिन्दी फ़िल्म वालों के खिलाफ़ आप के मन में गहरा आक्रोश है.. तो इस फ़िल्म को ज़रूर देखिये.. हो सकता है कि फ़िल्मों की रंजकता और किसी संसार को सच्चाई से दिखा सकने की उनकी क्षमता पर फिर से भरोसा जाग जाए.. एक ईमानदार कोशिश है जिसे देख कर आनन्द लिया जाना चाहिये.. अफ़सोस यह है कि मेरे अलावा हॉल में और पन्द्रह लोग ही इस आनन्द का पान करने मौजूद थे..

- अभय तिवारी