4/25/2007

अकड़ अकड़ के बिगड़ बिगड़ के

समाज, देश, समय, विश्‍व, ब्‍लॉग को तोड़ने की बहुआयामी साजिशें चल रही हैं, उस लिहाज से पवित्र पापी जी की यह रचना अब भी उतना ही मौजूं हैं जितनी जब 1959 में लिखी गई थी तब थी.

और इसका असर तब के समाज पर भी इतना असरकारी था कि कोई जनाब नाम बदलकर कैफ़ी आज़मी के नाम से शायर हो गए और उन्‍होंने चुपके से इस रचना को सचिन दा की जेब के रास्‍ते से क़ागज के फूल जैसी एक फ़ि‍ल्‍म में डाल दिया था, पर उपयुक्‍त असर पैदा करने में असफल रहे थे. आप स्‍कॉच की तरह धीरे-धीरे आनंद लीजिये; असर पैदा होगा, धीरे-धीरे...


एक दो तीन चार और पांच
छे और सात, आठ और नौ
एक जगह सब रहते थे
झगड़े पर थे उनमें सौ

नौ ने कहा आठ क्‍या
छोटे का ठाठ क्‍या
आठ हंसा सात पे
तुफ़ तेरी ज़ात पे
सात ये बोला छे से
तू हंसा कैसे

अकड़ अकड़ के बिगड़ बिगड़ के
झगड़ा झंझट खिच-खिच करके
सबने सबको फटकारा
रह गया सबका मुंह तक के
सबसे छोटा एक बेचारा
एक दो तीन...

एक बेचारा तनहा-तनहा
फिरता था आवारा-सा
सिफ़र मिला उसे रस्‍ते में
बेक़ीमत आवारा-सा
एक ने पूछा तुम हो कौन
उसने कहा मैं सिर्फ़ सिफ़र
एक ने सोचा मैं भी क्‍या
सबसे छोटा और कमतर
मिल गए दोनों बन गए दस
चमका क़ि‍स्‍मत का तारा
एक दो तीन...

एक को जब दस बनते देखा
सबने सिफ़र को रोका-टोका
नौ ने प्‍यार से आंख मिलाई
आठ ने सौ-सौ बात बनाई
सात ने रंगीं जाल बिछाए
छे ने सौ तूफ़ान उठाए
घटा-घटा के मिटा-मिटा के
सिफ़र को एक से दूर हटा के
छीना एक दूजे का सहारा
एक बेचारा तन्‍हा तन्‍हा
फिरने लगा फिर से आवारा...

5 comments:

अफ़लातून said...

इस मजेदार गीत का लेबल बदलिये , जनता की माँग है ।

अभय तिवारी said...

फुल तिरिया चरित्तर..

yunus said...

गुरू बेहतरीन गीत की तरफ ध्‍यान खींचा आपने और वो भी सही समय और सही संदर्भ पर । मज़े की बात ये है कि कागज के फूल के बाक़ी सारे गीतों की चर्चा भाई लोग करते हैं और उन्‍हें बजाते भी हैं । लेकिन ये बेचारा गीत कहीं नजर अंदाज कर दिया जाता है । आपकी नजरे इनायत हुई तो कई लोगों ने पहचाना होगा कि कैफी उस्‍ताज( हमारी बुंदेलखंडी में उस्‍ताद को उस्‍ताज कहते हैं) ने कितने पहले ही छीनाझपटी का गणित लिख दिया था । बहरहाल मजा आ गया ।

प्रियंकर said...

चमत्कार! दारूण लिखेछेन दादा!

somen said...

dil khush kar ditta!!