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12/06/2011

देव साहब और देवानंद

इस क़यास के अब क्‍या मायने कि ज़ीनत और ज़ाहिदा की नज़रों से खुद को देखने से अलग, देव साहब ने रोस्‍सेलिनी और दी सिका की फ़ि‍ल्‍में कभी देखी थी या नहीं. करीयर की शुरुआत के साथी गुरुदत्‍त के काम को ही कितना, किन नज़रों से देखते रहे थे, और ‘गाइड’ के सेट पर वहीदा से कभी कैज़ुअली पूछा था या नहीं कि “वहीदा, माई स्‍वीटहार्ट, मगर क्‍या ज़रुरत थी गुरु को ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्‍या है’ जैसे नेगेटिव लिरिक्‍स रफ़ी साब से गवाने की? 'लाख मना ले दुनिया, साथ न ये छूटेगा' नहीं गवा सकते थे? द वर्ल्‍ड नीड्स पॉज़ि‍टिव एनर्जी, यू सी?” हो सकता है न पूछा हो. हो सकता है ‘वहीदा, माई स्‍वीटहार्ट’ कहने के बाद उदयपुर के महाराजा की भलमनसी और लंदन की सुरमई सांझों की याद में जाम पीते रहे हों, गुरुदत्‍त का एक मर्तबे ज़ि‍क्र तक न किया हो. हो सकता है देव साहब ने ‘क़ागज़ के फूल’ देखी भी न हो.

कौन थे देव साहब? क्‍या राजू गाइड उन्‍हें जानता था? छोटा भाई विजय आनंद तो उन देव साहब को नहीं ही जानता था जो टैड दानियेलेव्‍स्‍की और पर्ल बक के साथ नारायण की किताब ‘गाइड’ की एक अमरीकी खिचड़ी तैयार करने के बाद उसके एक हिंदुस्‍तानी ऑमलेट की तैयारी में (मदद के नाम पर) गोल्‍डी को ‘उलझाना’ चाह रहे थे. बाद में ‘गाइड’ का हिंदी वर्ज़न बना तो टैड और बक के पीछे-पीछे शामिल बाजा, सैंडविच होने के बिना, और विजय आनंद की अपनी शर्तों पर बना, क्‍योंकि देव साहब के रास्‍तों पर सिर्फ़ देव साहब ही चल सकते थे, वह बंशी और किसी से न बज सकती. वह फ़ि‍ल्‍म तो कतई न बन सकती जो कोई विजय आनंद बनाना चाहता. सन् सत्‍तर में ‘प्रेम पुजारी’ से शुरु करके सन् ग्‍यारह के ‘चार्जशीट’ तक के चालीस वर्षों में लगभग बीस फ़ि‍ल्‍मों का निर्देशकीय सफ़र निपटा चुके देव साहब का उत्‍साह बेमिसाल और लाजवाब है, मगर उस यात्रा के पीछे के व्‍यक्ति को समझना टेढ़ी खीर है, सबके बस की बात नहीं. शायद गोल्‍डी आनंद के बस की भी न रही हो. संभव है ‘स्‍वामी दादा’ और ‘अव्‍वल नंबर’ के आस-पास कभी हाथ जोड़ कर गोल्‍डी तक ने माफ़ी मांग ली हो कि “अब मैं आपकी फ़ि‍ल्‍में नहीं देख सकता, सॉरी,” और उन्‍नीस सेकेंड के गंभीरतम पॉज़ के बाद इतना और जोड़ा हो, “और हां, देव साहब, बुढ़ापे में अब जाकर यह बात समझ आई, कि मैं आपको कभी जान नहीं सका, हू आर यू?

यह अंतिम पंक्ति गोल्‍डी आनंद ने नहीं कही थी, मेरी कल्‍पना मुझसे कहलवा रही है. क्‍योंकि ‘गैंगस्‍टर’, ‘मैं सोलह बरस की’, ‘सेंसर’, ‘लव एट टाईम्‍स स्‍क्‍वॉयर’, ‘मिस्‍टर प्राइम मिनिस्‍टर’ (और देव साहब का बस चलता तो लंदन और न्‍यूयॉर्क से जाने अभी क्‍या-क्‍या शूट करते होते, इंटरनेट के दौर में वह अनंतकाल तक हमारी आंखों के आगे उतरता, तैरता रहता) के बाद सवाल रह ही जाता है कि कौन थे देव साहब? राजू गाइड तो उन्‍हें नहीं ही जानता था, गोल्‍डी आनंद भी नहीं जानते थे, फिर किशोर साहू, सचिन दा, ज़ाहिदा, ज़ीनी बेबी कौन जानता था उन्‍हें? पत्‍नी कल्‍पना कार्तिक जानती थी? पुत्र सुनैल आनंद? ग्रैगरी पेक, सुरैया, एनीवन, एनीबडी? वॉज़ देव साहब रियल? आई मीन रियली, रियल?

हमारे घर में देव साहब को कोई नहीं जानता था. जबकि देवानंद की बात एकदम अलग थी. चचेरी, ममेरी, फुफेरी बहनें ही नहीं, उनकी मम्मियां, मामा, हमारे स्‍कूल के पीटी टीचर से लेकर होम साइंस की आंटी और हमारे साइकिलों का पंचर पीटनेवाला नंदू, सब नाक-भौं बनाने की घटिया एक्टिंग (देवानंद की ही तरह) कितनी भी क्‍यों न करते रहे हों, मन ही मन सब देवानंद को पसन्‍द करते थे. रस्‍सी पर सूखने के लिए साड़ी डालते हुए कोई भी मौसी गाने लगती ‘दिल पुकारे, आ रे आरे आरे?’ आंखों में प्रेम के डोरे लहराती मौसी का देवानंद को पुकारना मौसों, चाचाओं और उनके भैयों को उलझन व तनाव में नहीं लपेटता था. सब जानते होते देवानंद को गुहारने में एक निर्दोष हंसी की निर्दोष कामना होती, कोई 'संसारी' स्‍वार्थ न होता, ‘फूल और पत्‍थर’ के धर्मेंदर की दैहिक ताप और ‘दिल एक मंदिर’ के राजिंदर कुमार की आंसू-बहावक भाप न होती. ‘अरे यार मेरे तुम भी हो ग़ज़ब’ और ‘शोखियों में घोला जाये थोड़ा-सा शबाब’ गाते हुए, गाल में हल्‍की दरार दिखाकर देवानंद ज़रा-सा हंस देते, मौसियों का मलिन फ़ीकापन, दिन, संवर जाता, ऐसे मीठे और इतनी ज़रा-सी ही तो उम्‍मीद थे देवानंद. मेले में मां की गोद के बच्‍चे को दीखे दूसरे बच्‍चे के हाथों लाल गुब्‍बारे की तरह. उसके बियॉंड सब जानते पैरों पर लंबे हाथ गिराये, ज़रा-सा कंधा उचकाये, उतरती ढलान पर ‘आज की सारी रात जायेगी, तुमको भी कैसे नींद आयेगी’ गुनगुनाते देवानंद एक छोर से भागते दूसरे छोर निकल जायेंगे, ‘खोया-खोया चांद’ और ‘खुले आसमानों’ का मोहक ख़्याल बचा रहेगा, गाने और देवानंद की चमकती, निर्दोष बहक गुज़र जाने की खाली जगह में उसके बाद कोई वास्‍तविक प्रेम और उसके निटी-ग्रिटी सोर्ट आउट करता वास्‍तव का प्रेमी- ‘आवारा’ का राज कपूर, या ‘देवदास’ का दिलीप कुमार-सा ही सही- नहीं होगा.

शायद इसीलिए सब, और अवचेतन में बहुधा बिना-जाने- और राज कपूर और दिलीप कुमार की बनिस्‍बत कहीं ज़्यादा- देवानंद को प्‍यार करते थे. क्‍योंकि देवानंद के होने में एक साफ़-सुथरी हंसी के आश्‍वासन से अलग समय और समाज की पेचिदगियों की कोई मांग न होती. समय और समाज में ‘जीने की तमन्‍ना’ को निरखती, सिरजती रोज़ी को कनखियों में सराहता राजू हमेशा निष्‍पाप और बहुत सच्‍चा लगता, हां, एक केले की भूख में चेहरा मरोड़ते उसे देखते ही मगर दर्शक जान जाता देवानंद भूखा होने की एक्टिंग कर रहा है. वास्‍तविक कैसी भी परिस्थिति में प्‍लेस होते ही देवानंद एकदम सहजता व आसानी से अवास्‍तविक हो जाते, जबकि ‘ओ मेरे हमराही, मेरी हाथ थामे चलना, बदले दुनिया सारी, तू ना बदलना’ में पक्‍का भरोसा होता कि देवानंद हमेशा हाथ थामे होंगे, उनकी हंसी कभी नहीं बदलेगी. यही, इतना देवानंद का चार्म था. उनकी विशिष्‍टता, उनका अनूठापन. वह अपनी हिरोइनों को सच्‍चे आशिक की तरह बराबरी की संगत देते थे, 'आवारा' के राजू की तरह कभी अपनी नर्गिस के बाल खींचकर मोहब्‍बत का इसरार न करते, किसी दु:स्‍वप्‍न में भी नहीं, न 'पत्‍थर के सनम, तुझे हमने खुदा जाना' का शिकायती शोर उठाते, दिल टूटता तो हाथ में जाम लिये दबी आवाज़ गुनगुनाते 'दिन ढल जाये, रात न जाये', और गा चुकने के बाद धुले चेहरे के साथ बाहर आते तो 'तीन देवियां' की नंदा ही नहीं, कल्‍पना और सिमी सब यक़ीन करतीं कि देवदत्‍त उनका और सिर्फ़ उन्‍हीं का है. 

देवानंद उतना ही रियल थे जितना रियल टिनटिन है, जैसे एक पूरी पीढ़ी के लिए एल्‍वीस प्रेस्‍ली का होना, उस रोमान में नहाये, जीवन जीना हुआ. इस मायने में वे शायद भारतीय सिनेमा के अकेले, अनूठे मिथकीय सुपरस्‍टार साबित हों. अलबत्‍ता ‘हम एक हैं’ से ‘चार्जशीट’ के देव साहब की कहानी कहीं ज़्यादा टेढ़ी है, मगर जैसा मैंने पहले कहा ही, देवानंद को प्‍यार करनेवाले ढेरों लोगों को मैं जानता हूं, देव साहब को कौन जानता है?

4/03/2009

तीन का एक: फिर एक बार हिंदी फ़ि‍ल्‍में..

हिंदी फ़ि‍ल्‍मों पर लिखना, लिखते रहना सचमुच कलेजे का काम है. ऐसा नहीं है कि हिंदी साहित्‍य पर लिखना कलेजे का काम नहीं है, लेकिन साहित्‍य के साथ सहूलियत है कि आप किताब बंद कर देते हैं चिरकुटई ओझल हो जाती है, जबकि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों की रंगीनियां आपका पीछा नहीं छोड़तीं, बस के पिछाड़े से लेकर बाथरुम के आड़े तक ‘मसक अली, मसक अली!’ की मटक का सुरबहार तना रहता है. बार-बार याद कराता कि अभीतक हमको नहीं देखे? जन्‍म फिर ऐसे ही सकारथ कर रहे हो? आप अस्तित्‍ववादी चिंताओं में घबराकर ‘दिल्‍ली 6’ की ज़द में घुस ही गये तो फिर दूसरी वैचारिक घबराहटें शुरू हो जाती हैं. पहली तो यही कि हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का निर्देशन करनेवाले ये प्रतिभा-पलीता किस देश के कैसे प्राणी हैं? और जैसे भी प्राणी हैं भक्ति व श्रद्धा में भले इनका रंग निखरता हो, फ़ि‍ल्‍म बनाने का करकट करतब किस भटके डॉक्‍टर ने इन्‍हें प्रीसक्राइब किया है? माने अभी ज्यादा वक़्त नहीं हुआ आपने ‘रंग दे बसंती’ के तरबूज के फांक काटे थे, और इतनी कर्कटता से अब तरबूज की तरकारी (या ‘दिल्‍ली 6’) परस रहे हैं? कहां गड़बड़ी कहां है, भाईजान? काम की कंसिंस्‍टेंसी कोई चीज़ होती है? कि स्‍टील की फैक्‍टरी में आप प्‍लास्टिक की चप्‍पल मैनुफैक्‍चर कर आते हैं? और बाहर आकर दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए मुस्‍कराते भी रहते हैं कि इट्स अ ट्रिब्‍यूट टू माई सिटी! इज़ दिज़ सम ट्रिब्‍यूट, मिस्‍टर मेहरा, ऑर हाथी की लीद? इट्स रियली नॉट फ़नी!

माने सचमुच यह दार्शनिक प्रश्‍न होगा कि आप किस एंगल से ‘दिल्‍ली 6’ को एक फ़ि‍ल्‍म मानें. माने इसलिए मानें कि फ़ि‍ल्‍म में बहुत सारे एक्‍टर हैं और वो बहुत सारी बकबक करते हैं और किसी घटिया वाईड एंगल वीडियो की तर्ज़ पर रामलीला जैसा कुछ जाने कितने जन्‍मों तक चलता रहता है? मैंने काफी समझा-बुझाकर खुद को तैयार किया था कि कम से कम मिस्‍टर जूनियर बच्‍चन को अमरीका से लौटा हुआ मान लूं, मगर इतनी रियायत भी मन पचा ले लगता है अभिषेक बाबा इतने पर के लिए भी तैयार नहीं थे. अमरीका से नहीं प्रतापगढ़ के किसी टैक्‍सी यूनियन के सेक्रेटरी के छुटके भइय्या रौशन ख़ानदान हैं पूरे वक्त इसीकी प्रतीति होती रही! कास्टिंग के बारे में सचमुच क्‍या कहा जाये, फ़ि‍ल्‍म की इकलौती अच्‍छी बात ‘मसक अली’ वाले गाने को देखते समय लगता है कबूतर की कास्टिंग सही हुई है. दिल्‍ली और चांदनी चौक लगता है मुमताज़ के 'दुश्‍मन' के ‘देखो, देखो, देखो, बाइस्‍कोप देखो’ से इंस्‍पायर होकर डायरेक्‍टर साहब कैप्‍चर कर रहे थे.

अबे, सचमुच कोई हिंदी फ़ि‍ल्‍म क्‍यों देखे? मगर यह फिर वही बात हुई कि कोई हिंदी में किताबें क्‍यों पढ़े. आदमी अकेलेपन से घबराकर जैसे शादी कर लेता है, मैं हिंदी की किताब एक ओर हटाकर हिंदी फ़ि‍ल्‍म देखने चला जाता हूं! इसी तरह के मानसिक भटकाव में ‘गुलाल’ देखने चला गया होऊंगा. फ़ि‍ल्‍म के दस मिनट नहीं बीते होंगे, ख़ून खौलानेवाली बहुत सारी बड़ी-बड़ी बातें होने लगीं, मैं भी खौलता हुआ वयस्‍क दर्शक बनने की भूमिका बनाने लगा. मगर फिर बहुत जल्‍दी थियेट्रिकल गानों की थियेट्रिकल अदाओं से ऊब इस समझ पर भी आकर आराम करने लगा कि फलां जगह घुसा देंगे, डंडा कर देंगे की महीन बुनावट वाली ये दुनिया हमें पारंपरिक हिंदी सिनेमा से अलग दुनिया देखने के क्‍या नये मुहावरे दे रही है, सचमुच दे रही है?देव डी’ पर बड़े सारे भाई और बच्‍च लोग गिर-गिरके बिछते और बिछ-बिछके गिरते रहे मगर वह टुकड़ा-टुकड़ा दिल की कौन नयी दुनिया खोल रही थी? या ड्रग्‍स, सैक्‍स, वॉयलेंस का एक ज़रा सा हटके वही पुराना कॉकटेल ठेल रही थी? कुछ लोग मेरे कहे से संभवत: नाराज़ हो जायें, कि मैं फ़ेयर नहीं कह रहा एटसेट्रा मगर माफ़ कीजिये, दोस्‍तो, मेरे पास इस सिनेमा के लिए ‘सिनेमा ऑफ़ डिसपेयर’ से अलग और कोई नाम नहीं सूझता. एंड इन माई अर्नेस्‍ट सिंसीयरिटी आई जेनुइनली क्‍वेश्‍चन ऑल दोज़ फ़ि‍ल्‍म एंथुसियास्‍ट्स हू आर गोइंग गागा ओवर गुलाल..

गुलाल से निकलकर ‘बारह आना’ लोक में गया, और सच कहूं फ्लैट, इकहरा डायरेक्‍शन, खराब ऐक्‍टरों व निहायत सिरखाऊ बैकग्राउंड स्‍कोर के बावज़ूद फ़ि‍ल्‍म देखने का मलाल नहीं हुआ. आसान रास्‍तों की सहूलियत से मुक्‍त, नेकनीयती और मुश्किल स्क्रिप्‍ट धीरे-धीरे अपने को संभाले ठीक-ठाक निकल जाती है. गुलाल की बजाय बारह आना वाली दुनिया में होना ज़्यादा अर्थपूर्ण लगता है.

12/08/2007

पुरानी फ़ि‍ल्‍म रीविजिटेड..

बचपन में देखी, और देखकर लहालोट हुई फ़ि‍ल्‍मों पर दुबारा लौटना, देखना ख़तरनाक खेल है. अब तक मेरा अनुभव तो यही रहा है (हो सकता है सिनेमा से ज़रा ज़्यादा जुड़े रहने और उसके विविध पहलुओं की छांट-छटाई के स्‍वाभाविक अभ्‍यास ने यह ‘खेल’ मेरे लिए थोड़ा ज्यादा निर्मम बना दिया हो, मगर कमोबेश ऐसे अनुभव अन्‍य लोगों को भी हुए ही होंगे. फिर, यह भी सच है कि कुछ फ़ि‍ल्‍में- इसलिए कि उनकी फ़ि‍ल्‍ममेकिंग विशिष्‍ट है- सदाबहार बनी भी रहती हैं). ख़ैर, मैं बचपन की देखी फ़ि‍ल्‍मों के ‘री-विजिट’ के ख़तरों की बाबत कह रहा था. और विनम्रता के साथ ज़ोर देकर कहना चाह रहा हूं कि इन मान्‍यताओं को किसी व्‍यक्ति या काम-विशेष के विरूद्ध न समझा जाये. तो पहले भी ऐसे मौके आये थे. राजेश खन्‍ना और नन्‍दा की एक थ्रिलर थी, ‘द ट्रेन’. बचपन में देखने पर बड़ा मज़ा आया था कि क्‍या धांसू स्‍टंट हैं, कहानी का कसाव है इत्‍यादि-इत्‍यादि. गाने तो बढ़ि‍या थे ही (गुलाबी आंखें जो तेरी देखीं शराबी ये दिल हो गया; किसलिए मैंने तुझे प्‍यार किया, किसलिए इक़रार किया, सांझ-सबेरे तेरी राह देखी), बहुत वर्षों बाद कहीं से सीडी लेकर फ़ि‍ल्‍म लगाई, फिर वही मज़ा लेने की कोशिश की तो हाथ-पैर फूलने लगे! चेतन आनंद ने इन्‍द्राणी मुखर्जी और राजेश खन्‍ना के साथ एक फ़ि‍ल्‍म की थी- आख़ि‍री ख़त, चेतन साहब का अपना ‘बेबीज़ डे आऊट’. गाने उसमें भी मस्‍त थे- बहारों मेरा भी जीवन संवारो, भूपिंदर का ‘रुत जंवा, जवां, रात मेहरबां’), बचपन में खूब आंखें गीली हुई थीं, दुबारा देखने पर चेतन साहब की पूरी फिल्‍ममेकिंग रहस्‍यवाद लग रही थी. लग रहा था कैमरा चालू करने के बाद भूल गए हों कि इन द फ़र्स्‍ट प्‍लेस चालू किया क्‍यों था और चालू कर दिया तो ‘कट’ जैसी कोई चीज़ बोली भी जाती है!

ओपी रल्‍हन एक कॉमेडियन हुआ करते थे, धर्मेंद्र और मीना कुमारी को लेकर एक सोशल ड्रामा बनायी थी (डायरेक्ट्रियल डेबू)- फूल और पत्‍थर. धमाल फ़ि‍ल्‍म थी, धमाल चली भी थी. दुबारा प्‍लेयर पर चढ़ाने के बाद हमसे दस मिनट चलाते नहीं चली. इस श्रृंखला में और नाम हैं- मनोज कुमार की ‘पहचान’ (बस यही अपराध हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्‍यार करता हूं.. पाक़ि‍ज़ा को फेल करके उस साल फिल्‍मफेयर के अवार्ड्स हथियानेवाली फिल्‍म पहचान ही थी!), चेतन आनंद की ‘हंसते ज़ख़्म’, विजय आनंद की ‘तेरे मेरे सपने’, यश चोपड़ा की ‘इत्‍तेफ़ाक’, कि कभी मज़ा आया था लेकिन दुबारा देखने पर क्‍यों मज़ा आया था का सवाल पहेली बनकर रह गया. यही बात विमल राय की ‘मधुमती’, ‘देवदास’, के आसिफ के ‘मुग़ले-आज़म’ और साऊथ की ‘राम और श्‍याम’ और रमेश सिप्‍पी के ‘शोले’ देखने पर नहीं होता. मगर कल फिर खेल में फंस गया और मुंह की खायी.

जब आयी थी तो मैंने ही नहीं, बहुतों ने आनन्‍द लिया था और फिल्‍म को हिट बनायी थी. बासू चटर्जी की ‘रजनीगंधा’. मन्‍नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित अमोल पालेकर और विद्या सिन्‍हा की पहली, प्रेम त्रिकोण फिल्‍म (1974). कल फिल्‍म दुबारा देखना हुआ तो मन में बार-बार यही बात आ रही थी कि कुछ फिल्‍में अपने समय का मिज़ाज भले पकड़ती हों, होती निहायत ‘डेटेड’ हैं, और बतौर फिल्‍म उनका भविष्‍य नहीं होता! माने स्क्रिप्‍ट और संवाद ऐसे थे कि उसे पढ़ने का ख़्याल आते बोरियत होने लगे. बहुत सारे संवाद दो नहीं, लगता था चार-चार बार बोले जा रहे हैं. फिर हंसी और उदासी के बने-बनाये चार एक्‍सप्रेशंस. केके महाजन का कैमरा वर्क ऐसा मानो आज के सीरियल एपिसोड की फिल्‍म बारह दिन में छापने की हड़बड़ी हो. कोई कल्‍पनाशीलता नहीं. सब बड़े सीधे-सपाट इमेज़ेस. कभी-कभी सलिल चौधरी के बैकग्राउंड स्‍कोर और मुकेश का ‘कई बार यूं ही देखा है..’ से अलग पूरी कसरत अब एक भयानक थकान की तरह याद रहनेवाली है. जय हो बचपन की मधुर स्‍मृतियां..

4/28/2007

चमत्‍कृत करनेवाला बैनर और इटली के एरमान्‍नो ओल्‍मी

जिस तरह अंगूठे और तर्जनी के बीच बच्‍चे का गाल दबा के मां पहली दफा स्‍कूल जा रहे लाडले के तेल चुपड़े केश संवारती है, फिर गर्व से आश्‍वस्‍त होकर उसे बाहर पठाती है; हम भी कुछ उसी अदा में कल देर रात अपने ब्‍लॉग के बैनर से छेड़छाड़ करते रहे. और बेचारे बच्‍चे के साथ हुई हिंसा वाले अंदाज़ में ही फेल्लिनी की व फेल्लिनी संबंधी दस तस्‍वीरों के जगर-मगर को ब्‍लॉग के माथे चिपका कर जब आत्‍मा से ‘ये क्‍या कर डाला’ का धुआं उठने लगा- तो थक-हार मानकर आश्‍वस्‍त हो लिये, और इसके पहले कि उसे और लबेरते, सेव करके बाहरी संसार में पठा दिया!

गुगल ने बैनर के साथ फोटो नत्‍थी करने का जो नया ऑप्‍शन दे दिया है, तो उस ऑप्‍शन को टटोलने के बाद अब हम उसकी तबतक चीरफाड़ करेंगे जबतक फोटोशॉप और हमारी आंखें फट कर बाहर न आ जायें! फेल्लिनी कब्र से कराहते हुए बाहर न निकल आयें- कि भैया, बहुत करम कर लिया, अब हमारी जान बख्‍शो! फेल्लिनी की फिल्‍म होती तो शायद ऐसा कुछ सचमुच घट भी जाता, मगर जानता हूं वास्‍तविक लोक में फेल्लिनी की जान का जो होना था 1993 में हो चुका है, वह जहां हैं वहीं पड़े रहेंगे और मुझको तबतक चैन नहीं पड़ेगा जब तक कंप्‍यूटर के फिल्‍मी फोल्‍डर को आमूल-चूल एक्‍शॉस्‍ट न कर लूं! खलिहागिरी में ‘क्रियेटिव एंगेजमेंट’ का बहाना और मसाला दोनों हो गया, और कम स कम सामग्री के स्‍तर पर न सही (जैसाकि पीछे हफ्ते भर से हो रहा है), बैनर के स्‍तर पर सिलेमा में आपको नवीनता मिलेगी, इसका वादा है!

आज वर्षों बाद तिबारा एरमान्‍नो ओल्‍मी की ‘द ट्री ऑफ वुडेन क्‍लॉग्‍स’ (अंग्रेजी में शीर्षक) देखी. लगभग तीस वर्ष पहले बनाई बहुत ही विशिष्‍ट फिल्‍म है. अनुभव की महक से अभी तक गमक रहा हूं. आनेवाले दिनों में जल्‍दी ही उसकी चर्चा पर लौटूंगा. तबतक आप फेल्लिनी का बैनर देखकर चकित रहिये, और चकित रहते-रहते आजिज आने लगें तो थक कर हमारी तारीफ़ भी कर डालिये.