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3/03/2010

हालिया कुछ दिखी फ़ि‍ल्‍में..

un uomo in ginocchio इसी को कहते होंगे डेस्टिनी, चीज़ों को कहां-कहां पहुंचाती है. या नहीं पहुंचाती. कि उदासियों के करीने से सजाये कंपोशिज़ंस और छोटे शहर के लंबे जारमुशी ट्रैक शॉट्स ‘लेक ताहो’ को बर्लिन पहुंचाते हैं, मगर अदरवाइस मैक्सिको के बाहर की बहुत यात्रायें नहीं करवाते. उसकी जगह सिंगापुर की तमिलभाषी, अपेक्षाकृत स्‍थूल, ‘माई मैजिक’ के दुश्‍कर जीवन की नाटकीयता सीधे कान के कंपिटिशन में जगह बनाती है. एक दूसरी, पुरानी फ़ि‍ल्‍म, जो यूं ही अनजाने हत्‍थे चढ़ी और देखते हुए मन अघाया वह थी, सन्र ’78 की बनी इटली के दमियानो दमियानी की ‘घुटने पर आदमी’. मैं दमियानो की दुनिया से बहुत वाकि‍फ नहीं तो मेरे लिए फ़ि‍ल्‍म कुछ आंख खोलनेवाली थी. एक आम आदमी के नज़रिये से पलेर्मो के माफिया-जाल-जंजाल की धीमे-धीमे वहशतनाक परत खोलती, लेकिन कोई-सा भी ऑवियस ड्रामा नहीं, कपोला का रोमांस, या ब्रायन द'पाल्‍मा का ‘स्‍कारफेस’ या ‘द अनटचेबल्‍स’ की प्रकट हिंसा नहीं, बस धीमे-धीमे गरम शीशा चूता रहता है और स्‍थान, समाज-विशेष में आदमी की नियति का एक सघन निबंध बुनता चलता है. आदमी की नियति से देखे हुए एक हालिया अमरीकी फ़ि‍ल्‍म की भी याद. फ़ि‍ल्‍म है ‘अप इन द एयर’, सुआव और अटरली सिनि‍कल क्‍लूनी, मंदी के दौर में कंपनियों के मालिकों वाला काम कर रहे हैं, मतलब शहर-शहर घूम-घूमकर लोगों को ‘फायर’ कर रहे हैं, चेहरे पर शराफ़त की हंसी चढ़ाये, निस्‍संगता के बर्बरगीत की एक नयी पैकेजिंग किये, समझदारी से लिखी, कही फ़ि‍ल्‍म किसी भी तरह की अतिशयता से बचती है और फ़ि‍ल्‍म के आखिर क्रेडिट रोल्‍स में देखकर अच्‍छा लगता है कि 52 वर्षीय काम से बहरियाये केविन रेनिक ने दरअसल टाइटल गाने की लिखाई और धुन की बनाई की है. हाल की दो और फ़ि‍ल्‍मे जो हौले-हौले खुलती किताब बनती रहीं, वह थीं सॉलिडली गठी हुई आर्जेंटिनियन थ्रिलर ‘द सिक्रेट इन देयर आईस’ और कुछ लगभग उसी अनुपात में, उतनी ही अनगढ़, मगर अपने ठहराव में बांधनेवाली, स्‍वीडन की ‘फाल्‍कनबर्ग फेयरवेल’.

12/11/2007

कॉफ़ी एंड सिगरेट्स..

पोलिश मूल के अमरीकी जिम जारमुश ने न्‍यूऑर्क फ़ि‍ल्‍म स्‍कूल में पढ़ाई के दौरान ही अपने हिस्‍से की शॉर्ट फिल्‍म को 15,000 डालर्स के फिसड्डी बजट में एक फीचर की तरह शूट किया ().. पढ़ाई के बाद कुछ वक़्त फ्रांस में गुजारने के बाद जब वापस अमरीका लौटे तो विम वेंडर्स को शूटिंग करते हुए पकड़ा, अपनी फिल्‍म की शूटिंग में बझे वेंडर्स से रॉ स्‍टॉक हासिल किया और 1984 में अपनी पहली व्‍यवस्थित फ़ि‍ल्‍म बनाई- ‘स्‍ट्रेंजर देन पैराडाइज़’- जो कान में कैमरा दा’र के पुरस्‍कार से पुरस्‍कृत हुई. अस्‍सी के शुरूआत से सिनेमा में सक्रिय जारमुश मुख्‍यधारा से बाहर उन फ़ि‍ल्‍मकारों में हैं जो अब भी काली-सफ़ेद फ़ि‍ल्‍मों को जिंदा रखे हुए हैं. आइए, उनकी फीचर ‘कॉफ़ी एंड सिगरेट्स’ (2003) की कुछ क्लिपिंग्‍स देखते हैं..

फ़ि‍ल्‍म का पहला एपिसोड:



टॉम वेट्स और इगी पॉप एपिसोड:



कज़न्‍स एपिसोड. एक सफल एक्‍टर की ज़रा अपने प्रति सुरक्षा देखिए:



मोर कज़न्‍स:



जुड़वां एपिसोड:



नेट पर यहां द गार्जियन का लिया जारमुश का एक इंटरव्‍यू.

(ऊपर टॉम वेट्स के साथ जिम जारमुश)

9/07/2007

द ब्‍लैक डाहलिया

साल: 2006
भाषा: अंग्रेज़ी
डायरेक्‍टर: ब्रायन द पाल्‍मा
लेखक: जोश फ्रायडमान, जेम्‍स एलरॉय
रेटिंग: **

बेबात की सत्रह अदायें हिंदी फ़ि‍ल्‍मों का ही दुर्गुण हो, ऐसा नहीं.. हॉलीवुड में ये नौटंकियां ज़मीन-आसमान एक करने लगती हैं, इसलिए भी कि उनके पास फूंकने को ज़्यादा पैसा है.. लगातार मोबाइल कैमरे से मिज़ानसेन रचने में ‘स्‍कारफेस’, ‘द अनटचेबल्‍स’, ‘मिशन इम्‍पॉसिबल’ जैसी बड़ी व सफल फ़ि‍ल्‍मों के निर्देशक ब्रायन द पाल्‍मा विशेष आनन्‍द लेते हैं.. बहुत बार सीन बड़ा महत्‍वपूर्ण होने जा रहा है इसका भरम भी बनता है.. मगर फिर धीमे-धीमे आप समझने लगते हैं ये अदायें हैं.. और अदायें सिर्फ़ अदायें होती हैं..

2006 में बनी ‘द ब्‍लैक डाहलिया’ चालीस के दशक में एलिज़ाबेथ शॉर्ट नामकी एक अभिनेत्री के मर्डर की सच्‍ची हटना पर लिखे जेम्‍स एलरॉय के उपन्‍यास का फ़ि‍ल्‍मी रूपान्‍तर है.. थ्रिलर.. ब्रायन द पाल्‍मा का हमेशा का पसंदीदा जानर.. विल्‍मोस सिगमोंद की अच्‍छी सिनेमाटॉग्राफ़ी है.. बीच-बीच में अच्‍छे चुटीले वाक्‍य सुनने को मिलते हैं.. लगता है मज़ेदार पॉप फ़ि‍लॉसफ़ी की पंक्तियां बरसीं.. जोश हार्टनेट और स्‍कारलेट जोहानसन का अभिनय भी बीच-बीच में आपको लपेटता है.. मगर फिर आप थकने लगते हैं.. और राह तकते हैं कि ठीक है, भाई, अब फ़ि‍ल्‍म खत्‍म हो.. मगर होती नहीं.. प्‍याज़ की परतों की तरह, और ‘देखो, दुनिया में कितना गंध है!’ वाले अंदाज़ में एक के बाद एक जाने कैसे-कैसे उलझे भेद खुलते रहते हैं.. आपको बस यही समझ आता है देखने में अच्‍छी, मगर अंतत: सुगधिंत मूर्खता है.. हॉलीवुडियन एक्‍स्‍ट्रावैगांज़ा है, विशुद्ध इंडलजेंस है.