पत्रकारी वीर बालकत्व पर एक अमरीकी फ़िल्म है.. फ़िल्म के पीछे यह कहानी है.. कहानी वैसे थोड़ी पुरानी, 1998, की है, मगर आज के समय में कहीं ज्यादा प्रासंगिक है..
पत्रकारी वीर बालकत्व पर एक अमरीकी फ़िल्म है.. फ़िल्म के पीछे यह कहानी है.. कहानी वैसे थोड़ी पुरानी, 1998, की है, मगर आज के समय में कहीं ज्यादा प्रासंगिक है..
इस संशयभरे समय में अब कभी कैसा सुखद संयोग होता है कि फ़िल्म देखते हुए कोई चमकदार चालाकी देख रहे हों जैसी अनुभूति नहीं होती. सामान्य लोगों के लगभग घटनाविहीन जीवन-प्रसंगों के चित्र गरिमा के सुलगते बिम्बि बन जाते हैं, और मन उसमें धंसा देरतक चिटकता रहे, अब सचमुच कहां, कितना होता है? इस उत्तरर-आधुनिकता के उत्तरार्द्ध में जब चेख़ोवियन कहानी-कहन स्वयं हाशिये की चीज़ हो गए हों, कथा-तत्वों से खेल सकने की अंतर्निहित गुणशीलता कहनेवाले की मेधा का परिचायक बनती-घोषित हो, गुणीजनों की वाहवाही बटोरती हो, जो दिख रहा है वही, उतना ही कह रहा हूं की सीधी राह का पथिक गज़ब का सनकी, संभवत: दुस्साहसी कहलाये, कलाकार-फ़िल्मकार क्यों कहलायेगा भला? फिर भी सुखद आश्चर्य का विषय है कि रहते-रहते कलाबाज़ार के चालाक अंबार में ऐसी फ़िल्में प्रकट होती रहती हैं, और हॉलीवुडीय ढर्रे पर उन्हें ढेर, ढेर, ढेर सारा धन न भी मिले, दुलार बहुत सारा मिलता रहा है, आंखें खोज-खोजकर इन फ़िल्मों को देख लेती रही हैं. ऐसी ही एक उदास, और धीरे-धीरे मन और दिमाग़ पर चढ़ती शाइनी गाबेल की एक फ़िल्म 2004 में आई थी, ‘अ लव सॉंग फॉर बॉबी लोंग’, फ़िल्म में जॉन ट्रवोल्टा और स्कारलेट जॉहानसन थे से विशेष फर्क नहीं पड़ता, और न ही इसे कोई जिक्र करने लायक बड़े अवार्ड से नवाजा गया, मगर जिन्होंने फ़िल्म देखी है उनसे फ़िल्म के बाबत पूछकर फिर उनके चेहरे के भाव पढ़िये, उस भाव में वे सारे अवार्ड समाहित होंगे जो गाबेल को सार्वजनिक तौर पर प्राप्त नहीं हुए!