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1/02/2011

मैंने नहीं किया, शायद जीवन ने किया हो..

बारह साल के जेरोम के सर का भारी घड़ा हर समय शर्म से भरा रहता है कि पड़ोस के अन्‍य घरों की तरह उसका घर 'नॉर्मल' क्‍यों नहीं. घर के अहाते में तमाशा बने बाप के आगे जेरोम गिड़गिड़ाता है कि पप्‍पा, प्‍लीज़, पड़ोस के सबलोग हमें पागल समझते है? बाप बच्‍च्‍ो को आश्‍वस्‍त करता है कि सही समझते हैं, वी आर ए क्रेजी फ़ैमिली! मैं जिस तरह खुशी में घबराकर सिगरेट जला लेता हूं, जेरोम का हूनरमंद छोटा भाई लेओं गले में फंदा लगा लेने का टाईमपास करता है, स्‍क्रू ड्राइवर से खिड़की तोड़कर छुट्टी पर बाहर गए पड़ोसियों के घर 'डाका' डालता है, माथे पर दुख ज़्यादा चढ़ने लगे (या असमंजस. दोनों एक ही नहीं?) तो घबराकर छुरी से कंधा चीर लेता है, या बीस मीटर ऊंचाई से लहराकर नीचे कूद जाता है. यह सारी फुलकारियां कैनेडियन फ्रेंच फ़िल्‍म 'कसम खाकर कहता हूं, मैंने नहीं किया' की फूल-पत्तियां हैं. जेरोम की दस वर्षीय दु:खहारी पगलाहटों की संगत में मॉंट्रियल की हरियाली में हरा होते हुए मन बाग़-बाग़ हो जाता है. पता नहीं कुछ खुराफाती कैसे होता है कि उदासियों का ऐसा मीठा सिनेमा रच लेते हैं. जबकि फिलीप फलादेउ उम्र में मुझसे सात वर्ष छोटा है और कुछ दिनों पहले मैंने उसकी एक और फ़िल्‍म देखी थी, 'फ्रिज़ का बायां किनारा', दु:खभूगोल के उल्‍टे-सीधे मनचीरकारी उसमें भी थे, पर ऐसा मार्मिक उत्‍पात कहां था? आंद्रे तरपिन की ऐसी सिनेकारी कहां थी, कि पैट्रिक वॉटसन का, बांस के जंगलों में दीवारों के बीच दबी, फंसी, ऐंठी बजती हवा की मनतोड़ संगीत की संगत नहीं थी, इसलिए?

मैं बहकता जाऊंगा इसलिए बेहतर है पहले आप उस बहन में गिरकर बहक जाने की जगह पैट्रिक के एक ट्रैक में मन का सुर सेट कर लें. साथ ही 'कसम' का ट्रेलर देख लें (हालांकि ट्रेलर फ़िल्‍म की खूबसूरती का रत्‍ती भर कंपेनसेशन नहीं)..

क्‍या है कैनडा में, कहां से उस शांत लगभग निर्विकार लैंडस्‍कैप में मनहारे के इंटेंस पहाड़ फूटते रहते हैं? ऑलिवियेर असाये का 'क्लीन' और 'समर अवर्स' और डेनी आरकां की (जीसस ऑफ़ मांट्रियल, द बारबेरियन इनवेज़ंस) जैसी अनोखी, विरल सिनेनिबंध फूटते रहते हैं? असाये ने पिछले साल टेलीविज़न के लिए साढ़े पांच घंटे की 'कारलोस' तैयार की (प्रमोद सिंह ने देख ली, और बुरी नहीं है)..

कृपया कुछ और फ़ि‍ल्‍मों पर नज़र रखें (क्‍योंकि कैनेडियन फ़ि‍ल्‍ममेकर हमसे भले मनवाना चाहें दु:ख पर उनकी बपौती नहीं. मन में लेओं का स्‍क्रूड्राइवर चलाने को पड़ोस का अमरीका भी बीच-बीच में वैसा ही हहियाता रहता है. नोट करें 'द किड्स आर ऑल राइट', केविन स्‍पेसी की 'श्रिंक', 'लाइफ ड्यूरिंग वॉरटाइम'. फिर ऑस्‍ट्रेलिया भी पीछे नहीं छूट रहा, उसके शो-केस में है 'एनीमल किंगडम',, एनीमेटेड 'मैरी एंड मैक्‍स' और 'लैंटाना'. पिछले दिनों सुना युक्राइना भी अपनी आमद बताने पिछले वर्ष कान अपनी एक फिल्‍म 'माई जॉयज़' के साथ पहुंचा हुआ था (नाम से धोखे़ में न जायें, हालांकि फ़ि‍ल्‍म अभी मैंने देखी नहीं है).

जय हो सदाबहार संसार. चलते-चलते पैट्रिक का एक और यह ट्रैक भी सुनते चलिए..

बकिया आप सभी को नया साल मुबारक हो..

9/04/2007

रैटाटुई

साल: 2007
भाषा: अंग्रेज़ी
लेखक व डाइरेक्टर: ब्रेड बर्ड
अवधि: 110 मिनट
रेटिंग: ****

आसपास किसी सिनेमा में लगी हो तो बीच में कभी फुरसत लहाकर ‘रैटाटुई’ देख आइए. बेसिक इमोशंस को झिंझोड़ने, ज़रा बेहतर इंसान बना सकने की सिनेमा की ताक़त पर एक बार फिर भरोसा जगेगा (जो विशेषता आजकल आमतौर पर फ़ि‍ल्‍मों से क्रमश: छिनती गई है; सिनेमा हॉल में बैठे हुए व बाहर निकलकर आप थोड़ा और विवेक व समझदारी लेकर बाहर निकलें, ऐसा अब होता भी है तो बहुत कम होता है)..

रैटाटुई पिक्‍सार की एनिमेशन फ़ि‍ल्‍म है जो उन्‍होंने वॉल्‍ट डिज़्नी के लिए बनाई है. कहानी ये है.. कहानी रहने दीजिए, मैं कहानी सुनाने लगूंगा और आप खामख्वाह बैठके बोर होइएगा! कथासार का लब्‍बौलुवाब यह है कि समाज और दुनिया की बनाई पूर्वाग्रही तस्‍वीरों में उलझने और जकड़कर रह जाने की जगह अपनी आत्‍मा की राह पर निकलना चाहिए.. देर-सबेर उसे पहचाना जाता है.. प्रशस्ति मिलती है.. यहां संदर्भ रेमि नाक के एक चूहे की है जो अपनी बिरादरी के ‘चुराके खाओ और अपनी औकात में रहो’ के मुल्‍य की जगह अपनी खोज व सिरजने की राह पर निकलता है, व तमाम अवरोधों के पश्‍चात पाक विद्या के गढ़ में स्‍नेह व इज़्ज़त हासिल करके रहता है.

कहानी अच्‍छी चाल से आगे बढ़ती है, बच्‍चे हंसते रहते हैं तो लगता है सबका मनोरंजन हो रहा है.. मगर फिर, बीच-बीच में ढेरों ऐसे मौके बनते हैं जब फ़ि‍ल्‍म का स्‍वर अचानक एकदम ऊपर उठकर विशुद्ध सिनेमा हो जाता है, और आपके मन के गहरे कोनों में अंतरंगता व समझ की मीठी थपकियां छोड़ जाता है! काफी सारे प्रसंग हैं जब रैटाटुई का लेखन और किरदारों की डेलिवरी बड़ी उम्‍दा महसूस होती है. आंतोन इगो व लिंग्विनी की आवाज़ों के लिए क्रमश पीटर ओ’टूल और लू रोमानो का काम दाद के काबिल है.

सोचिए मत, जाकर फ़ि‍ल्‍म देख आइए.

8/20/2007

जर्मनी ईयर ज़ीरो

साल: 1948
भाषा: इतालवी
डाइरेक्टर: रॉबर्तो रोस्सेलिनि
अवधि: 71 मिनट
रेटिंग: ****

रोस्सेलिनि नियो रियलिस्ट सिनेमा के बड़े हस्ताक्षर हैं. रोम ओपेन सिटी और पैसान के साथ यह फ़िल्म उनकी युद्ध त्रयी का आखिरी भाग है.

दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका है. जरमनी खण्डहर बन चुका है. उस पर विजेता अलाइड फ़ोर्सेज़ काबिज़ हैं. जिनके घर नष्ट हो गए हैं वे सरकार द्वारा दूसरों के घरों में ठूँस दिए गए हैं. ऐसे ही एक छोटे से परिवार की कहानी है यह फ़िल्म. फ़िल्म की क्रूर और नंगी सच्चाई को हम 12 साल के एदमन्द की आँखों से देखते हैं. पिता बीमार हो कर खाट पकड़े हुए है. नाज़ी सेना का लड़ाका रह चुका भाई छुप कर रहा है. डरता है कि उसे डण्डित किया जाएगा. चार मुँह भरने की जिम्मेदारी बड़ी बहन पर है जो रातों को एलाईड फ़ोर्सेज़ के सैनिकों के दिल बहला कर कुछ कमाई करती है. और एदमन्द पर जो कम उमर होने पर भी कब्रें खोद कर और काला बाज़ार में घर का सामान बेच कर अपने परिवार की अस्तित्व रक्षा करना चाहता है. हालात कठिन हैं. पर एदमन्द सीखने को तैयार है. वह अपने पुराने शिक्षक के द्वारा कामुक पुचकार भी सहने को तैयार है, अगर कुछ कमाई होती हो. मगर पिता का दर्द और परिवार की भूख उस से देखी नहीं जाती.. और वह कुछ ऐसा अप्रत्याशित कर बैठता है जो शायद पूरी जर्मन जाति द्वारा अपने इतिहास को नकारने के प्रतीक तुल्य है.

बिना किसी भावुकता के फ़िल्माई यह श्याम श्वेत फ़िल्म आप को अन्तर को गहरे तक चीरती चली जाती है और कुछ मूलभूत सवाल खड़े करती है.

- अभय तिवारी