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1/22/2011

पूंजीवाद: एक प्रेमकथा

माईकेल मूर की 2009 में बनाई डॉक्यूमेंटरी, कैपिटलिज़्म अ लव स्टोरी. 2007 से 2010 के बीच अमरीका की अर्थिक मन्दी, वित्तीय संकट और पूँजीवाद के सड़ांध की विश्लेषणात्मक टिप्पणी दिखाता ये फिल्म उद्वेलित करता है.

हमारी यह समझ कि जिन विकसित देशों में शिक्षा और संपदा एक मोटे तरीके से लगभग अंतिम व्यक्ति तक- पूरे तौर पर नहीं भी लेकिन बुनियादी ज़रूरातों की हद तक कम से कम- पहुँच पा रही हो (शायद उन्हीं वजहों से वहां विकास संभव हुआ होगा ऐसा सोचना बेवकूफी नहीं ), उन समाजों में व्यक्तिगत लोभ उस पतनशील नीचाई तक नहीं पहुँचेगा जहाँ समाजिक सरंचना के बुनियादी तत्व खतरे में पड़ें. माईकेल मूर इस भोली समझ को झटके से तोड़ते हैं. जुवेनल चाईल्डकेयर के भ्रष्टाचारी मसले हों या फिर वाल स्ट्रीट कसीनो की कहानियाँ या फिर कम्पनियों द्वारा जीवन बीमा के खेल या होम फोरक्लोज़र्स की विदारक कहानियाँ. अंग्रेज़ी का एक शब्द है ऐवरिस, लोभ.

पूरी फिल्म देखते बार बार ये एहसास होता है कि इंसानी फितरत क्या सिर्फ इतनी है? फिल्म के एक सिक्वेंस में पूछा जाता है, डिफाईन रिच, जवाब आता है- फाईव मेन. तो यही है कहानी, चाहे किसी भी देश की हो, किसी भी राजनैतिक तंत्र की या फिर किसी भी सामाजिक पद्धति की.

इसी सिलसिले में हॉब्सबॉम का यह इंटरव्‍यू भी गौरतलब है, जहाँ वो कहते हैं: “The basic problems of the 21st century would require solutions that neither the pure market, nor pure liberal democracy can adequately deal with. And to that extent, a different combination, a different mix of public and private, of state action and control and freedom would have to be worked out.”

क़ुछ नाटकीय अदाबाजियों के बावज़ूद मूर की फिल्म में एक किस्म का भोला निर्दोषपना है जहाँ टेढे मसले और बीहड़ आर्थिक जटिलताओं को साफ सरल तरीके से दर्शकों तक पहुँचाया जाता है और मूर फिल्म के अंत तक दर्शक को अपना भागीदार बना लेने में सफल होते हैं. अंतिम दृश्य में क्राईम सीन की पीली पट्टी लगाते मूर दर्शकों को कहते हैं कि उन्हें दर्शकों का साथ चाहिये, उन सबों का जो थियेटर में ये फिल्म देख रहे हैं. ये फिल्म इसी चेतनता को पाने के लिये देखनी चाहिये. अपने समय की सच्चाई का एक छोटा टुकड़ा क्योंकि सिर्फ इतनी कमियाँ इतना ही भ्रष्टाचार है, सोचना भी किसी भोली नासमझ दुनिया का वासी होना है. ये सिर्फ टिप ऑफ द आईसबर्ग है.

- प्रत्‍यक्षा

1/02/2011

मैंने नहीं किया, शायद जीवन ने किया हो..

बारह साल के जेरोम के सर का भारी घड़ा हर समय शर्म से भरा रहता है कि पड़ोस के अन्‍य घरों की तरह उसका घर 'नॉर्मल' क्‍यों नहीं. घर के अहाते में तमाशा बने बाप के आगे जेरोम गिड़गिड़ाता है कि पप्‍पा, प्‍लीज़, पड़ोस के सबलोग हमें पागल समझते है? बाप बच्‍च्‍ो को आश्‍वस्‍त करता है कि सही समझते हैं, वी आर ए क्रेजी फ़ैमिली! मैं जिस तरह खुशी में घबराकर सिगरेट जला लेता हूं, जेरोम का हूनरमंद छोटा भाई लेओं गले में फंदा लगा लेने का टाईमपास करता है, स्‍क्रू ड्राइवर से खिड़की तोड़कर छुट्टी पर बाहर गए पड़ोसियों के घर 'डाका' डालता है, माथे पर दुख ज़्यादा चढ़ने लगे (या असमंजस. दोनों एक ही नहीं?) तो घबराकर छुरी से कंधा चीर लेता है, या बीस मीटर ऊंचाई से लहराकर नीचे कूद जाता है. यह सारी फुलकारियां कैनेडियन फ्रेंच फ़िल्‍म 'कसम खाकर कहता हूं, मैंने नहीं किया' की फूल-पत्तियां हैं. जेरोम की दस वर्षीय दु:खहारी पगलाहटों की संगत में मॉंट्रियल की हरियाली में हरा होते हुए मन बाग़-बाग़ हो जाता है. पता नहीं कुछ खुराफाती कैसे होता है कि उदासियों का ऐसा मीठा सिनेमा रच लेते हैं. जबकि फिलीप फलादेउ उम्र में मुझसे सात वर्ष छोटा है और कुछ दिनों पहले मैंने उसकी एक और फ़िल्‍म देखी थी, 'फ्रिज़ का बायां किनारा', दु:खभूगोल के उल्‍टे-सीधे मनचीरकारी उसमें भी थे, पर ऐसा मार्मिक उत्‍पात कहां था? आंद्रे तरपिन की ऐसी सिनेकारी कहां थी, कि पैट्रिक वॉटसन का, बांस के जंगलों में दीवारों के बीच दबी, फंसी, ऐंठी बजती हवा की मनतोड़ संगीत की संगत नहीं थी, इसलिए?

मैं बहकता जाऊंगा इसलिए बेहतर है पहले आप उस बहन में गिरकर बहक जाने की जगह पैट्रिक के एक ट्रैक में मन का सुर सेट कर लें. साथ ही 'कसम' का ट्रेलर देख लें (हालांकि ट्रेलर फ़िल्‍म की खूबसूरती का रत्‍ती भर कंपेनसेशन नहीं)..

क्‍या है कैनडा में, कहां से उस शांत लगभग निर्विकार लैंडस्‍कैप में मनहारे के इंटेंस पहाड़ फूटते रहते हैं? ऑलिवियेर असाये का 'क्लीन' और 'समर अवर्स' और डेनी आरकां की (जीसस ऑफ़ मांट्रियल, द बारबेरियन इनवेज़ंस) जैसी अनोखी, विरल सिनेनिबंध फूटते रहते हैं? असाये ने पिछले साल टेलीविज़न के लिए साढ़े पांच घंटे की 'कारलोस' तैयार की (प्रमोद सिंह ने देख ली, और बुरी नहीं है)..

कृपया कुछ और फ़ि‍ल्‍मों पर नज़र रखें (क्‍योंकि कैनेडियन फ़ि‍ल्‍ममेकर हमसे भले मनवाना चाहें दु:ख पर उनकी बपौती नहीं. मन में लेओं का स्‍क्रूड्राइवर चलाने को पड़ोस का अमरीका भी बीच-बीच में वैसा ही हहियाता रहता है. नोट करें 'द किड्स आर ऑल राइट', केविन स्‍पेसी की 'श्रिंक', 'लाइफ ड्यूरिंग वॉरटाइम'. फिर ऑस्‍ट्रेलिया भी पीछे नहीं छूट रहा, उसके शो-केस में है 'एनीमल किंगडम',, एनीमेटेड 'मैरी एंड मैक्‍स' और 'लैंटाना'. पिछले दिनों सुना युक्राइना भी अपनी आमद बताने पिछले वर्ष कान अपनी एक फिल्‍म 'माई जॉयज़' के साथ पहुंचा हुआ था (नाम से धोखे़ में न जायें, हालांकि फ़ि‍ल्‍म अभी मैंने देखी नहीं है).

जय हो सदाबहार संसार. चलते-चलते पैट्रिक का एक और यह ट्रैक भी सुनते चलिए..

बकिया आप सभी को नया साल मुबारक हो..

12/13/2009

दु:ख के रिसाव..

सामान्‍यतया, प्रकट तौर पर इतिहास हमेशा हमसे ज़रा दूर, कहीं बाहर चल रही परिघटना की तस्‍वीर बनी रहती है. वह अभागे लोग होते हैं जिनका जीवन सीधे उस भंवर की चपेट में आ जाए. क्‍लॉदिया ल्‍लोसा निर्देशित पेरु की फ़ि‍ल्‍म 'द मिल्‍क ऑव सॉरो' कुछ ऐसे ही अभागे संसार का सफर है. अपनी मां के मरने के बाद बहुत डरी हुई जवान नायिका फाउस्‍ता डगमग पैरों अपने अतीत में उलझी अपना वर्तमान सहेजने की कोशिश कर रही है. मज़ेदार यह है कि फाउस्‍ता की कहानी बड़ी आसानी से एक समूची सभ्‍यता का विहंगम दस्‍तावेज़ बनने लगता है. अंग्रेजी के एक ब्‍लॉग पर फ़ि‍ल्‍म की एक सीधी समीक्षा है, दिलचस्‍पी बने तो उधर नज़र मार लें. ब्रॉडबैंड अनलिमिटेड के जो सिपाही फ़िल्‍म डाउनलोड करना चाहते हैं तो उसका टौरेंट लिंक यह रहा.

4/03/2009

तीन का एक: फिर एक बार हिंदी फ़ि‍ल्‍में..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों पर लिखना, लिखते रहना सचमुच कलेजे का काम है. ऐसा नहीं है कि हिंदी साहित्‍य पर लिखना कलेजे का काम नहीं है, लेकिन साहित्‍य के साथ सहूलियत है कि आप किताब बंद कर देते हैं चिरकुटई ओझल हो जाती है, जबकि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की रंगीनियां आपका पीछा नहीं छोड़तीं, बस के पिछाड़े से लेकर बाथरुम के आड़े तक ‘मसक अली, मसक अली!’ की मटक का सुरबहार तना रहता है. बार-बार याद कराता कि अभीतक हमको नहीं देखे? जन्‍म फिर ऐसे ही सकारथ कर रहे हो? आप अस्तित्‍ववादी चिंताओं में घबराकर ‘दिल्‍ली 6’ की ज़द में घुस ही गये तो फिर दूसरी वैचारिक घबराहटें शुरू हो जाती हैं. पहली तो यही कि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का निर्देशन करनेवाले ये प्रतिभा-पलीता किस देश के कैसे प्राणी हैं? और जैसे भी प्राणी हैं भक्ति व श्रद्धा में भले इनका रंग निखरता हो, फ़ि‍ल्‍म बनाने का करकट करतब किस भटके डॉक्‍टर ने इन्‍हें प्रीसक्राइब किया है? माने अभी ज्यादा वक़्त नहीं हुआ आपने ‘रंग दे बसंती’ के तरबूज के फांक काटे थे, और इतनी कर्कटता से अब तरबूज की तरकारी (या ‘दिल्‍ली 6’) परस रहे हैं? कहां गड़बड़ी कहां है, भाईजान? काम की कंसिंस्‍टेंसी कोई चीज़ होती है? कि स्‍टील की फैक्‍टरी में आप प्‍लास्टिक की चप्‍पल मैनुफैक्‍चर कर आते हैं? और बाहर आकर दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए मुस्‍कराते भी रहते हैं कि इट्स अ ट्रिब्‍यूट टू माई सिटी! इज़ दिज़ सम ट्रिब्‍यूट, मिस्‍टर मेहरा, ऑर हाथी की लीद? इट्स रियली नॉट फ़नी!

माने सचमुच यह दार्शनिक प्रश्‍न होगा कि आप किस एंगल से ‘दिल्‍ली 6’ को एक फ़ि‍ल्‍म मानें. माने इसलिए मानें कि फ़ि‍ल्‍म में बहुत सारे एक्‍टर हैं और वो बहुत सारी बकबक करते हैं और किसी घटिया वाईड एंगल वीडियो की तर्ज़ पर रामलीला जैसा कुछ जाने कितने जन्‍मों तक चलता रहता है? मैंने काफी समझा-बुझाकर खुद को तैयार किया था कि कम से कम मिस्‍टर जूनियर बच्‍चन को अमरीका से लौटा हुआ मान लूं, मगर इतनी रियायत भी मन पचा ले लगता है अभिषेक बाबा इतने पर के लिए भी तैयार नहीं थे. अमरीका से नहीं प्रतापगढ़ के किसी टैक्‍सी यूनियन के सेक्रेटरी के छुटके भइय्या रौशन ख़ानदान हैं पूरे वक्त इसीकी प्रतीति होती रही! कास्टिंग के बारे में सचमुच क्‍या कहा जाये, फ़ि‍ल्‍म की इकलौती अच्‍छी बात ‘मसक अली’ वाले गाने को देखते समय लगता है कबूतर की कास्टिंग सही हुई है. दिल्‍ली और चांदनी चौक लगता है मुमताज़ के 'दुश्‍मन' के ‘देखो, देखो, देखो, बाइस्‍कोप देखो’ से इंस्‍पायर होकर डायरेक्‍टर साहब कैप्‍चर कर रहे थे.

अबे, सचमुच कोई हिंदी फ़ि‍ल्‍म क्‍यों देखे? मगर यह फिर वही बात हुई कि कोई हिंदी में किताबें क्‍यों पढ़े. आदमी अकेलेपन से घबराकर जैसे शादी कर लेता है, मैं हिंदी की किताब एक ओर हटाकर हिंदी फ़ि‍ल्‍म देखने चला जाता हूं! इसी तरह के मानसिक भटकाव में ‘गुलाल’ देखने चला गया होऊंगा. फ़ि‍ल्‍म के दस मिनट नहीं बीते होंगे, ख़ून खौलानेवाली बहुत सारी बड़ी-बड़ी बातें होने लगीं, मैं भी खौलता हुआ वयस्‍क दर्शक बनने की भूमिका बनाने लगा. मगर फिर बहुत जल्‍दी थियेट्रिकल गानों की थियेट्रिकल अदाओं से ऊब इस समझ पर भी आकर आराम करने लगा कि फलां जगह घुसा देंगे, डंडा कर देंगे की महीन बुनावट वाली ये दुनिया हमें पारंपरिक हिंदी सिनेमा से अलग दुनिया देखने के क्‍या नये मुहावरे दे रही है, सचमुच दे रही है?देव डी’ पर बड़े सारे भाई और बच्‍च लोग गिर-गिरके बिछते और बिछ-बिछके गिरते रहे मगर वह टुकड़ा-टुकड़ा दिल की कौन नयी दुनिया खोल रही थी? या ड्रग्‍स, सैक्‍स, वॉयलेंस का एक ज़रा सा हटके वही पुराना कॉकटेल ठेल रही थी? कुछ लोग मेरे कहे से संभवत: नाराज़ हो जायें, कि मैं फ़ेयर नहीं कह रहा एटसेट्रा मगर माफ़ कीजिये, दोस्‍तो, मेरे पास इस सिनेमा के लिए ‘सिनेमा ऑफ़ डिसपेयर’ से अलग और कोई नाम नहीं सूझता. एंड इन माई अर्नेस्‍ट सिंसीयरिटी आई जेनुइनली क्‍वेश्‍चन ऑल दोज़ फ़ि‍ल्‍म एंथुसियास्‍ट्स हू आर गोइंग गागा ओवर गुलाल..

गुलाल से निकलकर ‘बारह आना’ लोक में गया, और सच कहूं फ्लैट, इकहरा डायरेक्‍शन, खराब ऐक्‍टरों व निहायत सिरखाऊ बैकग्राउंड स्‍कोर के बावज़ूद फ़ि‍ल्‍म देखने का मलाल नहीं हुआ. आसान रास्‍तों की सहूलियत से मुक्‍त, नेकनीयती और मुश्किल स्क्रिप्‍ट धीरे-धीरे अपने को संभाले ठीक-ठाक निकल जाती है. गुलाल की बजाय बारह आना वाली दुनिया में होना ज़्यादा अर्थपूर्ण लगता है.

1/27/2008

रिज़र्वेशन रोड

साल: 2007
भाषा: अंग्रेजी
लेखक: जॉन बर्न्हम श्‍वॉटर्ज़ व टेरी जॉर्ज
निर्देशक: टेरी जॉर्ज
रेटिंग: **

हमारी आत्‍मा में झांके फ़ि‍ल्‍म हमारे यहां इतना विकसित माध्‍यम नहीं. गाहे-बगाहे आंख में झांक जाये उतने से ही हम आत्‍मा जुड़ा लेते है. नहीं तो औसतन तो यही होता है कि ज़्यादा वक़्त किसी ‘संडे’, किसी ‘वेलकम’ की संगत में हेंहें-ठेंठें करते हैं और नहीं करनेवाले को बिना बोले नज़रों से जवाब देते हैं कि इसमें अजीब क्‍या है.. टेरी जॉर्ज़ की ‘रिज़र्वेशन रोड’ की यही खूबी है कि वह आत्‍मा में झांकती नहीं, फ़ि‍ल्‍माअवधि के अधिकांश में वहीं बनी रहती है. कभी इतनी-इतनी देर तक रहती है कि फ़ि‍ल्‍म के क़ि‍रदारों के साथ हम भी वही तक़लीफ़ें और संत्रास जीने लगते हैं जिसने एक पारिवारिक दुर्घटना में उलझाकर एकदम से उनका धरातल बदल दिया है. बाज वक़्त लगता है त्रासदी में इन्‍वॉल्‍व्‍ड ये चरित्र हाड़-मांस की देह नहीं, मन:स्थितियों का विशुद्ध गैस और इमोशन हैं! थोड़ी नाटकीयता का रिस्‍क लेते हुए कहना चाहूंगा कि इन अर्थों में फ़ि‍ल्‍म के चरित्र जैसे लगातार एक दोस्‍तॉव्‍स्‍कीयन दुनिया में मूव करते रहते हैं. टेरी जॉर्ज़ की एक सबसे सराहनीय बात है कि कहानी की महानाटकीयता के बावजूद फ़ि‍ल्‍म कहीं भी नाटकीय लटकों में नहीं फंसती. फ़ि‍ल्‍म के शुरुआती दस मिनटों में अलबत्‍ता इस ख़तरे की आशंका होती है.. मगर उसके बाद की अवधि अच्‍छी, ईमानदार फ़ि‍ल्‍मों के भूखे दर्शक को खांटी सिनेमा से आश्‍वस्‍त करती है. अच्‍छे तो सब हैं लेकिन त्रासदी में सबसे ज्यादा उलझे चरित्रों को प्‍ले कर रहे जॉकिम फिनिक्‍स और मार्क रफ्फलो दोनों की एक्टिंग काफी इम्‍प्रेसिव है..

कंटेपररी समय में शहरी जीवन के मनोलोक के पारदर्शी सिनेमा में आपकी रुचि हो तो ‘रिज़र्वेशन रोड’ तक की एक कसरत आप भी कर आइए.

11/28/2007

जब वी मेट रीविसिटेड..

by Jainarain

"Jab We Met" is not about real life and real situations, but whenever the mainstream Hindi films are? Besides, anyways, films are not about real life.. they just happen to carry some illusions to the kind of reality we know.. that even JWM does. But it’s not a good film for a regular film-buff, meaning it’s loaded with patchy stuffs—bad songs, badly acted cameo scenes, shoddy tidbits here and there. Then what’s good about it? Well, going by the current mumbo-jumbo fiesta of “Sawaria” and “Om Shanti Om”, JWM is prettily written script, with lots of interesting conversation between a boy and a girl... And Kareena generally, and Shahid for the last forty minutes of the film, invest it with shiny performances, where one really stays hooked to of how they are going to handle their heart…

There are touching moments of emotional ambiguities (the way they really are in life), uncertainty, hurt and happiness the way you hardly see them in a conventional Hindi movie… thinking all this one feels good that the audience has lapped it up and the film is making money.

5/24/2007

द हिचहाइकर्स गाइड टू द गैलेक्‍सी

साइंस फ़ि‍क्‍शन के बारे में मैं उतना ही जानता हूं जितना करीना कपूर नॉम चॉम्‍स्‍की के बारे में जानती होंगी. डगलस एडम्‍स का नाम भर सुना था, ‘द हिचहाइकर्स गाइड टू द गैलेक्‍सी’ से उनके असोसियेशन की ख़बर नहीं थी. बहरहाल, इसे भी संयोग ही कहेंगे कि फ़ि‍ल्‍म हत्‍थे चढ़ी तो हमने सोचा एक नज़र मार लेते हैं. आख़ि‍र कुछ तो बात होगी कि इतने समय से ‘हिचहाइकर्स..’ शीर्षक हवा में है. फ़ि‍ल्‍म ख़राब हुई तो दस मिनट बाद खेला खत्‍म करके सब भूल-भुला जाएंगे. तो भई, हमने फ़ि‍ल्‍म देखी. और दस मिनट नहीं पूरी देखी. और चुटीले संवादों और डिज़ाइन की जटिलता में रस लेकर देखी. डगलस एडम्‍स की निहायत लोकप्रिय किताब व सत्‍तर के दशक के मशहूर बीबीसी रेडियो शो पर आधारित फ़ि‍ल्‍म को एडम्‍स के फैन्‍स ने शायद बहुत पसंद नहीं किया, मगर हमने जो किताब पढ़ी नहीं और फ़ि‍ल्‍म को फ़ि‍ल्‍म की ही तरह देख रहे थे, सचमुच आनंदित हुए. गार्थ जेनिंग्स‍ की यह पहली फ़ि‍ल्‍म (2005) है. और लहे तो एक नज़र मारने से आप भी मत चूकियेगा.

4/05/2007

सामयिक यूरोप का असुविधाजनक टिकट

टिकेट्स (2005), निर्देशक त्रयी: ओल्‍मी, क्‍यारोस्‍तामी, लोच

एक घंटे पचास मिनट की फिल्‍म. इंटरसिटी रेल के सुविधा-संपन्‍न व उतने आरामदेह नहीं डिब्‍बे. इंस्‍ब्रुक से रोम तक आज के यूरोप की अस्थिरता, बेचैनियों से भरा सफर. और इस सफर के अलग-अलग पड़ावों पर एक बिंदु से कथा उठाकर दूसरे बिंदु तक उसे छोड़ आने को तीन अलग-अलग निर्देशक. ओरमान्‍नो ओल्‍मी (इटली), अब्‍बास क्‍यारोस्‍तामी (ईरान) और केन लोच (यूके). मैं फिल्‍म की कहानी के विस्‍तार में जाकर शब्‍द नहीं खाऊंगा. कहानी यहां सामयिक यूरोप की परतों को दर्शाने का जरिया भर है. एक बुज़ुर्ग प्रोफेसर के गुज़रे ज़माने की कोमलता वर्तमान के भय व आशंकाओं के बीच अपने भावभीनेपन को जिलाये रखने की छोटी कोशिशें करती है. उसके स्‍वायत्‍त, सुखी संसार की तकलीफ़ बुढ़ापा उतनी नहीं जितनी शहरी जीवन को लगातार घेरते असुरक्षा के खतरे और रोज़-बरोज़ के जीवन की हिंसा है. असहनशीलता है. वृहत्‍तर पैमाने का सामाजिक कटाव है (यह सेगमेंट सिनेमा के पुराने माहिर हाथ ओल्‍मी ने हैंडल किया है). अगली कड़ी एक अपेक्षाकृत लेड-बेक और उदासीन नौजवान और उसकी जबर जीना हराम करती मां के बारे में है. धीरे-धीरे हम इस रिश्‍ते, और सामयिक समाज के तनावों की और गहरी पेचिदगियां खुलता देखते हैं. निरपेक्ष बने हुए लगातार स्‍तंभित करते रहने की यहां परिचित क्‍यारोस्‍तामी का कमाल हमारे हाथ लगता चलता है. केन लोच की आखिरी कड़ी रोम में अपनी टीम का मैच देखने जा रहे तीन सेल्टिक लड़कों की अपनी छोटी सीमित दुनिया की पहचान और फिर एक अल्‍बानियन शरणार्थी परिवार के दुखों में हिस्‍सेदार होकर वृहत्‍तर यथार्थ से जुड़ने की मानवीय बेचैनी है. आज का इंप्रेसनिस्टिक सिनेमा अपने डेंस लेयर्स में हमें अभी भी काफी कुछ देता रह सकता है, टिकेट्स उसका बेहतर व मर्मस्‍पर्शी उदाहरण है.

3/28/2007

The Namesake

A Stroll Through Life

By Arun Varma

During the Mumbai Film Festival a couple of years ago, a filmmaker friend of mine once walked out of a film. He told me he could no longer bear watching films traveling less than ten kilometer per hour. I remember being very amused by the way he put it… traveling less then ten km per hour.

The Namesake by Mira Nair does just that. It is a stroll through the walk of life where the filmmaker sometimes makes you sit on the pavement and watch the world as it goes by. By the end of the stroll you realize that you have gone through a lifetime. Nothing happens in the film. Only life. Just life.

The most striking quality of the film is it’s serenity—almost like an Ozu. This serenity assumes various shades. Of joy, nostalgia, loneliness, unbelonging and grief. Like a calm river with surging undercurrents. Even the slightest ripple on this calm surface makes an impression—the image of Ashima collapsing outside her house on a lonely Newyork street at night after hearing of her husband’s death. Or the image of Gogol with a shaved head walking in to meet his mother after his father’s demise.

I would like to tell that friend of mine to watch this film. Who knows.. he might just end up liking it. .

3/20/2007

1971

by Jainarain

It could have been a decent film. It’s not. The basic idea (provided by the director Amrit Sagar) – of a group of Indian prisoners from 1971 Indo-Pak war whose fate hang precariously, seeing no sign of freedom they plan a daring escape—was not bad for a trite drama and patches of heroism. But the premise is terribly screwed up in the final script and dialogues (both written by Piyush Mishra). One feels sorry for the first time director who appears well intentioned (not playing to the galleries the usual jingoistic stuff, using just two songs and not going for a heroine when the story didn’t require it) but at the same time he seems too confused as what to hold and what to throw away. There are scenes in the film you wish they were one fourth of their length and then there are scenes you wish they were not there at all. The background score is tacky and so is the casting of the film (towards the climax characters enacting Pakistani army personnel behave as if they are in some bad college play). Mr. Bajpai carries the same expression throughout the whole film and you wonder what is he trying to convey with his wetty eyes. Though Ravi Kishen, Deepak Dobriyal, Chitranjan Giri and Manav Kaul manage to get in to skin of their characters. The only true grace of the film is the camera work done by Chirantan Das but bad films are not saved just by good camera. One hopes next time Amrit gets closer to what he starts with. He definitely can make better stuff.

3/08/2007

तानाशाह का काला चेहरा

द लास्‍ट किंग ऑफ स्‍कॉटलैंड

कुछ समय पहले हमने ऑल द किंग्‍स मेन की चर्चा की थी. कि कैसे सत्‍ता एक भले-भोले आदमी को बर्बर और निरंकुश जानवर में बदल डालती है. ‘द लास्‍ट किंग ऑफ स्‍कॉटलैंड’ उसी सवाल की एक दूसरी तरह की पडताल है. यहां अब वह महज़ नैतिक आग्रहों की पडताल की बजाय अफ्रीका में अंग्रेजी उपनिवेशवाद के जबडों से उपजे भूगोल विशेष के आर्थिक-राजनीतिक सीमाओं की पहचान की रुपरेखा बुनती है. इसलिए भी एक काल्‍पनिक डॉक्‍टर की वास्‍तविक घटनाओं के गिर्द रची किताब पर आधारित फिल्‍म इदी अमीन के जीवन पर ही टिप्‍पणी नहीं है, यह जाने-अजाने उस सामाजिक-ऐतिहासिक द्वंद्व का भी अन्‍वेषण है जिसने बीसवीं सदी के अफ्रीका को ऐसे उलझे, और पश्चिमी नज़रों में ‘कैरिकेचरिश’ अमानवीय तानाशाह दिये हैं.

फिन्‍म का आरंभिक आधा घंटा एक लिबरल, आइडियलिस्‍ट स्‍कॉटिश नौजवान डॉक्‍टर की नज़रों से युगांडा को देखना- ललिया मिट्टी की सडकें और हरे मैदानों का विस्‍तार- काफी लुभावना बना रहता है. बाद में जैसे-जैसे फिल्‍म का कथ्‍य जटिलताओं में उतरता है, आज की ब्रिटिश फिल्‍ममेकिंग की सीमायें उसके रास्‍ते आडे आने लगती हैं. खामखा का नाटकीय संगीत और संपादन कभी-कभी भ्रम जगाता है मानो हम कोई हिंदी फिल्‍म देख रहे हों. मगर फॉरेस्‍ट विटेकर समेत बाकी एक्‍टरों का काम अच्‍छा है, और बंद, पिछडे मुल्‍कों की तानाशाही की एक अच्‍छी झलक हमें देखने को ज़रुर मिलती है. डॉक्‍यूमेंट्री बनाते रहे केविन मैकडॉनल्‍ड की यह पहली फीचर फिल्‍म है.

2/27/2007

ऑस्‍कर: ढाक के तीन पात

हरी राजनीति की अनुशंसा, लेकिन अमरीकी नीतियों की आलोचना से दुराव


बडी स्‍टूडियो की बडी मुख्‍यधारा फिल्‍मों को ईनामों से नवाजकर ज्‍यादा एक्‍सपोज़र व बडा बाज़ार दिलवाने में मदद करना ऑस्‍कर में पुराना प्रचलन रहा है. फिर किस राजनीति के सहयोग में वह खडी होगी, और किसे ईनामों से दूर रखकर वह उससे अपनी राजनीतिक दूरी भी जताती चलेगी, यह भी लंबे अर्से से दिखता रहा है. तो सामयिक अंतर्राष्‍ट्रीय परिदृश्‍य में जो फिल्‍म (बेबेल) अमरीकन राजनीति पर सबसे सार्थक व चुनौतीपूर्ण सवाल खडे करती है उसे न तो श्रेष्‍ठ फिल्‍म का पुरस्‍कार मिला, न अलेहांद्रो गोंसालेज इन्‍नरितु सर्वश्रेष्‍ट निर्देशक चुने गये, न ही फिल्‍म की पटकथा के लिए गुल्येर्मो अरियागा को याद किया गया. मज़ेदार यह है कि इनमें से ज्‍यादा पुरस्‍कार ‘द डिपार्टेड’ के हिस्‍से आये (मूल पटकथा का पुरस्‍कार माइकल आंर्ड्ट को ‘लिटिल मिस सनशाइन’ के लिए मिला), जिससे भले मार्टिन स्‍कोर्सेसे जुडे हों लेकिन है वह एक अपराध कथा ही. ‘बेबेल’ के संगीत को पुरस्‍कृत करके उससे पिंड छुडाया गया. इन्‍नरितु की बडी आलोचना को बेअसर करने के असंतुलन को जैसे अल गोर की डॉक्‍यूमेंट्री ‘एन इंकंविनियेंट ट्रूथ’ की हरी राजनीति को पुरस्‍कृत करके किया गया.

स्‍कोर्सेसे निर्देशन के लिए नामांकित सात दफा हुए मगर ईनाम पहली बार पा रहे हैं. उनके चाहनेवाले इससे राहत की सांस भले लें मगर इसे वे भी जानते हैं कि जब स्‍कोर्सेसे की फिल्‍मों की बात होगी तो लोग ‘रेजिंग बुल’, ‘गुडफेलास’ और उनकी पुरानी फिल्‍मों की याद करेंगे, ‘द डिपार्टेड’ की नहीं. गनीमत है अभिनय का अवार्ड फॉरेस्‍ट विटेकर के हिस्‍से गया, और इतने वर्षों बाद ही सही, एन्नियो मोरिकोने के संगीत व करियर को इज्‍ज़त बख्‍शना ऑस्‍कर को याद आया.

2/23/2007

किसने कहा सिगरेट 'कूल' नहीं?

एक छोटी दूसरी शुरुआत. आनेवाले दिनों में हमारी कोशिश होगी सिलेमा के माध्‍यम से फिल्‍मों संबंधित (नई-पुरानी, देशी-विदेशी) संक्षिप्‍त सूचनाओं का हम कुछ प्रसारण संभव कर सकें. कुछ बोर्ड पर दर्ज़ होनेवाले फुटकर नोट्स की तरह. ज़ाहिरन यहां गॉसिप व बेमतलब फिल्‍मों के पीछे ऊर्जा खराब करना उद्देश्‍य नहीं होगा. प्रयास होगा सर्कुलेशन की कुछ अच्‍छी चीज़ों पर हमारी नज़र बनी रहे. काम की फिल्‍में व ट्रेंड्स के बारे में जानकारियों का आदान-प्रदान हो सके.

इस क्रम में आज हम पिछले थोडे समय में प्रदर्शित तीन ऐसी अमरीकी फिल्‍मों की सूचना दे रहे हैं जो अपनी कथावस्‍तु, प्रस्‍तुति, अभिनय हर स्‍तर पर न केवल रोचक है, बल्कि एक दूसरे से काफी अलग-अलग भी. इनमें से थैंक यू फॉर स्‍मोकिंग 2005 में बनी है, बाकी दोनों पिछले वर्ष की फिल्‍में हैं.

जेसन रीटमान निर्देशित थैंक यू फॉर स्‍मोकिंग तंबाकू उद्दोग के प्रवक्‍ता निक नेलर की कहानी है जिसका पेशा है अपनी हंसमुख हाजिरजवाबी से सिगरेट-विरोधी नीति नियंताओं व सामाजिक मंचों को भटकाते रहना. और यह बताना कि सिगरेट अभी भी क्‍यों ‘कूल’ है और अगर उसे पीनेवाले कैंसर का शिकार होते हैं तो उससे कहीं ज्‍यादा अमरीकी नागरिक सडक व विमान दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवाते हैं. फिल्‍म का सुर व्‍यंग्‍यात्‍मक व आधुनिक है जहां हर चीज़ अब धंधा हो गई है और अच्‍छी इरादों की बात करनेवाले भी हमें उतना ही संदिग्‍ध लगते हैं जितना हमारी जान ले रहा आदमी. निक नेलर की भूमिका में आरन एकहार्ट ने मज़ेदार काम किया है.

दूसरी फिल्‍म ऑल द किंग्‍स मेन रॉबर्ट पेन वॉरेन के उपन्‍यास पर आधारित है. स्‍टीवन ज़ायलियान निर्देशित और सान पेनज्‍यूड लॉ के इंटेंस अभिनय वाली यह फिल्‍म एक भले, भोले व नेक़ इरादे वाले व्‍यक्ति की सत्‍ता में आने के बाद पतन की दिलचस्‍प कहानी है. रायन फ्लेकआना बोदेन की हाल्‍फ नेलसन एक माध्‍यमिक इतिहास की कक्षा में ‘डायलेक्टिक्‍स’ पढानेवाले थोडा लिबरल, थोडा वामपंथी, थोडा उत्‍साहित तो थोडा भटके हुए एक ऐसे कुंठित स्‍कूल शिक्षक की कहानी है जो अपनी मिश्रित नस्‍ली कक्षा में कुछ अच्‍छा रचना चाहता है, लेकिन सामाजिक दिक्‍कतों वाली पृष्‍ठभूमि से आये, शिक्षा के प्रति आज के अनुत्‍साहित बच्‍चों के बीच यह कैसे संभव होगा, उसकी यह पहेली हल होती नहीं दिखती. फिर शिक्षक के नशे की कमज़ोरी का राज़ उसकी एक तेरह वर्षीय छात्रा के बीच खुलता है. अपनी अलग-अलग दुनियाओं व सामाजिक भूमिकाओं के बावजूद कैसे एक उलझा हुआ शिक्षक व पारिवारिक मुश्किलों में जी रही कमउम्र छात्रा एक दूसरे का संबल बनते हैं- इसे फिल्‍म दिलचस्‍प तरीके से पकडती है. शिक्षक (रायन गॉसलिंग) व छात्रा (शारिका एप्‍स) दोनों की न केवल कास्टिंग परफेक्‍ट है, दोनों ने अभिनय भी उतना ही अच्‍छा किया है. हैंड हेल्‍ड कैमरा फिल्‍म के चरित्रों की अंदरुनी बेचैनी को व्‍यक्‍त करने का अच्‍छा जरिया बनी रहती है.