नेटफ्लिक्स पर एक रुमानियन फ़िल्म है, ‘पापा पहाड़ हटाते हैं’, सरकारी इंटैलिजेंस की नौकरी से बाहर आया मीरचा पहाड़ क्या, पहाड़ के बापों को हटा सकता है, देश जितना पिछड़ा और संस्थागत तौर पर जर्जर हो, पहाड़ हटाने, तथ्यों को दबाने, संस्थाओं का अपने हित व स्वार्थ में बरतने की ताक़त उतनी ही बढ़ भी जाती है। 1989 में निकोलाय चायचेस्कू के तख्ता-पलट से रुमानिया तानाशाही के पाप से मुक्त नहीं हो गया। समाज से एक तानाशाही हटती है तो समाज दूसरी महीन तानाशाहियों को जगह देने की ज़मीन निकाल लेता है, मीरचा जैसे लोग ऐसी ज़मीनों के नेटवर्क से बेहतर वाकिफ़ हैं, इसलिए गर्लफ्रेंड के साथ पहाड़ों की तफरीह पर गया बेटा जब उन पहाड़ी तूफ़ानों में ऊपर की बर्फीली दुनिया में गुम गया है, मीरचा इसको ठेलता, उसको धकेलता बेटे की खोज में पहाड़ों को हिलाने, बेटा पाने पहुंचता है। और रुमानिया की पिछड़ी दुनिया में ताक़त और पहुंचदारी के संसार को हम धीरे-धीरे खुलता देखते हैं। मतलब नेगोशियेसन ऑफ़ पॉवर इन अ नट-शेल।
Showing posts with label small reviews. Show all posts
Showing posts with label small reviews. Show all posts
10/15/2021
9/10/2021
लघुकाय भेदकारी दिलदारियां
तीन फ़िल्मों की तीन रातें। बहुत देर और बहुत दूर तक आपकों फंसाये रहती हैं। जैसे अफ़ग़ानिस्तान पर आनंद गोपाल की 2015 की किताब। किताब पढ़ते हुए बार-बार होता है कि आप हाथ की किताब कुछ दूर रखकर सोचने लगते हैं। और देर तक सोचते रहते हैं कि इस दुनिया का हिसाब-किताब चलता कैसे है। या राजनीति का कूट संसार चलानेवालों को किसी गहरे कुएं में धकेलकर हमेशा-हमेशा के लिए उन्हें वहां छोड़ क्यों नहीं दिया जाता?
'फिरंगी चिट्ठियां, 2012’, बचपन की दोस्तियों की दिलतोड़ तक़लीफ़ों की मन में खड़खड़ाती आवाज़ करती, और फिर किसी घने, विराट छांहदार वृक्ष के दुलार में समेटती दुलारी फ़िल्म है। ‘अज़ोर, 2021’, अंद्रेयास फोंताना की पहली फ़िल्म। प्रकट तौर पर कोई हिंसा नहीं, मगर समूचे समय एक दमघोंट किस्म का तनाव आपको दबोचे रहता है। क्या है यह तनाव? यह अस्सी के दशक का अर्जेंटीना है। अंद्रेयास का काम घातक तरीके का दिलफरेबी सिनेमा है, जैसे 2019 की शाओगांग गु की चीनी फ़िल्म है।
Labels:
small reviews,
World Cinema,
लघुकाया समीक्षा
Subscribe to:
Posts (Atom)

