अंधेरों में उजाले भी होंगे..
चिन्ना पोन्नु के पागलपने, वहशीघने का कोई क्या कर सकता है? तामिलनाडु में ही सही, गनीमत है हिन्दुस्तान के सार्वजनिक स्पेस में सामाजिक बंजारेपन, दीवानेपन की अभी जगह बची हुई है..