बचपन में देखी, और देखकर लहालोट हुई फ़िल्मों पर दुबारा लौटना, देखना ख़तरनाक खेल है. अब तक मेरा अनुभव तो यही रहा है (हो सकता है सिनेमा से ज़रा ज़्यादा जुड़े रहने और उसके विविध पहलुओं की छांट-छटाई के स्वाभाविक अभ्यास ने यह ‘खेल’ मेरे लिए थोड़ा ज्यादा निर्मम बना दिया हो, मगर कमोबेश ऐसे अनुभव अन्य लोगों को भी हुए ही होंगे. फिर, यह भी सच है कि कुछ फ़िल्में- इसलिए कि उनकी फ़िल्ममेकिंग विशिष्ट है- सदाबहार बनी भी रहती हैं). ख़ैर, मैं बचपन की देखी फ़िल्मों के ‘री-विजिट’ के ख़तरों की बाबत कह रहा था. और विनम्रता के साथ ज़ोर देकर कहना चाह रहा हूं कि इन मान्यताओं को किसी व्यक्ति या काम-विशेष के विरूद्ध न समझा जाये. तो पहले भी ऐसे मौके आये थे. राजेश खन्ना और नन्दा की एक थ्रिलर थी, ‘द ट्रेन’. बचपन में देखने पर बड़ा मज़ा आया था कि क्या धांसू स्टंट हैं, कहानी का कसाव है इत्यादि-इत्यादि. गाने तो बढ़िया थे ही (गुलाबी आंखें जो तेरी देखीं शराबी ये दिल हो गया; किसलिए मैंने तुझे प्यार किया, किसलिए इक़रार किया, सांझ-सबेरे तेरी राह देखी), बहुत वर्षों बाद कहीं से सीडी लेकर फ़िल्म लगाई, फिर वही मज़ा लेने की कोशिश की तो हाथ-पैर फूलने लगे! चेतन आनंद ने इन्द्राणी मुखर्जी और राजेश खन्ना के साथ एक फ़िल्म की थी- आख़िरी ख़त, चेतन साहब का अपना ‘बेबीज़ डे आऊट’. गाने उसमें भी मस्त थे- बहारों मेरा भी जीवन संवारो, भूपिंदर का ‘रुत जंवा, जवां, रात मेहरबां’), बचपन में खूब आंखें गीली हुई थीं, दुबारा देखने पर चेतन साहब की पूरी फिल्ममेकिंग रहस्यवाद लग रही थी. लग रहा था कैमरा चालू करने के बाद भूल गए हों कि इन द फ़र्स्ट प्लेस चालू किया क्यों था और चालू कर दिया तो ‘कट’ जैसी कोई चीज़ बोली भी जाती है!
ओपी रल्हन एक कॉमेडियन हुआ करते थे, धर्मेंद्र और मीना कुमारी को लेकर एक सोशल ड्रामा बनायी थी (डायरेक्ट्रियल डेबू)- फूल और पत्थर. धमाल फ़िल्म थी, धमाल चली भी थी. दुबारा प्लेयर पर चढ़ाने के बाद हमसे दस मिनट चलाते नहीं चली. इस श्रृंखला में और नाम हैं- मनोज कुमार की ‘पहचान’ (बस यही अपराध हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं.. पाक़िज़ा को फेल करके उस साल फिल्मफेयर के अवार्ड्स हथियानेवाली फिल्म पहचान ही थी!), चेतन आनंद की ‘हंसते ज़ख़्म’, विजय आनंद की ‘तेरे मेरे सपने’, यश चोपड़ा की ‘इत्तेफ़ाक’, कि कभी मज़ा आया था लेकिन दुबारा देखने पर क्यों मज़ा आया था का सवाल पहेली बनकर रह गया. यही बात विमल राय की ‘मधुमती’, ‘देवदास’, के आसिफ के ‘मुग़ले-आज़म’ और साऊथ की ‘राम और श्याम’ और रमेश सिप्पी के ‘शोले’ देखने पर नहीं होता. मगर कल फिर खेल में फंस गया और मुंह की खायी.
जब आयी थी तो मैंने ही नहीं, बहुतों ने आनन्द लिया था और फिल्म को हिट बनायी थी. बासू चटर्जी की ‘रजनीगंधा’. मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर आधारित अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की पहली, प्रेम त्रिकोण फिल्म (1974). कल फिल्म दुबारा देखना हुआ तो मन में बार-बार यही बात आ रही थी कि कुछ फिल्में अपने समय का मिज़ाज भले पकड़ती हों, होती निहायत ‘डेटेड’ हैं, और बतौर फिल्म उनका भविष्य नहीं होता! माने स्क्रिप्ट और संवाद ऐसे थे कि उसे पढ़ने का ख़्याल आते बोरियत होने लगे. बहुत सारे संवाद दो नहीं, लगता था चार-चार बार बोले जा रहे हैं. फिर हंसी और उदासी के बने-बनाये चार एक्सप्रेशंस. केके महाजन का कैमरा वर्क ऐसा मानो आज के सीरियल एपिसोड की फिल्म बारह दिन में छापने की हड़बड़ी हो. कोई कल्पनाशीलता नहीं. सब बड़े सीधे-सपाट इमेज़ेस. कभी-कभी सलिल चौधरी के बैकग्राउंड स्कोर और मुकेश का ‘कई बार यूं ही देखा है..’ से अलग पूरी कसरत अब एक भयानक थकान की तरह याद रहनेवाली है. जय हो बचपन की मधुर स्मृतियां..
12/08/2007
पुरानी फ़िल्म रीविजिटेड..
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फोकटिया वाला खेला,
हिंदी सिनेमा
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