3/29/2007

दस सवालों के घेरे

ईरानी सिनेमा: सात

देश में सुधार के लिए स्‍त्री और छात्रों के संघर्ष ने आम चेतना को किस हद तक छुआ है, और साथ ही साथ इसी क्रम में फिल्‍मों की शक्‍ल कैसे बदली है इसका एक अंदाज़ पिछले कुछ वर्षों की बनी फिल्‍मों में देखा जा सकता है. ‘द सर्किल’ (2000) में पनाही ईरान में स्त्रियों की अवस्‍था पर बहुत ही निर्ममता से चोट करते हैं. आम तौर पर जिस भले-भोलेपन से जोड़कर हम ईरानी सिनेमा को देखते हैं द सर्किल में वह तार-तार होती दिखती है. थोड़े ही अंतराल पर अब्‍बास क्‍यारोस्‍तामी की ‘दस’ (2002) आती है. यहां फिल्‍म का विषय तेहरान की सड़कों पर टैक्‍सी चलाती एक औरत का अपने बेटे व अन्‍य मुसाफिरों के संग किये दस संवाद हैं. ठुकराई दुल्‍हन, वेश्‍या और मस्जिद जाती इस जमाव में हर तरह की स्त्रियां हैं और अंतर्तम की वो सारी टेढ़ी-उलझी लकीरें जिनका आम तौर पर हमें दर्शन नहीं होता. समय और माध्‍यम के चौतरफा एक्‍सप्‍लोरेशन के विश्‍वासी क्‍यारोस्‍तामी ने दस डीवी कैमरा से शूट किया, और फिल्‍म का समूचा समय एक टैक्‍सी के दायरे में संपन्‍न होता है.

इस दौर का मज़ेदार पहलू यह देखना है कि कैसे फिल्‍में यूनिवर्सल सामाजिक चिंताओं से हटकर ईरान की अपनी विशिष्‍ट मुश्किलों पर केंद्रित हो रही थीं. घोबादी के ‘कछुए उड़ सकते हैं’ (2004) में हमारा सामना युद्धजर्जर कुर्द शरणार्थियों और अमरीकी मुक्ति के फ़रेब व व्‍यभिचार की निहायत ही मार्मिक तस्‍वीरों से होता है.

इस तरह से ईरानी सिनेमा ईरानी राज्‍य के साथ एक पेचीदा व मुश्किल रिश्‍ता बनाये हुए है. शाह एक राष्‍ट्रीय सिनेमा विकसित करके अपने लिए ताली बजवाना चाहते थे, लेकिन अर्थपूर्ण सिनेमा की शुरुआत ही ईरान में राज्‍य का विरोध और भारी वर्गीय भेद को दर्शाने से हुई. वे भेद, वे अंतर्विरोध अभी भी खत्‍म नहीं हुए हैं. ईरानी सिनेमा में अच्‍छे या बुरे का अस्तित्‍व नहीं. लोंगों का व्‍यवहार व विचार बहुत हद तक उनकी सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों से उपजती हैं. और इन अंतरविरोधों की मार्मिक व्‍याख्‍या का जो आरंभ फारोगज़ाद और दारियस मेहरजुइ से हुआ था, वह वक्‍त बीतने के साथ और पैना, ज्‍यादा सुघड़ ही हुआ है. हॉलीवुड और बॉलीवुड के मनोरंजन से अपना सिनेमाई ककहरा सीखनेवाले ईरान से आज समूची दुनिया शिक्षा ले सकती है.

(ऊपर जफ़र पनाही के 'द सर्किल' का पोस्‍टर, नीचे घोबादी के 'कछुए उड़ सकते हैं' का कमउम्र 'नायक')

3/28/2007

The Namesake

A Stroll Through Life

By Arun Varma

During the Mumbai Film Festival a couple of years ago, a filmmaker friend of mine once walked out of a film. He told me he could no longer bear watching films traveling less than ten kilometer per hour. I remember being very amused by the way he put it… traveling less then ten km per hour.

The Namesake by Mira Nair does just that. It is a stroll through the walk of life where the filmmaker sometimes makes you sit on the pavement and watch the world as it goes by. By the end of the stroll you realize that you have gone through a lifetime. Nothing happens in the film. Only life. Just life.

The most striking quality of the film is it’s serenity—almost like an Ozu. This serenity assumes various shades. Of joy, nostalgia, loneliness, unbelonging and grief. Like a calm river with surging undercurrents. Even the slightest ripple on this calm surface makes an impression—the image of Ashima collapsing outside her house on a lonely Newyork street at night after hearing of her husband’s death. Or the image of Gogol with a shaved head walking in to meet his mother after his father’s demise.

I would like to tell that friend of mine to watch this film. Who knows.. he might just end up liking it. .

3/26/2007

दुनिया का सबसे खूबसुरत कालीन और सबसे मीठा सेब

ईरानी सिनेमा: छह

तेजी से वैश्विक पूंजीवाद में रुपांतरित होते ईरान का सिनेमा भी बहुत कुछ गाबेह (एक तरह का कालीन) की तरह दिखने लगा. एक फ्रांसीसी कंपनी के आर्थिक सहयोग से बनी गाबेह (मोहसेन मखमलबाफ, 1996) की लागत काफी कम थी मगर सांस्‍कृतिक व आर्थिक मोर्चों पर इसने भारी कमाई की. युद्ध के बाद, खोमैनी के बाद के संदर्भ में नये ईरानी सिनेमा की काव्‍यमयी खूबसुरती अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोहों की पसंद व स्‍वाद के खूब अनुकूल बैठ रही थी, और ताज़ा-ताज़ा सत्‍ता में आये और विदेशी पूंजी के स्‍वागत में खुलते खतामी ने पश्चिमी दुनिया के आगे देश की एक अलग पहचान चिन्हित करने में ईरानी सिनेमा का भरपूर इस्‍तेमाल किया.

नये ईरान की अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान में सरकार की सहयोगी सिनेमा लेकिन सरकार के पीछे-पीछे नहीं चल रही थी, अपने ढंग से वह सवालों के दायरे भी बुन रही थी. बहुत बार तीखेपन में तिक्‍तता का ऐसा क्षण भी आता जब फिल्‍म पर पाबंदी लगाकर उसे सिनेमा के पर्दों से हटाने की नौबत आती. गिरगिट (तबरीज़ी, 2004) एक ऐसी ही फिल्‍म थी जो मुल्‍ला का भेस धरकर जेल से भागे एक अपराधी की कहानी कहती है. भ्रष्‍ट और पतित धर्म के ठेकेदारों के प्रति आम रोश ने झट लोगों को फिल्‍म की तरफ खींचा और इसने ईरानी बॉक्‍स ऑफिस के इतिहास के सारे रेकॅर्ड तोड़ दिये. तब जाकर कहीं सरकारी मुल्‍ला चेते और फिल्‍म पर बैन लगा. मगर गिरगिट शायद सीधे आग की हंडी में कूद रही थी. ढेरों अन्‍य फिल्‍में हैं जो यह यात्रा घूमकर कर रही थीं, और उतने ही मार्मिक स्‍तर पर समाज की आलोचना में सक्षम भी हो रही थीं. और चूंकि वो गिरगिट की तरह रेगुलर व्‍यावसायिक सिनेमा की बजाय समारोहों की चहेती फिल्‍में थीं सरकार के लिए उन पर हाथ धरना उतना आसान नहीं होता. इस लिहाज़ से 18 वर्ष की उम्र में बनाई समीरा मखमलबाफ की फिल्‍म सिब (सेब, 1998) एक अच्‍छा उदाहरण पेश करती है.

समीरा नब्‍बे के दशक के लोकतांत्रिक आंदोलन का बखूबी से वह मिज़ाज पकड़ती है जिसमें ईरान के शासक वर्गों का विभाजन हुआ और खतामी चुनाव जीतकर आये. सेब ग्‍यारह साल की दो ऐसी लड़कियों की कहानी है जो हमेशा ताले के भीतर बंद रहीं और बाहरी संसार से जिनका कोई संपर्क नहीं. ईरानी सिनेमा की परिचित मानवीयता से लबरेज़, फारोगज़ाद की परंपरा में यह फिल्‍म एक ही साथ एक सत्‍य घटना थी, उसका कथात्‍मक रुपांतरण थी और समाज में मौजूद सवालों के कन्‍फ्रंटेशन का एक सीधा रि-एनेक्‍टमेंट भी थी. और परिवर्तन की इस भूमिका में औरत उतर रही थी जो न केवल वर्गीय संबंधों पर सवाल खड़े कर रही है, लैंगिक भेदों पर भी सीधे निशाना साध रही है.

(जारी...)

(ऊपर: पिता मोहसेन की 'गाबेह' का एक दृश्‍य, नीचे: बेटी समीरा मखमलबाफ की 'सेब' से)

3/25/2007

पगडंडियों का राजमार्ग

ईरानी सिनेमा: पांच

नब्‍बे के दशक में ईरानी सिनेमा ने जो अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति पाना शुरु किया उसमें एक अंतर्निहित अंतर्विरोध भी छिपा था. इस्‍लामिक क्रांति के बाद का ईरान पश्चिमी मीडिया की नज़रों में युद्ध, धर्मांद्धता और आतताई मुल्‍लाओं के दमनकारी राज का पर्याय था, जबकि फिल्‍में निहायत एक अलग किस्‍म का ग्रामीण लैंडस्‍केप, बालसुलभ मासूमियत और ईरान की एक कवितामयी तस्‍वीर पेश करती थीं.

क्रांति के ठीक पहले शाह द्वारा आयातित पश्चिमी ‘पतनशील’ फिल्‍मों के प्रति आम गुस्‍सा जिसमें तेहरान के 180 सिनेमा हॉलों को आग के हवाले कर दिया गया, और स्‍वदेस वापसी पर खोमैनी के पहले ही भाषण में सिनेमा की उपयोगिता की चर्चा इसका सीधा संकेत थी कि ईरानी मानस में सिनेमा को कितना महत्‍वपूर्ण स्‍थान प्राप्‍त था, और आनेवाले दिनों के रेजिमेंटेशन में या तो वह पूरी तरह विलुप्‍त हो जाती, या फिर अपनी बुनावट की साज-संवार के साथ सिनेमा के एक नए दौर में प्रवेश करती. इन अतिवादी मुश्किलों, तनावों के बीच ही ईरान की कला-सिनेमा ने धीरे-धीरे अपने पैर जमाना शुरु किया. क्‍यारोस्‍तामी जो काफी वर्षों से बच्‍चों की एक संस्‍था से जुड़े थे इन तनावों का बेहतर तरीके से सामना करने की स्थिति में थे. बच्‍चों के साथ फिल्‍म करने का एक सीधा फायदा यह था कि सरकारी वर्जनायें (सेक्‍स, रोमांस, हिंसा) वहां यूं भी बेमानी हो जाती थी, मगर साथ ही, बच्‍चों की वजह से, समाज-समीक्षा का दायरा और अंतरंग हो जाता था. उदाहरण के लिए तसल्‍ली व प्‍यार-दुलार की पारंपरिक भूमिकाओं के निर्वाह की जगह परिवार इन फिल्‍मों में तनाव व द्वंद्व दर्शाने का मंच बनता है, जो आस-पास की सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों की वजह से खड़े हो रहे थे. (दोस्‍त का घर कहां है?).

इसके अनंतर क्‍यारोस्‍तामी ईरानी यथार्थवाद को एकदम अलग किस्‍म की ऊंचाइयों तक ले गए. ‘थ्रू द ऑलिव ट्रीज़’ (1994) में एक अभिनेता निर्देशक क्‍यारोस्‍तामी की भूमिका में क्‍यारोस्‍तामी का रोल करते एक दूसरे अभिनेता को निर्देशित कर रहा है. साथ ही यहां क्‍यारोस्‍तामी की फिल्‍म ‘लाइफ गोज़ ऑन’ के एक दृश्‍य का पुनर्मंचन हो रहा है जिसमें अभिनेता, क्‍यारोस्‍तामी के उस अनुभव को फिर से जी रहा है जब वह भुकंप पीडित क्षेत्रों में ‘दोस्‍त का घर कहां है?’ के एक्‍टरों की खोज-खबर लेने गए थे जहां फिल्‍म की शुटिंग हुई थी. क्‍यारोस्‍तामी ने धीमे-धीमे एक ऐसी दुनिया बुन दी थी जिसमें यथार्थ, कथा, सिनेमाई पुनर्रचना, डाक्‍यूमेंट्री के पारंपरिक विभाजन मिटकर एक निहायत अलहदा किस्‍म का ही सिनेलोक निर्मित कर रहे थे.

(जारी...)

(क्‍यारोस्‍तामी की 'थ्रू द ऑलिव ट्रीज़' की दुनिया)