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3/12/2015

काली और सफ़ेद

धूप में चुनचुनाते माथे, किसी का इंतज़ार करते, आइसक्रीम चुभलाते-सी कुछ छोटी फ़ि‍ल्‍में होती हैं, फिर मीठे-लाल लबालब तरबूज की उम्‍मीद वाली कुछ बड़ी फ़ि‍ल्‍में होती हैं, और छोटी-बड़ी इन रंग व मिज़ाज अनुभूतियों से बाहर, टेक्‍नोलॉजी व सिनेमाई वितरण के पारम्‍परिक अर्थतंत्र को धता बताता, फिर एक स्‍वायत्‍त संसार होता है काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍मों का, धीमे-धीमे फैलकर आपकी धमनियों में जगह बनाती और मन में एक अलग किस्‍म के गुफ़्तगू का आस्‍वाद छोड़कर माथे में डोलती, अटकी रहती हैं. आखिरी क्‍या ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फ़ि‍ल्‍म थी जिसके देखे का मीठा अब तक बसा है मन में, अभी भी याद है?

रहते-रहते प्रोड्युसरों को बुखार चढ़ता है और वो पुरानी काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍मों को रंगीन में बदलकर चार पैसा और कमाने के अरमान में कुलबुलाने लगते हैं, ऐसा करके काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍मों में जो उनका एक विशिष्‍ट ‘टाइमलेसनेस’ का एलीमेंट होता है, उसे रंगीन के स्‍थूल व भद्दे में बदलकर, कुछ पैसा भले कमा लेते हों, सिनेमाई तृप्ति कोई कैसे पाता है, यह सवाल मेरे लिए अब तक घनघोर मिस्‍ट्री है.

और वह दूसरा सवाल भी कि आखिरी वह कौन फ़ि‍ल्‍म थी, काली-सफ़ेद, जिसके चपेटे में आपका मन गुनगुनाकर (सुहाना सफ़र है ये मौसम हसीं) बहलता नर्गिस और प्रदीप कुमार के दिल की गिरहों को खोल देने की चुनौतियां देने लगता था, या ‘साहब बीवी और गुलाम’ की छोटी बहू की ‘अजीब दास्‍तां है ये, कहां शुरु कहां खतम’ का तराना छेड़कर फिर किन्‍हीं अंधेरों में गुम हो जाया करता..?

पिछले कुछ अरसों की मेरे ख़याल में घूमकर सबसे पहले नोआ बाउमबाक (उच्‍चारण सही है?) की ‘फ्रांसेस हा’ आती है, और उसके पीछे-पीछे अलेक्‍सैंडर पाइन की ‘नेब्रास्‍का‘. फिर गये साल की पोलिश, ऑस्‍कर नवाज़ी गई, ‘इदा’ का अपने ठहरावी बुनावट में, धीरे-धीरे लोग व सैरों को देखने का, एक ‘रंग नहीं, ये काला-सफ़ेद बोलता है’ जलवा था. और फिर अभी ताज़ा-ताज़ा डिलन टॉमस की सनकों के गिर्द बुनी, एंडी गोदार की ‘सेट फायर टू द स्‍टार्स’ देख रहा था, उतनी महीन नहीं, फिर भी काली-सफ़ेद का संगीन तो है ही..


5/14/2012

अंतरंग अजनबी..

एडोलेसेंस ठुमकता नहीं गुज़रता, छाती में किसी जंगखाये खंजर की तरह गड़ा, अटका रहता है. जॉन दीगन की ऑस्‍ट्रेलियन फ़ि‍ल्‍म ‘द ईयर माई वॉयस ब्रोक’ (’87) इसी उलझे किशोरावस्‍था के भूगोल में घूमती है. धीमे-धीमे गिरह खोलने का कभी सुघड़ भावलोक बुनती है. हाई स्‍कूल निपटाकर अब कॉलेज की ओर निकलने से पहले की एक जश्‍नी सांझ में चंद किशोरों का मन व उनके आसपास का संसार लम्‍बे ट्रैकिंग शॉट्स में संवारती और खंगालती चलती, जॉर्ज लुकाच की सन् तिहत्‍तर की फ़ि‍ल्‍म ‘अमेरिकन ग्रैफिटी’ का पेस तो और धीमा है (गो सिनेमेटि‍कली ज़्यादा सुरीला है) क्‍योंकि यहां कहानी सिर्फ़ एक सांझ, गुज़रती रात की हो रही है, मगर चूंकि यह ऑस्‍ट्रेलिया नहीं अमरीका है, और जॉर्ज लुकाच का है, यहां जंगखाये खंजर के घाव नहीं हैं, ताज़ा-ताज़ा जीवन में उतरे कारों और प्रेम और ‘जाने कौन-सा कैसा तो भविष्‍य’ की अनिश्चिंताओं, तीव्र रोमान की, सुरीली कॉरियोग्राफ़ी है.

कल रात, तीसरी मर्तबा, फिर से ‘मैन ऑन द ट्रेन’ देखकर खुश हो रहा था, कि निर्देशक की अपने माध्‍यम के साथ क्‍या मोहब्‍बत है, इकॉनमी में एक्‍टर के चेहरे (ज़्यां रोशफॉर) से क्‍या-क्‍या भाव निकलवाते रहने की क्‍या माहिरी है. छत्‍तीस फ़ि‍ल्‍मों के लम्‍बे करियर में फ्रांसीसी पैट्रिस लेकों ने कुछ उतनी नहीं बनाई हैं, मगर काफ़ी सारी काफ़ी अच्‍छी फ़ि‍ल्‍में बनाई हैं, थ्रिलर्स के उस्‍ताद लिखवैया जॉर्ज सिमेनॉन की रचना पर आधारित ‘मोश्‍यू हायर’, मन के उलझावों के तारों का संगीत समझती ‘द हेयरड्रेसर्स हस्‍बैंड’, ‘गर्ल ऑन द ब्रिज’, ‘इंटिमेट स्‍ट्रैंजर्स’; या समय और समाज में सत्‍ता का महीन विमर्श बुनती, निहायत सुलझी फ़ि‍ल्‍में ‘सां पियेर की बिधवा’‘रिडिक्‍यूल’.. कहीं से हाथ लहे तो, आखिर की दो तो ज़रुर ही देखें.

2/13/2012

अच्‍छी फ़िल्‍मों को देखने की तक़लीफ़..

फ़ि‍ल्‍म देखना बड़ा मुश्किल काम है. हिंदी, हिंदुस्‍तानी और भारतीय फ़ि‍ल्‍में नहीं, वो तो अभी भी, और जाने कितने ज़मानों तक ‘अच्‍छे‘ के मुहावरों, बुनावटों से बाहर रहेगी; मैं सिनेमा के मार्मिक, सपनीले, अंतरंग छांहदार सुनहले धूपों की ओर इशारा कर रहा हूं, अच्‍छा, भव्‍य और वैभवकारी सिनेमा.. जिसका ‘अच्‍छा’ और ‘उदास’ देखते हुए आप नहाना, चाय पीना भूल जायें, उसकी डेंसिटी कुछ इस तरह आपके मन में घर करके बैठे, उसके सरस सरल एक्‍सेसिबल संवादों की मिठास, उसके किरदारों के एक्‍सप्रेशन, उसका स्‍पेस और उसमें कैमरे की लचक, महीनी का घूमना कि आपकी फिर उससे गुज़रने के बाद किसी से बात करने की त‍बीयत न हो, चहककर फेसबुक के स्‍टेटस में उसे याद करना आपको बेजा, भौंडी और घिनौनी हरकत लगे, तकिये में औंधे गिरे, मुंह गड़ाये चुप्‍प और सन्‍न आप सिर्फ़ यह सोचते फिरें कि कैसे जी लेते हैं लोग ऐसा जीवन कि उससे फिर ऐसा तरल सिनेमा निकलकर बाहर आता है, ज़ाक प्रिवेर जैसी लोग लिखाई कर लेते हैं, सिनेमा के उस शुरुआती दौर तक में ज़्यां गाबें की गुफ़्तगू कर लेते हैं, मैं विद्यासागर जी की संगत में बैठने की फोटु उतरवा लेता हूं, उनके व्‍यक्तित्‍व की महीनी का कुछ भी दिमाग में नहीं बना, बचा रहता, इतनी ज़रा-सी सौजन्‍यता तक नहीं कि फिर कभी उन्‍हें फ़ोन पर नमस्‍ते कहने की सूरत तक में ही उन्‍हें याद किया हो!

जीवन का अच्‍छा हमें इसी तरह सन्‍न करता है, अपने गुज़र चुकने के बाद एक तीखी कचोट और गहरे अवसाद के नशे में लपेट रहने की तरह घेरे रहता है, कि ओह, क्‍या था, और कि दोस्‍त, तब ठीक-ठीक समझ क्‍यों नहीं सके? ठीक-ठीक कभी समझ सकेंगे, कभी भी? इस एक छोटे, जीवन में? फ़ेल्‍लीनी को, क्‍लाउंस, ऑकेस्‍ट्रा रिहर्सल, और नाव चलती रही के संगीत, उसके भव्‍य सिनेमाई उन्‍वानों को? जहां सतह पर कुछ, किसी कहानी के नहीं ‘दीखने’ में भी कितनी सारी कहानियां खुलती होती हैं? एक ज़रा-सी ग़लतफ़हमी की टेक पर हिचकॉक कैसा भव्‍य ग़लत आदमी की दुनिया खड़ी कर लेते हैं, आठ और आधा की सांद्रा मिलो और कबीरियन रातों का फ्रांसुआ पेरियेला विसिता’ की उदास, मोहिनी कस्‍बाई मुर्खताएं? मैक्‍स ऑफुल्‍स सन् पचास में ‘चकरी’ बनाते हैं, जिसके साठ सालों बाद हिंदुस्‍तानी सिनेमा जिस चकरी के ‘च’ तक भी नहीं पहुंचता, साधन तो नहीं, मन के अज़ीज़ अरमानों में कहां कसर रह जाती है? आर्थर मिलर एक नहीं, एक के बाद एक अपने किरदारों से कैसी दिलअज़ीज़ लाइनें बुलवाते रहते हैं, फ़ि‍ल्‍म तक़लीफ़ और सिनेमाई सुख के कैसे नशीले कॉकटेल में आपकी पलकों पर गिरी रहती है, कैसे कोई जॉन ह्युस्‍टन बुढ़ाये गेबल के साथ कोई ‘मिसफिट्स’ बना लेता है? लोग याद करते हैं, ईनामों से नवाजी जाती है जेम्‍स कैमरोन की ‘अवतार’, कहां से उड़ाई गई है उससे बारह वर्षों पहले बनाई  मियाज़ाकी की ‘मोनोनोके’ की कविता और उसका दर्द हमारे संभाले नहीं संभलता, हमें याद रहता है?

अच्‍छी फ़ि‍ल्‍म देखना बड़ा मुश्किल काम है.

आप प्‍लीज़ जाकर जौहर की अगिनपथ देख आईए.

12/14/2011

प्‍यार ही प्‍यार, बेशुमार..

मन में प्‍यार की तरंगें पछाड़ मारती हों तो दिल बड़ी बेदर्दी से टूटता है की बात हमें बिना इम्तियाज़ अली की- ओह, कैसी तो तिलकुट दिलकारी- समझदारी, और संजय 'कली' भंसाली की म्‍यूज़िकल कशीदाकारी के, बड़ी ख़ामोशी से, और सिर नवाये की होशियारी में, बाबू कुल्‍ली भाट समझा गए हैं, फिर भी जो ये फटा दिल है कि अपने चिथड़ों को फड़फड़ाने से, प्‍यार की धूलसनी हवाओं में नहाने से, बाज नहीं ही आता, क्‍यों जा-जाकर सिर धंसाता रहता है? शायद बाबू सिल्वियो सोल्दिनी को चोटों में नहाये, सिनेमा का टिकट खरीदे को दरद-बहलाये रखने में सुख मिलता है? नहीं तो सोचिए अदरवाइस क्‍या वज़ह होगी कि 'ब्रेड और टयुलिप्‍स' की मुस्कियाई खुशगवारी से निकलते ही दर्शक 'दिन और बदलियां', 'और क्‍या चाहूं हूं?' की दुखकारी आंधियों से भला क्‍यों टकराने लगता है? जो हो, सोल्दिनी प्‍यार की बाबत कोई अनोखी जानकारी नहीं दे रहे हैं, बिना कुल्‍ली भाट का इतालवी अनुवाद पढ़े उसकी समझकारी में हमें मुस्‍तैद कर रहे हैं. यूं भी सत्‍तर के मुंह उठाते, आते-आते फासबिंडर ने त्रूफ़ो और गोदार को एक बाजू दरकिनार करके हमें समझा दिया ही था कि रोमर की फ़िल्‍मों के महीन रोमान के चक्‍कर में मत पड़ो, मुझसे समझ लो, कि प्‍यार में सुख नहीं है. दि एंड.

फिर भी भले लोग हैं, प्‍यार के तालाब में गोड़ उतारकर तैरने पहुंच ही जाते हैं, बाज क्‍यों नहीं आते?  माने सोचनेवाली बात है कि प्‍यार के ब्‍लूज़ की पिपिहरी सुदूर नीचे कहीं ब्राजील में नहीं बज रही, रायन गोस्लिंग जैसा उभरता सितारा बीच हॉलीवुड बजा रहा है. बेनिचो देल तोरो की मासूमियत में उलझकर उम्‍मीद का घर मत बनाइये, मार्क रफ्फलो के हास्‍यास्‍पद होने से सबक लीजिए, खुद को ऊपरी चमक और रंगीन झालरकारियों से बचाइए. मैं तो कहता हूं बच्‍चों की आड़ लेकर लोग भावनाओं का खेल करने लगते हैं, कोई सीधे परिवार को बे-आड़ करके सामने लाने का दुस्‍सह साहस क्‍यों नहीं करता? क्‍या परिवार में रहने की तकलीफ़ और उसके भोलेपने का बेमतलबपना समझने के लिए हमें डेनमार्क जाना होगा? हॉलीवुड हमें पारिवारिक प्रेम नहीं समझाता? नहीं, समझाता है देखिए, यहां भी समझा रहा है फिर यहां भी. मगर सबसे अच्‍छा, फिर, अपने बेल्जियम के दारदेन बंधु ही समझाते हैं. उनकी ताज़ा डर्टी पिक्‍चर देखिए, और प्‍यार से बाज आइए. सचमुच. 

9/05/2011

सब धंधा है उर्फ़ नेटवर्क का ज़हर

चेख़व की कहानी पर ''गाढ़ी आंखें'' सी फ़रेबी फ़िल्‍म बनानेवाले, और ''सूरज की आंच में'' की मशहूरी पाये निकिता मिख़ालकोव ने अपने हालिया मैग्‍नम-ऑपस से कुछ वर्षों पहले, 2007 में इन फैक्‍ट, ''12'' नामकी फ़िल्‍म बनाई थी, वही, अपनी सिडनी लुमेट वाली पुरानी का री-मेक, डील-डौल दुरुस्‍त-सी ही फ़िल्‍म है, मगर सिडनी लुमेट और हेनरी फोंडा वाली मार्मिक दादागिरी, कसी नाटकीय बुनावट, के आगे वह कहीं नहीं ठहरती. 1957 में लुमेट के करियर की वह ब्रिलियेंट बिगनिंग थी. 1962 में लुमेट ने एक और मशहूर नाटक, इस मर्तबा यूजीन ओ'नेल के मशहूर- लांग डेज़ जर्नी इनटू नाईट- को फ़िल्‍मबंद किया था. कसे हुए परफॉरमेंस और घने दृश्‍यों की प्‍यारी फ़िल्‍म है (लगे हाथ याद दिलाता चलूं, नेल के चार नाटकों को जोड़कर एक और फ़िल्‍म बनी थी, लुमेट एक्‍सरसाइज़ से बाईस साल पहले, 1940 में जवान जॉन वेन को लेकर जॉन फॉर्ड ने बनाई थी, इन फैक्‍ट वह भी अभी बासी नहीं हुई. लेकिन फोर्ड का क्‍या काम बासी हुआ है? कुछ समय पहले 'द सर्चर्स' देखी थी, नहीं लगा था कहीं भी कुछ फीका हुआ है.).

मगर मैं यहां फोर्ड, नेल, चेख़व और रेजिनाल्‍ड रोज़ की याद पर जमी धूल उठाने नहीं आया. प्रसंग लुमेट की सन् छहत्‍तर में बनी एक अन्‍य फ़िल्म‍ है, टीवी रेटिंग को लेकर चैनल के भीतर के मालिकान की महीन गुंडइयां और मनूवरिंग की होनहारी, बरखाधारी निर्मम खौफ़नाक़ खेल. टेलीविज़न की बरखाओं को देखकर बड़े होने वाले (और अन्‍ना के पीछे वापस टेलीविज़न को विश्‍वसनीयता दिये देने वाले) बहुत सारे शराफ़त के धनी बच्‍चे तब नेटवर्क के ज़माने में पैदा नहीं हुए होंगे. मज़ेदार है कि मगर तभी, खाते-पीते और वियतनाम-अघाये मुल्‍क अमरीका में ही सही, वाजिब तरीके से सामाजिक सरोकारों की ऑलरेडी टीवी ऐसी की तैसी बजाने लगा था. जिसके भीतर कैसी भी सामाजिक हिस्‍सेदारी, आक्रामक होने के सारे स्‍वांगों के बावज़ूद, का मतलब रेटिंग सहेजने की तिलकुट हरकतों से और ज़्यादा कभी भी कुछ नहीं था. यू-ट्यूब पर एक ट्रेलर देखने से पहले पीटर फिंच का पहले यह एक उच्‍छावास देख लीजिए, उसके बाद यहां देखिए, ऊपर बैठे मालिकान किस नज़ाकत, और भाषा में टीवी पर लोकप्रिय हीरो हुए एक बुर्जूग एंकर की कैसी, क्‍या ख़बर लेते हैं. फ़िल्‍म देखने की एक तुरत वाली बेचैनी होती हो तो उसका एक तुरत समाधान यहां है.

9/02/2011

बचपन के मॉर्निंग शोज़ और अन्‍य ब्‍ल्‍यूज़..

अब सोचकर हैरानी होती है, कि कैसा किस तरह की संगठनात्‍मक समझ थी, क्‍या इकॉनमी थी, कि आज से लगभग पैंतालीस साल पहले, उड़ीसा-से पिछड़े राज्‍य के एक टिनहा शहर में एक से एक सारी फ़ि‍ल्‍में पहुंच जाती थीं? रेगुलर रन में न भी हों तो मॉर्निंग शोज़ में जगह बनाई चली ही आती थीं. ग्रेगरी पेक की ‘रोमन हॉलिडे’, ‘मकेनाज़ गोल्ड‍’ से लेकर ‘ज़ुलू’, देवानंद की 'जाली नोट’, ‘काला बाज़ार’, ‘बात एक रात की’, लीन की ‘रायन्‍स डॉटर’, ‘ब्रीफ एनकाउंटर’, शेख मुख़्तार और संजीव कुमार की खूंखार काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍में, बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘प्रेमपत्र’ सारी की सारी तभी देखी थी जब अभी- अंग्रेजी नहीं हिंदी में ही- ग्रेगरी लिखने की तमीज नहीं बनी होगी, और ऑलमोस्‍ट सब फ़ि‍ल्‍में मॉर्निंग शोज़ में ही देखी थीं. ज़्यादातर कोर्णाक टाकीज़ में (कौन पागल था जो ऐसा सिनेमा चला रहा था? पिछले दस वर्षों की जितनी खबर है उसके अनुसार अब वहां सिर्फ़ उड़ि‍या फ़ि‍ल्‍में ही दिखाई जाती हैं!). मगर बचपन के उन भोले, तंगहाल दिनों में भी, बु‍द्धि इतनी खुल गई थी कि आमतौर पर अच्‍छे लगते बिमल रॉय की ‘दो बीघा ज़मीन’ के रोने-धोने से उकताहट होती; उस तरह के जितने रोवनिया, और फलतुआ के हंसोड़, चाइल्‍ड आर्टिस्‍ट थे उन सब रतन कुमारों, सुधीर और सुशील कुमारों को धर-धरके थुरियाने की इच्‍छा होती, कि अबे होनहारी के नालायको, तुम्‍हारी उम्र के बच्‍चे ऐसे होते हैं? (या होते होंगे तभी हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍में ऐसी रोवनिया-बहार, भदर-भदर भावकुंड में नहाई भावना-अंगार बनती हैं?). अपनी बुद्धि में रतन कुमारों, बेबी नाज़ों से तब भी शेख़ मुख़्तार ज़्यादा भला, भोला और निष्‍पाप लगते. कोई बच्‍चा अच्‍छा लगता तो वो ‘कारवां’ और ‘आन मिलो सजना’ का जूनियर महमूद होता. अच्‍छे बालकों की होनहार नालायकीयत की हाय-हाय की बनिस्‍बत उसके हरामीपने सॉलिड और सुहाने लगते.

ख़ैर, मैं फिर बहक गया (वैसे ईश्‍वर जहां कहीं भी हों जूनियर महमूद को सुखी रखे. ईश्‍वर जहां कहीं भी हैं या नहीं मालूम नहीं, मगर जानता हूं जूनियर महमूद इसी शहर में है, मगर कितना सुखी है नहीं जान रहा हूं. इसी शहर में रहते हुए मैं ही कहां सुखी हो पा रहा हूं?).. बात बचपन के मॉर्निंग शोज़ की हो रही थी. अच्‍छे लगते 'हाउस नंबर 44' की कल्‍पना कार्तिक और ‘दो बीघा ज़मीन’ के बाहर के बिमल रॉय की हो रही थी. याद है ‘प्रेमपत्र’ देखते हुए मैं बहुत भावुक हुआ था. तलत महमूद की आवाज़ में गाते हुए शशी कपूर और अच्‍छी साधना के बीच की ग़लतफ़हमी कितनी जल्‍दी खत्‍म हो (कि ओ भगवान, नहीं ही होगी?) के तनाव में बगल की सीट पर बैठे अपने दोस्‍त को किसी भी क्षण तीन थप्‍पड़ मार सकता था (या बाहर, साईकिल स्‍टैंड में जाकर बारह साइकिलों के ट्यूब की हवा खोल दे सकता था, ओ गॉड!). ओह, जीवन में कहीं नहीं था, मगर प्रेम की मिसअंडरस्‍टैंडिंग की भीनी अनुभूतियों के कैसे सुहाने दिन थे! तलत महमूद गाता शशी कपूर ही नहीं, एक और लव इंटरेस्‍ट प्‍ले कर रहा (बाद के दिनों में विलेन का टुटपुंजिया दाहिना हाथ) सुधीर भी अच्‍छा लगता.

समझदार लोगों ने ही नहीं, मैंने खुद तक, खुद से दर्जनों मर्तबा कहा है पीछे छूटी चीज़ों को पीछे मुड़कर मत पकड़ों, हाथ का करंट ही नहीं लगता, दिल पर भी बहुत ठेस पहुंचती है, मगर देखिए, हाथ हैं कि पीछे छूटकर बीच-बीच में कुछ टटोल आने से बाज नहीं आते. सदियों पहले अर्नस्‍ट लुबिश की कुछ फ़ि‍ल्‍में देखी थीं, फिर से टटोलता ‘द शॉप अराउंड द कॉर्नर’ और ‘टू बी ऑर नॉट टू बी’ में घुसा और उनकी सरल कसावट से लाजवाज हो गया. चालीस के दशक की फ़ि‍ल्‍में और अभी तक एकदम, ज़रा भी बासी नहीं हुई हैं. मगर वह सिर्फ़ लुबिश और अच्‍छे हॉलीवुड का मामला नहीं है, तिरालीस की बनी इटली के विस्‍कोंती की ‘ओस्‍सेसियोने’ देखिए, वह इतने वर्षों के फ़ासले पर अभी भी एकदम आधुनिक लगती है, या सत्‍तावन की ‘द व्‍हाइट नाइट्स’, कहीं से भी ‘डेट’ नहीं हुई. बचपन की देखी हिंदी की ‘गंगा जमुना’ थी (निर्देशक: नितिन बोस. शायद एक के बाद एक उसे तीन मर्तबा तो ज़रूर ही देखा होगा, अभी कुछ दिनों पहले फिर देखा तो मन के ट्यूब की सारी हवा निकल गई, बड़ा खाली-खाली-सा लगा कि दिलीप कुमार ही नहीं, वैजयंती माला, कन्‍हैया लाल तक अच्‍छे लगते हैं, डायलाग कसे लिखे गए हैं, मगर सब अंतत: शुद्ध किस्‍सागोई ही है, उससे ज्यादा की आकांक्षा फिल्‍म कहीं करता नहीं दिखता, और ढाई घंटे की फ़ि‍ल्‍म में शुद्ध सिनेमाई आनंद कहें तो आठ मिनट से ज्यादा आपको नहीं मिलता! मुझे नहीं ही मिला. वैसे ही बिमल राय की सन् साठ में बनी एक फ़ि‍ल्‍म है, ‘परख’. संगीत के साथ कहानी भी सलिल चौधुरी की है, मोतीलाल और अच्‍छी साधना है, (गाने सब प्‍यारे हैं. ग्रेट सलिल चौधुरी.) मगर एक बेसिक-सी कहानी कहने से अलग फ़ि‍ल्‍म और कुछ करती नज़र नहीं आती. एक गाने के पिक्‍चराइज़ेशन से अलग दस दिन पहले की देखी फिल्‍म का अब मैं अलग से कुछ भी और याद नहीं रखना चाहता.

इक ज़रा-सी पिद्दी किस्‍सागोई तक ही जाकर कहां, क्‍यों अटक जाती हैं हमारी हिन्‍दी फ़ि‍ल्‍में? या हमारी हिन्‍दी का साहित्‍य ही? ऐसा बाहर के संसारों में ही होता है, क्‍यों होता है, कि पॉपुलर फ़ि‍ल्‍म बनानेवाले भी ‘जुलिया’ और ‘द फिक्‍सर’ जैसी पेचीदा, रिस्‍की स्‍टोरीटेलिंग में न केवल उतरें, उसे करीने से निबाह भी जायें? ‘हाई नून’ सा कसा वेस्‍टर्न बनानेवाला फ़ि‍ल्‍ममेकर ही ‘ए मैन फॉर ऑल सीजंस’ जैसी मुश्किल घड़ी में जीवन कैसे जियें की विमर्शवादी फ़ि‍ल्‍म भी किस सरस नफ़ासत से बनाये लिये जाता है? या ‘ग्रां-प्री’ और ‘द ट्रेन’ जैसी एक्‍शन फ़ि‍ल्‍मों का निर्देशकफिक्‍सर’ जैसी दार्शनिक स्‍टोरीटेलिंग में घुसने का रिस्‍क उठाता है! एलेन बेट्सज़ोरबा द ग्रीक’ का मानवीय उच्‍छावास ही नहीं, ‘वीमेन इन लव’, ‘एन अनमैरिड वुमन’ के साथ ‘द फिक्‍सर’ जैसी टेढ़ी, भारी फ़ि‍ल्‍म में अभिनय करने का ज़ोखिम उठाता है?

पूरा जीवन सिनेमाटॉग्राफी में खपाने, ‘मेफिस्‍टो’, ‘आंगी वेरा’ जैसी अनूठी से लेकर ‘मलेना’ सी चिरकुटई शूट कर चुकने के बाद, अपने लंबे करियर के दूसरे छोर पर आकर, लाजोस कोलताई- एक सिनेमाटॉग्राफ़र- अपनी पहली फ़ि‍ल्म‍ का निर्देशन अपने हाथ में लेता है तो वह ‘ज़ि‍न्‍दगी ना मिलेगी दोबारा’ का रोमानी कोलतार सजाने की जगह होलोकास्‍ट और ऑश्वित्‍ज़ के मुश्किल बीहड़ में न केवल उतरा जाता है, उसे बिना ˆलाइफ़ इज़ ब्‍यूटिफुल’ का भदेस बनाये खूबसूरत, सघन मार्मिक सिनेमाई पाठ भी बनाये लिये जाता है? एकदम उम्‍दा कास्टिंग, एन्नियो मोरिकोने का प्‍यारा बैकग्राउंड स्‍कोर, और उन्‍नीस सौ पचहत्‍तर में लिखे अपने पहले उपन्‍यास 'फेटलेसनेस' पर खुद इमरे कर्तेज़ की लिखी खूबसूरत स्क्रिप्‍ट (हिंदी में किताब का अनुवाद वाणी ने छापा है, किसी ने पढ़ रखा हो तो बताये कैसा अनुवाद है).

कैसे बना लेते हैं लोग मुश्किल सिनेमा, जुलिया के जेसन रोबार्ड्स जैसी बिना बहुत देह हिलाये अनोठी एक्टिंग कर ले जाते हैं, जबकि हमारे यहां हम फकत एक गाने का पिक्‍चराइज़ेशन तक करके रह जाते हैं?

5/09/2011

धूप में ठांह खोजते, आंखें मूंदे देखते..





गरमी में पैरों पर जलती रेत गिरा रहे हैं. फ़िल्‍में देखकर फिर नई तक़लीफ़ें बढ़ा रहे हैं. कुछ दीख गईं, कुछ अभी भी देखी जानी हैं. रेंगनी पर कपड़े फैलाता हूं, नाम, गिनाता हूं: थाईलैण्‍ड की 'अंकल बूनमी हू कैन रिकॉल हिज़ पास्‍ट लाइव्‍स', कनैडियन 'मैप ऑफ़ द ह्यूमन हार्ट', 'द नैसेसिटीज़ ऑफ़ लाइफ़', इरानी 'फायरवर्क्‍स वेड्नसडे', जॉन ह्यूस्‍टन की 'द लाइफ़ एंड टाईम ऑफ़ जज रॉय बीन', पाओलो वित्‍ज़ी की इटालियन 'द फर्स्‍ट ब्‍युटिफुल थिंग'. सन् अड़तालीस में बनी चीन की 'छोटे शहर में बसंत', कुछ डॉक्‍यूमेंट्रीज़ हैं: 'द बॉटनी ऑफ़ डेज़ायर', 'हेलवेटिका' मोनोलॉगर स्‍पाल्डिंग ग्रे के जीवन पर सोदरबर्ग की 'एंड एवरीथिंग इज़ गोइंग फाईन'. ,

1/02/2011

मैंने नहीं किया, शायद जीवन ने किया हो..

बारह साल के जेरोम के सर का भारी घड़ा हर समय शर्म से भरा रहता है कि पड़ोस के अन्‍य घरों की तरह उसका घर 'नॉर्मल' क्‍यों नहीं. घर के अहाते में तमाशा बने बाप के आगे जेरोम गिड़गिड़ाता है कि पप्‍पा, प्‍लीज़, पड़ोस के सबलोग हमें पागल समझते है? बाप बच्‍च्‍ो को आश्‍वस्‍त करता है कि सही समझते हैं, वी आर ए क्रेजी फ़ैमिली! मैं जिस तरह खुशी में घबराकर सिगरेट जला लेता हूं, जेरोम का हूनरमंद छोटा भाई लेओं गले में फंदा लगा लेने का टाईमपास करता है, स्‍क्रू ड्राइवर से खिड़की तोड़कर छुट्टी पर बाहर गए पड़ोसियों के घर 'डाका' डालता है, माथे पर दुख ज़्यादा चढ़ने लगे (या असमंजस. दोनों एक ही नहीं?) तो घबराकर छुरी से कंधा चीर लेता है, या बीस मीटर ऊंचाई से लहराकर नीचे कूद जाता है. यह सारी फुलकारियां कैनेडियन फ्रेंच फ़िल्‍म 'कसम खाकर कहता हूं, मैंने नहीं किया' की फूल-पत्तियां हैं. जेरोम की दस वर्षीय दु:खहारी पगलाहटों की संगत में मॉंट्रियल की हरियाली में हरा होते हुए मन बाग़-बाग़ हो जाता है. पता नहीं कुछ खुराफाती कैसे होता है कि उदासियों का ऐसा मीठा सिनेमा रच लेते हैं. जबकि फिलीप फलादेउ उम्र में मुझसे सात वर्ष छोटा है और कुछ दिनों पहले मैंने उसकी एक और फ़िल्‍म देखी थी, 'फ्रिज़ का बायां किनारा', दु:खभूगोल के उल्‍टे-सीधे मनचीरकारी उसमें भी थे, पर ऐसा मार्मिक उत्‍पात कहां था? आंद्रे तरपिन की ऐसी सिनेकारी कहां थी, कि पैट्रिक वॉटसन का, बांस के जंगलों में दीवारों के बीच दबी, फंसी, ऐंठी बजती हवा की मनतोड़ संगीत की संगत नहीं थी, इसलिए?

मैं बहकता जाऊंगा इसलिए बेहतर है पहले आप उस बहन में गिरकर बहक जाने की जगह पैट्रिक के एक ट्रैक में मन का सुर सेट कर लें. साथ ही 'कसम' का ट्रेलर देख लें (हालांकि ट्रेलर फ़िल्‍म की खूबसूरती का रत्‍ती भर कंपेनसेशन नहीं)..

क्‍या है कैनडा में, कहां से उस शांत लगभग निर्विकार लैंडस्‍कैप में मनहारे के इंटेंस पहाड़ फूटते रहते हैं? ऑलिवियेर असाये का 'क्लीन' और 'समर अवर्स' और डेनी आरकां की (जीसस ऑफ़ मांट्रियल, द बारबेरियन इनवेज़ंस) जैसी अनोखी, विरल सिनेनिबंध फूटते रहते हैं? असाये ने पिछले साल टेलीविज़न के लिए साढ़े पांच घंटे की 'कारलोस' तैयार की (प्रमोद सिंह ने देख ली, और बुरी नहीं है)..

कृपया कुछ और फ़ि‍ल्‍मों पर नज़र रखें (क्‍योंकि कैनेडियन फ़ि‍ल्‍ममेकर हमसे भले मनवाना चाहें दु:ख पर उनकी बपौती नहीं. मन में लेओं का स्‍क्रूड्राइवर चलाने को पड़ोस का अमरीका भी बीच-बीच में वैसा ही हहियाता रहता है. नोट करें 'द किड्स आर ऑल राइट', केविन स्‍पेसी की 'श्रिंक', 'लाइफ ड्यूरिंग वॉरटाइम'. फिर ऑस्‍ट्रेलिया भी पीछे नहीं छूट रहा, उसके शो-केस में है 'एनीमल किंगडम',, एनीमेटेड 'मैरी एंड मैक्‍स' और 'लैंटाना'. पिछले दिनों सुना युक्राइना भी अपनी आमद बताने पिछले वर्ष कान अपनी एक फिल्‍म 'माई जॉयज़' के साथ पहुंचा हुआ था (नाम से धोखे़ में न जायें, हालांकि फ़ि‍ल्‍म अभी मैंने देखी नहीं है).

जय हो सदाबहार संसार. चलते-चलते पैट्रिक का एक और यह ट्रैक भी सुनते चलिए..

बकिया आप सभी को नया साल मुबारक हो..

5/03/2010

कुछ कुछ होता है.. ज़्यादा गरमी ही होती है..







पता नहीं ऐसी गरमी में लोग पहाड़ कैसे चले जा रहे हैं. जबकि मैं इन पहाड़ सदृश दिनों को अधिक से अधिक फ़ि‍ल्‍मों के पुल से पारने की कोशिश कर रहा हूं. मगर परा कहां रहे है? 'गोन विद द विंड' में तो पहाड़ का एक दृश्‍य भी नहीं है, अलबत्‍ता आग के बहुत सारे हैं, ताज्‍जुब की बात नहीं क्‍यों मैं पसीना नहाया इस तरह सिहर रहा हूं.. ज़्यां कोक्‍तू के व्‍यक्तित्‍व की महीनी उनके वेबसाइट और वीकी पर भी आपके नज़र आयेगी, लेकिन फ़ि‍ल्‍म जो मेरे नज़रों से गुज़री, 'द ब्‍यूटी एंड द बीस्‍ट', वह आंखों को चैन पहुंचानेवाली कहां हो सकती थी? हो सकता है मेरे सारे चयन ही ग़लत रहे हों, सुख की कहानी कहनेवाली तो सिनेमा के सुख में सराबोर मैक्‍स ओफुल्‍स की फ़ि‍ल्‍में, 'द प्‍लेज़र' और 'लोला मोंतेस' भी नहीं थीं. पैसों के पीछे भागनेवाली नई जीवनशैली के नरक पर करुण हो रही चीन की 'लक्‍ज़री कार' और क्रोशियन लेस्बियन तक़लीफ़ कथा, 'फाईन डेड गर्ल्‍स' तो नहीं ही हो सकती थीं.

सचमुच, इस गरमी से निदान नहीं है. मतलब जब तक जीवन का सिनेमा है, कैसे और क्‍यूंकर हो सकेगा?

4/21/2010

हूं, देख ली, निकल लिये..


हाल के दिनों की देखी कुछ फ़ि‍ल्‍में.
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इतालवी: अंग्रेजी में 'लाइक शेडोज़', फ्रेंच: 'ल वियों रोज़', इतालवी: 'इल पार्तिजानो जॉन्‍नी', चीनी मुख्‍यधारा की (अंग्रेजी में) 'वन फुट ऑफ़ द ग्राउंड', फ्रेंच, जुने की 'मिकमाक्‍स', जापानी: 'लव एंड पार्क होटेल'..





3/12/2010

रोड मूवी एंड एटसेट्रा..

थोड़ा अर्सा हुआ अलेक्‍सेई बालबानोव की एक फ़ि‍ल्‍म देखी थी, अंग्रेजी में रिलीज़ का नाम था- 'ऑफ़ फ्रीक्‍स एंड मेन', 1998 की बनी सीपिया रंगों की एक बड़ी ही अजीब दुनिया थी, पहचानी रुसी फ़ि‍ल्‍मों के अनुभवों से एकदम जुदा. फिर हुआ कि बालबानोव की एक और फ़ि‍ल्‍म हाथ चढ़ी, यह ज़रा और पहले '91 की बनी थी, काली-सफ़ेद, अंग्रेजी में 'हैप्‍पी पीपुल', देखकर फिर सन्‍न हो रहा था कि सिनेमा का यह कैसा मुहावरा, ठेठ रुसी तर्जुमा, जो अभी तक नेट पर की हमारी घुमाइयों के नक़्शे से ओझल बना रहा, (ऐसी अभी कितनी फ़ि‍ल्‍में और फि‍ल्‍ममेकर होंगे..) नेट पर खोज-बीज करते नज़र गई कि बालबानोव ने काफ़ी फ़ि‍ल्‍में बनाई हैं, और अपनी तरह से लोकप्रियता भी हासिल की है..

कुछ ऐसे ही संयोग में एक और रुसी फ़ि‍ल्‍म हाथ आई, एलेम क्लिमोव की 1965 की बनी 'एडवेंचर्स ऑफ़ ए डेंटिस्‍ट', बहुत कुछ ज़ाक ताती और आस्‍सेलियानी की दुनिया के गिर्द घूमती- मुलायम, महीन, सिनेमैटिक. (2003 में क्लिमोव की मृत्‍यु हुई, यह उनके साथ इंटरव्‍यू का एक लिंक है). उनकी फ़ि‍ल्‍में कहीं से हाथ लगें, तो ज़रुर देखें..

इसी तरह की भटकन में दो डॉक्‍यूमेंट्री पर भी नज़र गई, एक इंटरनेट से लहे होने का अमरीकी किस्‍सा, 'गूगल मी', तो दूसरी एक्‍स्‍टेसी ड्रम से लसने की इज़रायली कहानी, 'अटैक ऑफ़ द हैप्‍पी पीपुल'. बाकी फिर दो दिन पहले हमने भी 'रोड मूवी' देखी थी, मानकर चलते हुए कि रोड और मूवी के बीच का कौमा देव बेनेगल की फकत अदा है, अंतत: वह राजस्‍थानी लैंडस्‍केप की भटकनों की सिनेमाई, एक्‍ज़ॉटिक पैकेजिंग होगी, चूंकि फिरंगी कंस्‍पशन के लिए तैयार की गई होगी, यहां के कुछ दर्शकों के लिए काम करेगी, कभी नहीं भी करेगी. जैसे अभय के लिए मुंह के बल गिरी, मेरे लिए नहीं गिर रही थी, मिशेल आमाथियु के कैमरा और माइकल ब्रुक के बैकग्राउंड स्‍कोर में रमे हुए बीच-बीच में मैं भूल जा रहा था कि फ़ि‍ल्‍म सचमुच क्‍यों और कितनी बेमतलब है.

3/03/2010

हालिया कुछ दिखी फ़ि‍ल्‍में..

un uomo in ginocchio इसी को कहते होंगे डेस्टिनी, चीज़ों को कहां-कहां पहुंचाती है. या नहीं पहुंचाती. कि उदासियों के करीने से सजाये कंपोशिज़ंस और छोटे शहर के लंबे जारमुशी ट्रैक शॉट्स ‘लेक ताहो’ को बर्लिन पहुंचाते हैं, मगर अदरवाइस मैक्सिको के बाहर की बहुत यात्रायें नहीं करवाते. उसकी जगह सिंगापुर की तमिलभाषी, अपेक्षाकृत स्‍थूल, ‘माई मैजिक’ के दुश्‍कर जीवन की नाटकीयता सीधे कान के कंपिटिशन में जगह बनाती है. एक दूसरी, पुरानी फ़ि‍ल्‍म, जो यूं ही अनजाने हत्‍थे चढ़ी और देखते हुए मन अघाया वह थी, सन्र ’78 की बनी इटली के दमियानो दमियानी की ‘घुटने पर आदमी’. मैं दमियानो की दुनिया से बहुत वाकि‍फ नहीं तो मेरे लिए फ़ि‍ल्‍म कुछ आंख खोलनेवाली थी. एक आम आदमी के नज़रिये से पलेर्मो के माफिया-जाल-जंजाल की धीमे-धीमे वहशतनाक परत खोलती, लेकिन कोई-सा भी ऑवियस ड्रामा नहीं, कपोला का रोमांस, या ब्रायन द'पाल्‍मा का ‘स्‍कारफेस’ या ‘द अनटचेबल्‍स’ की प्रकट हिंसा नहीं, बस धीमे-धीमे गरम शीशा चूता रहता है और स्‍थान, समाज-विशेष में आदमी की नियति का एक सघन निबंध बुनता चलता है. आदमी की नियति से देखे हुए एक हालिया अमरीकी फ़ि‍ल्‍म की भी याद. फ़ि‍ल्‍म है ‘अप इन द एयर’, सुआव और अटरली सिनि‍कल क्‍लूनी, मंदी के दौर में कंपनियों के मालिकों वाला काम कर रहे हैं, मतलब शहर-शहर घूम-घूमकर लोगों को ‘फायर’ कर रहे हैं, चेहरे पर शराफ़त की हंसी चढ़ाये, निस्‍संगता के बर्बरगीत की एक नयी पैकेजिंग किये, समझदारी से लिखी, कही फ़ि‍ल्‍म किसी भी तरह की अतिशयता से बचती है और फ़ि‍ल्‍म के आखिर क्रेडिट रोल्‍स में देखकर अच्‍छा लगता है कि 52 वर्षीय काम से बहरियाये केविन रेनिक ने दरअसल टाइटल गाने की लिखाई और धुन की बनाई की है. हाल की दो और फ़ि‍ल्‍मे जो हौले-हौले खुलती किताब बनती रहीं, वह थीं सॉलिडली गठी हुई आर्जेंटिनियन थ्रिलर ‘द सिक्रेट इन देयर आईस’ और कुछ लगभग उसी अनुपात में, उतनी ही अनगढ़, मगर अपने ठहराव में बांधनेवाली, स्‍वीडन की ‘फाल्‍कनबर्ग फेयरवेल’.

11/13/2009

तीन फ़ि‍ल्‍में..

डॉक्‍यूमेंट्री थी, फ़ि‍ल्‍म देखे कुछ दिन हो गए लेकिन अवचेतन में अभी भी जैसे कहीं अटकी हुई है. कुछ ख़ास फ़ि‍ल्‍मों के साथ क्‍या होता है ऐसा कि एक अच्‍छी बितायी शाम की तरह स्‍मृति और संवेदना में कहीं कुछ छूटा रह जाता है? पियेर बोर्दू, पहले कभी नाम सुना नहीं था, इतना लिखा है उसमें का कुछ भी पढ़ा तो नहीं ही था, फ़ि‍ल्‍म देखते हुए ही ख़बर हुई कि 2001 की डॉक्‍यूमेंटेड कृति के एक वर्ष के अंतराल में ही बोर्दू साहब दिवंगत हुए. कभी मौका लगा तो लौटकर फिर कभी इस फ़ि‍ल्‍म को याद करेंगे, फिलहाल टौरेंट का एक लिंक उन ब्रॉडबैंड बरतनेवाले बंधुओं के लिए चिपका दे रहे हैं जो उत्‍साह में बोर्दू के जीवन व वैचारिक उठापटक के कुछ मौके देखने के मोह में अगर डाऊनलोड करना चाहें. एक दूसरी फ़ि‍ल्‍म सुख के बारे में है: आन्‍येस वार्दा की पुरानी 1965 की, कैसे चटख रंगों के चकमक रोमान में शुरु होती है, लेकिन नाटकीय अंत जैसे कहीं फ़ि‍ल्‍म को बेमज़ा, बेस्‍वाद छोड़ जाती है. फिर एक निहायत हल्‍के थ्रिलर-धागे में गुंथी, लेकिन दूसरी मज़ेदारियों में खूबसूरती से सजी कोरियन फ़ि‍ल्‍म देखी. अपने देश में भी बन सकती थी, लेकिन नहीं बनेगी, उसी तरह जैसे हमारे समय की परतों को धीमे-धीमे बेपरत करता हिंदी में एक अच्‍छा उपन्‍यास हो सकता था, लेकिन नहीं होगा..

8/03/2009

अप..



महाराज, आइए, आराम से नीचे आइये.. या फिर ऐसा है मुझी को ऊपर कहीं नीले में उड़वाइये.. अब जो करना है, जल्‍दी बताइये.. मैं बस राह तक रहा हूं (आप लव आज तक का तक रहे होंगे, मैं बुड्ढे को ही निरख रहा हूं, पिक्‍सार की नयी एनीमेशन है.. हालांकि पोस्‍टर के बाद अभी असल चीज़ निरखना बाकी है)..

रात को तीन निर्देशकों की मिलकर बनायी 'टोकियो' देख रहा था, चखने को वह शराब भी बुरी नहीं. तीन कहानियों में एक अपने जून हो बॉंग की है.

7/14/2009

अंतर्लोक के झमेलों की कैसी तो फ़ि‍ल्‍में.. कैसे फ़ि‍ल्‍मकार..

झमेलाबझे (डिसफंक्‍शनल) परिवारों के दु:ख.. कैसे-कैसे दु:ख.. देखने लगो तो फिर क्‍या-क्‍या दिखने लगता है, कहां-कहां नहीं दिखता! घटक की 'मेघे ढाका तारा' याद है? परिवारों के भीतर 'मुग़ले-आज़म' होता है न 'हम आपके हैं कौन', ज़्यादा कहानियां 'लिटिल मिस सनशाइन', 'फमिल्‍या रोदांते' और लुक्रेचिया मारतेल की 'द स्‍वांप', 'हेडलेस वूमन' के दायरों में घूमती हैं, लेकिन अंदर के टंटे जब और भी भयकारी हों तब? फिर क्‍या करे आदमी? और जब आदमी आदमी न हुआ हो बच्‍चा हो? जैसे 'द आर्ट ऑफ क्राइंग' का ऐलेन? झमझम बरसाती दोपहर में फ़ि‍ल्‍म देखी देखकर ऐलेन का अंतर्लोक समझने की कोशिश कर रहा हूं.

फिर ऐलेन से ज्यादा मर्मांतककारी तक़लीफ़ है ऐन की, इज़ाबेल कोइक्‍सेत का नाम नहीं सुना था, पहली फ़ि‍ल्‍म देखी, देखकर काम से दंग हूं..

या एंजेला शानेलेक की फ़ि‍ल्‍म 'नाखमिताग' देख रहा था फॉर्म में इस तरह की ट्रांसपरेंसी, ऐसी सधाई कोई कैसे हासिल करता है सोच-सोचकर उलझन हो रही है. हालांकि पिछले दिनों वॉंग जून-हो, लुकास मूदीस्‍सॉन, इज़ाबेल, एंजेला जैसे सलीमाकार अचक्‍के हाथ चढ़े इससे गदगद भी हूं..

7/02/2009

फ़ि‍ल्‍मी भटकानी: नई पुरानी



लीना वर्टमुलर की इटैलियन ‘सेवेन व्‍यूटिज़’, अर्जेंटिनी लुचिया प्‍योंजो की ‘XXY’, जोकिम त्रायर की लेखकीय जीवन के सजीले भविष्‍य व दोस्तियों की महीन छानबीन करती नोर्वेजियन 'रिप्राइस', यान कादर की प्‍यारी काली-सफ़ेद चेक फ़ि‍ल्‍म 'बड़ी सड़क की दूकान', वित्‍तोरियो दि सिका की एकदम शुरुआती 1944 की 'बच्‍चे हमें देख रहे हैं', लुई बुनुएल के मैक्सिकन दौर की आखिरी 'द एक्‍सटर्मिनेटिंग एंजल', जापानी घटक(?)मिकियो नारुसे की 'बेटी, बीवियां और एक मां'. फिर सदाबहार मेरे पुराने पसंदीदा जॉन फ्रांकेनहाइमर की चमकदार काली-सफ़ेद बर्ट लैंकास्‍टर स्‍टारर फ्रेंच पार्टिज़न लड़ाई के दिनों की कहानी 'द ट्रेन', इलीया कज़ान की मारलन ब्रांडो, एंथनी क्‍वीन स्‍टारर रोमेंटिक रेवोल्‍यूशनरी स्‍टाइनबेक लिखित स्क्रिप्‍ट 'विवा ज़पाता!.