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8/12/2007

ब्लू अम्ब्रेला

छतरी चोर

डाइरेक्टर: विशाल भारद्वाज
कहानी: रस्किन बांड
पटकथा: विशाल भारद्वाज,
अभिषेक चौबे, मिंटी कुंवर तेजपाल
संवाद: विशाल भारद्वाज
कैमरामैन: सचिन के क्रिश्‍न
संगीत: विशाल भारद्वाज
साल: 2007
अवधि: 90 मिनट
रेटिंग: ***

मैने विशाल भारद्वाज की सभी फ़िल्में देखी हैं.. मेरे ख्याल में ब्लू अम्ब्रेला उनकी सबसे बेहतर फ़िल्म है.. फ़िल्म की कहानी बहुत मामूली है.. एक पहाड़ी कस्बे की एक दस ग्यारह बरस की लड़की बिनिया को एक जापानी छतरी मिल जाती है.. जिसे पा कर वह उड़ती फिरती है.. मगर कस्बे के अधेड़ परचूनी नन्दू की भी नज़र छतरी पर है.. और एक दिन छतरी चोरी हो जाती है.. बिनिया को शक़ है कि छतरी नन्दू ने ली है जो पहले भी छतरी हथियाने के लिए उसे तरह तरह के प्रलोभन दे चुका है.. मगर तलाशी लेने पर भी छतरी नन्दू के पास से नहीं मिलती..बाकी फ़िल्म बिनिया और नन्दू के बीच छतरी को लेकर इसी तनाव की कहानी है..

फ़िल्म बच्चों की निश्छल दुनिया को दिखाती है.. काफ़ी हद तक और काफ़ी देर तक बच्चों की मासूम नज़र से भी दिखाती है.. इन्टरवल के बाद के एक गाने और कुछ दसेक मिनट को छोड़ दें तो फ़िल्म में एक कसाव बना रहता है.. बच्चों की उस भूली बिसरी दुनिया को मैं देखता सुनता रहा जो काफ़ी सालों से हिन्दी फ़िल्मों के लिए अनजानी है.. सत्तर के दशक में गुलज़ार ने उसे कभी छुआ था.. और अस्सी के दशक में शेखर कपूर ने.. नहीं तो बचपन का वह संसार हिन्दी फ़िल्मों में निरापद ही रहा है..

फ़िल्म हिमाचल के किसी छोटे कस्बे में फ़िल्माई गई है.. और गर्मी, बरसात और बरफ़ानी सर्दी सभी मौसम की रंगत दिखलाती है.. पहाड़ों पर आप किसी भी तरफ़ कैमरा रख कर चला दीजिये कुछ खूबसूरत क़ैद हो ही जाएगा.. लिहाज़ा फ़िल्म खूबसूरत बनी रहती है.. शायद और खूबसूरत भी हो सकती थी.. संगीत विशाल का अपना है.. और एक गीत को छोड़कर बचपन का संसार का जादू बनाये रखने में मदद करता है.. संवाद हमेशा की तरह इस फ़िल्म में भी विशाल के ही हैं.. और बहुत उम्दा हैं.. पंकज कपूर कमाल के अभिनेता है.. एक बार फिर साबित करते हैं.. दो चार अन्तराष्ट्रीय अवार्ड अगर वह बटोर लायं तो कोई हैरानी नहीं होगी..

और आखिर में कथानक जिसमें विशाल हमेशा चित हो जाते हैं.. इस बार ज़्यादा नियंत्रण में नज़र आते हैं.. कहानी में मौजूद दुनिया का माहौल बनाने में विशाल भारद्वाज का कोई जवाब नहीं.. शायद इस वक़्त के सारे फ़िल्मकारों में वे सबसे अच्छा महौल बना सकने की क्षमता रखते हैं.. मगर जब कहानी सुनाने की और ड्रामा की बारी आती है.. वे लड़खड़ा जाते हैं.. मकड़ी की बात न करें.. उसमें दूसरे मामले थे.. मक़बूल में भी यही हुआ और ओंकारा में भी.. कमाल का माहौल बनाया गया.. मध्यांतर तक फ़िल्म ऐसी जादुई समा बाँधे रहती है कि आप को लगता है कि बवाल है बाबू बवाल.. मगर इन्टरवल के बाद कहानी को आगे बढ़ाते हुए विशाल को पता नहीं क्या हो जाता.. वे ऐसे गिरते पड़ते हुए चलते हैं.. जैसे कोई ज़बरदस्ती उनसे ड्रामा करवा रहा हो.. और उस ड्रामा में उनकी कोई श्रद्धा कोई भरोसा न हो..

ब्लू अम्ब्रेला में भी ये समस्या है.. मगर इतनी कम कि मैं उस का ज़िक्र सिर्फ़ इसलिए कर पा रहा हूँ क्योंकि मैं उसे पहले ही मक़बूल और ओंकारा में चिह्नित कर चुका हूँ.. इस फ़िल्म के आखिर में नन्दू परचूनी का समाज द्वारा बहिष्कार और उसका दुख थोड़ा ज़्यादा खिँच गया लगता है..साथ ही छतरी खो जाने के बाद बिनिया की भावानात्मक जगत का प्रतीकात्मक चित्रण भी.. हो सकता है वह लड़की की अभिनय क्षमताओं की सीमाओं के चलते भी किया गया हो.. मगर बिनिया के दुख को दिखाने के और भी तरीके हो सकते थे.. जो फ़िल्म के मूड के साथ तालमेल रखते.. और बचपन की जिस मासूमियत और भारहीनता के साथ आप शेष फ़िल्म का आनन्द ले रहे होते हैं इन हिस्सों पर आ कर वह जादू टूट जाता है.. और फ़िल्म आप को भारी लगने लगती है..

मेरे इस महीन पाठ से ज़रा भी हतोत्साहित मत होइये.. मैं फिर कहता हूँ.. कि यदि हिन्दी फ़िल्मों की नकली, हिंसक और बाज़ारू दुनिया से आप तंग आ चुके हैं और हिन्दी फ़िल्म वालों के खिलाफ़ आप के मन में गहरा आक्रोश है.. तो इस फ़िल्म को ज़रूर देखिये.. हो सकता है कि फ़िल्मों की रंजकता और किसी संसार को सच्चाई से दिखा सकने की उनकी क्षमता पर फिर से भरोसा जाग जाए.. एक ईमानदार कोशिश है जिसे देख कर आनन्द लिया जाना चाहिये.. अफ़सोस यह है कि मेरे अलावा हॉल में और पन्द्रह लोग ही इस आनन्द का पान करने मौजूद थे..

- अभय तिवारी