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2/15/2008

मिथ्‍या

डाइरेक्टर: रजत कपूर
लेखन: रजत कपूर, सौरभ शुक्‍ला
कैमरा: राफे महमूद‍
साल: 2008
रेटिंग: **

मिथ्‍या के साथ एक बड़ा सच यह है कि फ़ि‍ल्‍म बड़ी ‘मीठी’ है. बेसिक कहानी व उसकी एब्‍सर्ड त्रासदी की बुनावट ऐसी है (एक एक्‍टर क्‍या करे जब उसका अभिनय ही उसकी पहचान खा जाये?) कि ढेरों कड़वाहट के मौके बनते हैं, लेकिन फ़ि‍ल्‍म उन कड़वाहटों में धंसती नहीं. बाजू-बाजू लुत्‍फ़ उठाती रहती है. डिटैचमेंट बना रहता है. तो मीठे के सुर का यह बेसिक कथात्‍मक बेसुरपना ही फ़ि‍ल्‍म का डिज़ाईन बनकर मिथ्‍या का बंटाधार कर देती है. बात समझ में नहीं आई? इससे ज़्यादा मैं समझा भी नहीं सकता. क्‍योंकि मिथ्‍या की मुश्किलों की इतनी ही समझ मेरी भी बन पा रही थी. लचर और ढीली फ़ि‍ल्‍म कहकर फ़ि‍ल्‍म से हाथ झाड़ लेने के आसान रास्‍ते पर मैं जाना नहीं चाहता. क्‍योंकि जिन्‍होंने रजत की दूसरी फ़ि‍ल्‍में देखी हों उनके रेफरेंस में फिर याद कर लेना चाहता हूं कि मिथ्‍या रजत की सबसे बेहतर फ़ि‍ल्‍म है- अपने क्राफ्ट पर कंट्रोल के लिहाज़ से. कहानी व उसे कहने के सुर का कंट्रोल नहीं है मगर शायद वह रजत की फिल्‍ममेकिंग है नहीं. आनेवाले समयों में भी दिखेगी, मुझे नहीं लगता.

सस्‍ते में स्‍मार्ट फ़ि‍ल्‍ममेकिंग का जो रजत ने एक खास स्‍टाईल इवॉल्‍व किया है, वह काबिले-दाद है. मिथ्‍या में वह काफी रिफांइड लेवल की है. छोटे-छोटे सिनेमेटिक इंडलजेंसेस हैं जो कभी उसे फ्रेंच कॉमिक फ़ि‍ल्‍मों के पज़लिंग लोक में उतार देते हैं, तो कभी फ़ि‍ल्‍म में हल्‍के से कोई ‘बुनुएलियन’ टच चला आता है. नेहा धूपिया जैसी सपाट एक्‍टर फ्रेंच मिस्‍टीक अक्‍वायर किये रहती है, यह अपने में अचीवमेंट नहीं लेकिन अम्‍यू‍ज़िंग ज़रूर है. रणवीर को एक्टिंग करते देखना और देखते रहने से पूरी फ़ि‍ल्‍म में आप कभी थकते नहीं. इतने थोड़े समय में टीवी पर डीजेगिरी करते हुए रणवीर ने एक्टिंग में जो हाई जंप्‍स लिये हैं वह हिंदी फिल्‍मों के संदर्भ में सचमुच बड़ा अचीवमेंट है. छोटे रोल में विनय पाठक, ब्रि‍जेंद्र काला समेत बाकी एक्‍टरों को देखना भी कंटिन्‍युसली एंटरटेन किये रहता है. कहानी के लोचे हैं, अग्रीड, लेकिन वह रजत के साथ हमेशा रहेंगे, अदरवाइस मिथ्‍या वैसी मिथ्‍या नहीं है जैसी बॉक्‍स ऑफिस की खिड़की पर नज़र आ रही है.

सिर्फ़ कहानी देखने के लिए आप फ़ि‍ल्‍म देखनेवाले दर्शक न हों, और रजत की फ़ि‍ल्‍ममेकिंग में आपकी कुछ दिलचस्‍पी हो तो एक मर्तबा मिथ्‍या देख आइए. रेकमेंडेड.

1/27/2008

रिज़र्वेशन रोड

साल: 2007
भाषा: अंग्रेजी
लेखक: जॉन बर्न्हम श्‍वॉटर्ज़ व टेरी जॉर्ज
निर्देशक: टेरी जॉर्ज
रेटिंग: **

हमारी आत्‍मा में झांके फ़ि‍ल्‍म हमारे यहां इतना विकसित माध्‍यम नहीं. गाहे-बगाहे आंख में झांक जाये उतने से ही हम आत्‍मा जुड़ा लेते है. नहीं तो औसतन तो यही होता है कि ज़्यादा वक़्त किसी ‘संडे’, किसी ‘वेलकम’ की संगत में हेंहें-ठेंठें करते हैं और नहीं करनेवाले को बिना बोले नज़रों से जवाब देते हैं कि इसमें अजीब क्‍या है.. टेरी जॉर्ज़ की ‘रिज़र्वेशन रोड’ की यही खूबी है कि वह आत्‍मा में झांकती नहीं, फ़ि‍ल्‍माअवधि के अधिकांश में वहीं बनी रहती है. कभी इतनी-इतनी देर तक रहती है कि फ़ि‍ल्‍म के क़ि‍रदारों के साथ हम भी वही तक़लीफ़ें और संत्रास जीने लगते हैं जिसने एक पारिवारिक दुर्घटना में उलझाकर एकदम से उनका धरातल बदल दिया है. बाज वक़्त लगता है त्रासदी में इन्‍वॉल्‍व्‍ड ये चरित्र हाड़-मांस की देह नहीं, मन:स्थितियों का विशुद्ध गैस और इमोशन हैं! थोड़ी नाटकीयता का रिस्‍क लेते हुए कहना चाहूंगा कि इन अर्थों में फ़ि‍ल्‍म के चरित्र जैसे लगातार एक दोस्‍तॉव्‍स्‍कीयन दुनिया में मूव करते रहते हैं. टेरी जॉर्ज़ की एक सबसे सराहनीय बात है कि कहानी की महानाटकीयता के बावजूद फ़ि‍ल्‍म कहीं भी नाटकीय लटकों में नहीं फंसती. फ़ि‍ल्‍म के शुरुआती दस मिनटों में अलबत्‍ता इस ख़तरे की आशंका होती है.. मगर उसके बाद की अवधि अच्‍छी, ईमानदार फ़ि‍ल्‍मों के भूखे दर्शक को खांटी सिनेमा से आश्‍वस्‍त करती है. अच्‍छे तो सब हैं लेकिन त्रासदी में सबसे ज्यादा उलझे चरित्रों को प्‍ले कर रहे जॉकिम फिनिक्‍स और मार्क रफ्फलो दोनों की एक्टिंग काफी इम्‍प्रेसिव है..

कंटेपररी समय में शहरी जीवन के मनोलोक के पारदर्शी सिनेमा में आपकी रुचि हो तो ‘रिज़र्वेशन रोड’ तक की एक कसरत आप भी कर आइए.

12/24/2007

तारे ज़मीन पर

अपने देश में नेकनीयती और साफ़गोई का ऐसा भयानक दलिद्दर है कि एक आदमी भीड़ से हटकर ज़रा भी अलग रास्‍ते पर पैर रखे ऐसा हल्‍ला होने लगता है मानो परमहंस का नया अवतार हो रहा हो, या गांधी बाबा नया आश्रम खोलनेवाले हों! फिर वह आदमी आमिर खान जैसा बड़ा, सेलेक्टिव स्‍टार हो तब तो कहना ही क्‍या. ‘तारे ज़मीन पर’ के रिलीज़ होने के साथ पत्रिकाओं में दो पेज़ के फीचर से लेकर कवर स्‍टोरी तक हर जगह अभी कुछ ऐसी ही छटा फैल गई और बनी रहनेवाली है कि फ़ि‍ल्‍म कैसी अद्भुत, और उसे सिरजनेवाली शख्‍सीयत कैसी अनोखी है! दिक़्क़त इन सुपरलेटिव्‍स की है, बाकी मामला दुरुस्‍त, स्‍वस्‍थ्‍य, खुशग़वार है. ‘तारे ज़मीन पर’ में तारे भी हैं और साफ़-सुथरी ज़मीन भी. आमिर खान की पहली डायरे‍क्‍टोरियल कोशिश है तो उसे ज़रा ऊंची आवाज़ में ताली सुनने का हक़ बनता भी है..

आमिर पॉपुलर सिनेमा के आदमी हैं और पॉपुलर सिनेमा की उनकी जो, जैसी समझ होगी उस पैरामीटर्स में कंसिस्‍टेंट रहते हुए आमिर ने एक ठीक-ठाक मनोरंजक और समझदार फ़ि‍ल्‍म बनाई है. दर्शील सफारी एक सुलझा और समझदार बच्‍चा है. पारंपरिक रूप से सफल बच्‍चे जो सबकुछ कर सकते हैं, उन्‍हें न कर पाने के तनाव और दबाव में जीवन के साथ उसके संबंध व दुनिया को देखने के उसके अंदाज़ के मोह में हम गिरफ़्तार बने रहते हैं, और मनोरंजक तरीके से बने रहते हैं. फ़ि‍ल्‍म का फर्स्‍ट हाफ लगभग दर्शील के कौतुक देखते, उनमें उलझे कैसे गुजर जाती है आपको ख्‍़याल भी नहीं रहता. इंटरवल में आमिर की एक हें-हें, ठें-ठें गाने के साथ एंट्री होती है और हीरो की चिंताओं को एस्‍टेबलिश करने के चक्‍कर में स्क्रिप्‍ट फ़ि‍ल्‍म के असल नायक दर्शील को काफ़ी वक़्त तक चुप करा देती है. ठेंठे वाले गाने के बाद परेशान बच्‍चे के बारे में परेशान होता आमिर का राम शंकर निकुंभ एकदम-से गंभीर हो जाता है और फ़ि‍ल्‍म का यह तीस-चालिस मिनट का ‘आमिरी’ समय उतना एंटरटेनिंग नहीं, उसके बाद फ़ि‍ल्‍म फिर अपना लय पकड़ती है और आखिर तक पकड़े रहती है. अंतिम क्षणों के करीब सिनेमा हॉल के अंधेरे में ज़रा-सी मानवीयता कैसे बचाये रखी जाये के लिए आंसू बहाते हुए हम भोले, भावुक दर्शक‍ क्षणिक तौर पर सुखी बन जाते हैं.

दर्शील सफारी फ़ि‍ल्‍म की उपलब्धि है. उसकी स्‍वाभाविकता, स्‍पॉंटेनिटी, उसकी मैच्‍यूर समझदारी- सब. फिल्‍म के काफी सारे हिस्‍से काफी ढंग से लिखे और एक्‍ट भी किये गए हैं. दर्शिल का स्‍कूल बंक करके आवारा भटकना और दर्शिल के पैरेंट्स से मिलने निकले आमिर की सड़क यात्रा छोटे, दिलचस्‍प सिनेमेटिक मोमेंट बनते हैं. हालांकि दर्शिल के पिता और बोर्डिंग के अध्‍यापकों को विलेन बनाने के कैरिकेचर से बचा जाता तो शायद फ़ि‍ल्‍म और उम्‍दा बनती. गाने कहानी में ठीक से गुंथे हुए हैं और उनके साथ अच्‍छी बात है कि उनमें ऑर्केस्‍ट्रेशन का हल्‍ला नहीं है. उनमें एक कथात्‍मकता है लेकिन बुरी बात यह भी है कि उनमें मेलॅडी की अमीरी नहीं. तो अपने खत्‍म होने के साथ वे उतनी ही आसानी से भुला भी दिये जाते हैं. शायद यह एक कॉंशस प्रयोग हो और खुद में ऐसी बुरी बात न भी हो. सेतु का कैमरावर्क अच्‍छा, फ्रेंडली, एक्‍सेसिबल और कल्‍पनाशील है. वैसा ही प्रॉडक्‍शन डिज़ाईन और एनिमेशन का इस्‍तेमाल भी. अपने व अपने बच्‍चे पर उखड़ने के बाद आप जाकर फिल्‍म देख आयें, गिनकर पांच दफ़ा आंख के कोनों पर नमी महसूस करें, देखिए, मज़ा आयेगा. इससे अलग काम की एक और बात. . जहां तक अपने यहां समस्‍या-प्रधान चरित्रोंवाली संजय भंसाली की 'ब्‍लैक' टाइप फ़ि‍ल्‍मों की बात है, 'तारे ज़मीन पर' उससे दस नहीं तीस कदम आगे है और सिर्फ़ इसी बिना पर उसे मुहब्‍बत से देखी जानी चाहिए.

10/30/2007

जब वी मेट





भाषा: हिन्दी

साल: २००७

लेखक/निर्देशक:इम्तियाज़ अली

रेटिंग:**

उदीयमान निर्देशक इम्तियाज़ अली की पहली फ़िल्म ‘सोचा न था’ भी कुछ छोटी-मोटी कमियों के बावजूद एक ऐसी ताज़गी से भरी फ़िल्म थी जो किसी नए फ़िल्मकार से ही अपेक्षित होती है। मगर अपनी दूसरी फ़िल्म ‘जब वी मेट’ से उन्होने अपने भीतर की कलात्मक ईमानदारी का मुज़ाहिरा कर के फ़िल्म इंडस्ट्री के मठाधीशों के चूहे जैसे दिल को भयाकुल हो जाने का एक बड़ा कारण दे दिया है। क्योंकि वे हर सफल व्यक्ति की तरह वे दूसरों की सफलता की धमक से डरते हैं।

मैं उनके दिल को चूहेसम बता रहा हूँ क्योंकि करोड़पति अरबपति होने के बावजूद उनके भीतर अपनी ही बनाई किसी पिटी-पिटाई लीक छोड़कर कुछ अलग करने का साहस नहीं है। चूंकि पैसे के फेर में अपने दिल की आवाज़ सुनने का अभ्यास तो खत्म ही हो चुका है यह उनकी फ़िल्मों से समझ आता है। और दूसरों की दिलों की आवाज़ पर भरोसा करने की उदारता भी उनमें नहीं होती इसीलिए किसी नए को मौका देने के बावजूद उसकी स्वतःस्फूर्तता को लगातार एक समीकरण के अन्तर्गत दलित करते जाते हैं।

जब वी मेट एक रोमांटिक फ़िल्म है। एक लम्बी परम्परा है हमारे यहाँ रोमांटिक फ़िल्मों की। मगर पिछले सालों में मैने एक अच्छी रोमांटिक फ़िल्म कब देखी थी याद नहीं आता। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ और ‘कुछ कुछ होता है’ को मात्र मसाला फ़िल्में मानता हूँ, उसमें असली रोमांस नहीं है। असली रोमांस देखना हो तो जा कर देखिये जब वी मेट।

-अभय तिवारी

9/07/2007

द ब्‍लैक डाहलिया

साल: 2006
भाषा: अंग्रेज़ी
डायरेक्‍टर: ब्रायन द पाल्‍मा
लेखक: जोश फ्रायडमान, जेम्‍स एलरॉय
रेटिंग: **

बेबात की सत्रह अदायें हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का ही दुर्गुण हो, ऐसा नहीं.. हॉलीवुड में ये नौटंकियां ज़मीन-आसमान एक करने लगती हैं, इसलिए भी कि उनके पास फूंकने को ज़्यादा पैसा है.. लगातार मोबाइल कैमरे से मिज़ानसेन रचने में ‘स्‍कारफेस’, ‘द अनटचेबल्‍स’, ‘मिशन इम्‍पॉसिबल’ जैसी बड़ी व सफल फ़ि‍ल्‍मों के निर्देशक ब्रायन द पाल्‍मा विशेष आनन्‍द लेते हैं.. बहुत बार सीन बड़ा महत्‍वपूर्ण होने जा रहा है इसका भरम भी बनता है.. मगर फिर धीमे-धीमे आप समझने लगते हैं ये अदायें हैं.. और अदायें सिर्फ़ अदायें होती हैं..

2006 में बनी ‘द ब्‍लैक डाहलिया’ चालीस के दशक में एलिज़ाबेथ शॉर्ट नामकी एक अभिनेत्री के मर्डर की सच्‍ची हटना पर लिखे जेम्‍स एलरॉय के उपन्‍यास का फ़ि‍ल्‍मी रूपान्‍तर है.. थ्रिलर.. ब्रायन द पाल्‍मा का हमेशा का पसंदीदा जानर.. विल्‍मोस सिगमोंद की अच्‍छी सिनेमाटॉग्राफ़ी है.. बीच-बीच में अच्‍छे चुटीले वाक्‍य सुनने को मिलते हैं.. लगता है मज़ेदार पॉप फ़ि‍लॉसफ़ी की पंक्तियां बरसीं.. जोश हार्टनेट और स्‍कारलेट जोहानसन का अभिनय भी बीच-बीच में आपको लपेटता है.. मगर फिर आप थकने लगते हैं.. और राह तकते हैं कि ठीक है, भाई, अब फ़ि‍ल्‍म खत्‍म हो.. मगर होती नहीं.. प्‍याज़ की परतों की तरह, और ‘देखो, दुनिया में कितना गंध है!’ वाले अंदाज़ में एक के बाद एक जाने कैसे-कैसे उलझे भेद खुलते रहते हैं.. आपको बस यही समझ आता है देखने में अच्‍छी, मगर अंतत: सुगधिंत मूर्खता है.. हॉलीवुडियन एक्‍स्‍ट्रावैगांज़ा है, विशुद्ध इंडलजेंस है.