नेटफ्लिक्स पर एक रुमानियन फ़िल्म है, ‘पापा पहाड़ हटाते हैं’, सरकारी इंटैलिजेंस की नौकरी से बाहर आया मीरचा पहाड़ क्या, पहाड़ के बापों को हटा सकता है, देश जितना पिछड़ा और संस्थागत तौर पर जर्जर हो, पहाड़ हटाने, तथ्यों को दबाने, संस्थाओं का अपने हित व स्वार्थ में बरतने की ताक़त उतनी ही बढ़ भी जाती है। 1989 में निकोलाय चायचेस्कू के तख्ता-पलट से रुमानिया तानाशाही के पाप से मुक्त नहीं हो गया। समाज से एक तानाशाही हटती है तो समाज दूसरी महीन तानाशाहियों को जगह देने की ज़मीन निकाल लेता है, मीरचा जैसे लोग ऐसी ज़मीनों के नेटवर्क से बेहतर वाकिफ़ हैं, इसलिए गर्लफ्रेंड के साथ पहाड़ों की तफरीह पर गया बेटा जब उन पहाड़ी तूफ़ानों में ऊपर की बर्फीली दुनिया में गुम गया है, मीरचा इसको ठेलता, उसको धकेलता बेटे की खोज में पहाड़ों को हिलाने, बेटा पाने पहुंचता है। और रुमानिया की पिछड़ी दुनिया में ताक़त और पहुंचदारी के संसार को हम धीरे-धीरे खुलता देखते हैं। मतलब नेगोशियेसन ऑफ़ पॉवर इन अ नट-शेल।
10/15/2021
द कोमी रूल
कहानी डेढ़ और लगभग दो घंटों के दो एपिसोड्स में है। एफबीआई
का डायरेक्टर जेम्स कोमी (कार्यकाल : 2013-2017) अपने को ‘अपोलिटिकल’
कहता है, संस्थागत नैतिकता और ईमानदारी से काम
करने में यकीन रखता है। मगर कोमी और उसके मातहती में रात-दिन मेहनत करनेवाले देख रहे
हैं कि पुतिन का झूठतंत्र, हिलरी क्लिंटन के ई-मेल्स की ‘हैकिंग’ और तत्संबंधी दुष्प्रचार अमरीकी लोकतंत्र में
कैसे न केवल घुसपैठ कर चुका है, उसने एक ऐसा डरावना रास्ता खोल
दिया है जहां अमरीकी शासकीय संस्थाएं ख़तरनाक तरीकों से ‘कॉम्प्रोमाइस’
हो सकती हैं, हो सकती हैं नहीं हो रही हैं। इसे
रोकने का एक ही तरीका है कि प्रशासन अपनी पूरी ताक़त से पुतिन और पुतिन की ‘कठपुतलियों’ के खिलाफ़ मोर्चा खोले, मगर कैसे मोर्चा खोले जब नवनियुक्त राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ख़ुद पुतिन
और उसके लुटेरे ओलिगार्कों के आर्थिक अहसानों और राजनीतिक ‘मैनिपुलेशंस’
व ‘मनुवरिंग’ से सत्तासीन
हुआ है! सीधी लीक के सीधे विश्वासों पर चलनेवाले जिम कोमी के
काम का रास्ता बड़ा टेढ़ा व संकरा हो रहा है। वह अपने काम में ईमानदारी की बात करता
है, उसका राष्ट्रपति उससे ‘निष्ठा’
और ‘भक्ति’ चाहता है। और
जैसाकि लगभग पूरी तरह बदल चुके और ‘मैनिपुलेटेड’ अमरीकी शासन के गंवरपने और दबंगई में स्वाभाविक था, चुन-चुनकर ट्रंप की निष्ठा से बाहर के लोगों को बाहर किया जा रहा था,
जिम कोमी भी बाहर हुए। उनकी पूरी टीम बाहर हुई। शासन की मशीनरी के इस
तिया-पांचा की ताक-झांक और प्रशासकीय नैतिकताओं के जंतर-मंतर की ये टहल दिलचस्प है।
कोमी का रोल जैफ डैनियलस ने किया है, और ट्रंप का अभिनय आईरिश
एक्टर ब्रैंडन ग्लीसन ने। दोनों ऊंचे पाये के अभिनेता हैं। शोटाईम के बनाये इस मिनी-सीरीज़
को डायरेक्ट बिली रे ने किया है।
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9/18/2021
मध्यांतर
एक फ़िल्म पर कुछ लिखना चाह रहा था, मगर माथे में ताक़त नहीं बन रही। शायद कुछ दिनों में बने तब लौटूंगा ‘द नेस्ट’ पर। फ़िलहाल नेटफ्लिक्स की ‘अनकही कहानियां’ की तीन कहानियों में से बीच की एक कहानी की ओर उंगली पकड़कर आपको ले चलने की कोशिश करता हूं। कहानी पुरानी, 1986 की लिखी है, 2018 में कन्नड से अंग्रेजी में अनुदित जयंत कैकिनी की कहानियों को डीसीबी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया था, किताब का शीर्षक है, ‘’नो प्रसेंट प्लीज़’ (एक उपशीर्षक भी है, ‘मुंबई स्टोरीज़’), किताब में काफ़ी मज़ेदार कहानियां हैं, उस लिहाज़ से अभिषेक चौबे ने ‘मध्यांतर’ नाम की जिस कहानी को अपनी फ़िल्म के लिए चुना है, वह अपेक्षाकृत कुछ ढीली और कमज़ोर कहानी है, मगर इसलिए भी अभिषेक की तारीफ़ की जानी चाहिए कि उन्होंने अपनी स्क्रिप्टिंग, सिनेमाकारी से उसमें एक भरा-पूरापन, एक ज़िंदा ऊर्जा भर दी है। महानगर के उपनगरीय जीवन की बदहाल, असंवेदन उदास संसार में सपनों को सहेजने के कोमल तिलिस्म को रिंकी राजगुरु का चेहरा अपनी मार्मिकताओं में निखारता चलता है। खुद को हीरो-हिरोईन की कल्पनाओं में बहलाने की चार-पांच मिनट की अदाबाजियां हैं, अदरवाइस कहानी के पैर कायदे से ज़मीन पर बने रहते हैं। 'अनकही..' की बाकी दोनों कहानियों पर कुछ नहीं कहुंगा, मगर मौका लगे तो बीच की ‘मध्यांतर’ देख डालिये।
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9/10/2021
लघुकाय भेदकारी दिलदारियां
तीन फ़िल्मों की तीन रातें। बहुत देर और बहुत दूर तक आपकों फंसाये रहती हैं। जैसे अफ़ग़ानिस्तान पर आनंद गोपाल की 2015 की किताब। किताब पढ़ते हुए बार-बार होता है कि आप हाथ की किताब कुछ दूर रखकर सोचने लगते हैं। और देर तक सोचते रहते हैं कि इस दुनिया का हिसाब-किताब चलता कैसे है। या राजनीति का कूट संसार चलानेवालों को किसी गहरे कुएं में धकेलकर हमेशा-हमेशा के लिए उन्हें वहां छोड़ क्यों नहीं दिया जाता?
'फिरंगी चिट्ठियां, 2012’, बचपन की दोस्तियों की दिलतोड़ तक़लीफ़ों की मन में खड़खड़ाती आवाज़ करती, और फिर किसी घने, विराट छांहदार वृक्ष के दुलार में समेटती दुलारी फ़िल्म है। ‘अज़ोर, 2021’, अंद्रेयास फोंताना की पहली फ़िल्म। प्रकट तौर पर कोई हिंसा नहीं, मगर समूचे समय एक दमघोंट किस्म का तनाव आपको दबोचे रहता है। क्या है यह तनाव? यह अस्सी के दशक का अर्जेंटीना है। अंद्रेयास का काम घातक तरीके का दिलफरेबी सिनेमा है, जैसे 2019 की शाओगांग गु की चीनी फ़िल्म है।
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