5/23/2007

यूगोस्‍लावियन अनमोल हीरा

अलेकसांद्र पेत्रोविच की 'आई इवन मेट हैप्‍पी जिप्‍सीस', 1967

अच्‍छी फ़ि‍ल्‍म क्‍या होती है? मुझे मालूम नहीं पारंपरिक समीक्षा इस सवाल पर क्‍या नज़रिया रखती है, मगर निजी तौर पर, मेरे लिए फ़ि‍ल्‍म- कहानी रेयरली होती है.. फ़ि‍ल्‍म देखते हुए अब ज्‍यादातर मैं फ़ि‍ल्‍म के प्‍याज की खोज में रहता हूं.. जितनी ज़्यादा फ़ि‍ल्‍म की बुनावट में परतें (लेयरिंग), उतना ही ज़्यादा व्‍यूइंग का आनंद! मतलब ये कि कहानी तो भइया, जो हो सो हो, देर-सबेर वह सामने आएगी ही, हमारी चिंता रहती है कि प्रोजेक्‍शन के शुरू होते ही बिम्‍बों व ध्‍वनियों की दुनिया कैसी खड़ी हो रही है.. फॉरग्राउंड में जो दिख रहा है, उसके पृष्‍ठ में क्‍या है, साउंड और इमेज़ की कटिंग कैसी हो रही है.. बैकग्राउंड स्‍कोर विज़ुअल्‍स को सिर्फ़ सपोर्ट कर रहा है, या एक दूसरे तल पर चलते हुए नैरेटिव को ज़्यादा गहरे अर्थ दे रहा है?

शायद फ़ि‍ल्‍म जैसे लोकप्रिय माध्‍यम में ये थोड़ी अभिजात किस्‍म की इच्‍छाओं, अपेक्षाओं का इम्‍पोज़ि‍शन है. खरी उतरना तो दूर, ज़्यादातर फ़ि‍ल्‍में ऐसी अपेक्षाओं के आसपास भी नहीं फटकतीं. इस लिहाज़ से पिछले दिनों अपने पूर्ण अज्ञान में- मात्र जिज्ञासावश, निरे संयोग से- 1967 में बनी एक यूगोस्‍लावी फ़ि‍ल्‍म- ‘स्‍कूपलाजी पेरया’ (अंग्रेजी में ‘आई इवन मेट हैप्‍पी जिप्‍सीस’ देखना अच्‍छा रोमांचकारी अनुभव साबित हुआ. फ़ि‍ल्‍म देख चुकने के बाद हमने डायरेक्‍टर अलेकसांद्र पेत्रोविच और फ़ि‍ल्‍म की खोजबीन की तब पता चला वह 1967 में ऑस्‍कर की सर्वश्रेष्‍ट विदेशी फ़ि‍ल्‍मों वाले दौड़ में भी थी, और ज़ि‍री मेंज़ेल की ‘क्‍लोज़ली गार्डेड ट्रेन्‍स’ जैसी एक दूसरी अनोखी फ़ि‍ल्‍म की वजह से इनाम पाते-पाते रह गई (अलबत्‍ता कान में स्‍पेशल ज़ूरी अवार्ड से नवाजी गई).

दरअसल 1960 के यूगोस्‍लावी सिनेमा की नई धारा को खड़ा करनेवाले लोगों में ज़ि‍वोइन पावलोविच और दुसान माकायेव के साथ-साथ अलेकसांद्र पेत्रोविच की मुख्‍य भूमिका रही. 1961 की बनी उनकी ‘दो’ ने नई धारा का रास्‍ता खोला, और 1965 की ‘तीन’, बताते हैं- ने उस आंदोलन की सशक्‍त अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान बनवाई.

‘स्‍कूपलाजी पेरया’ पारंपरिक स्‍तर पर कोई व्‍यवस्थित कहानी नहीं कहती. कुछ चरित्रों के साथ घूमते हुए हमें आधुनिक, औद्योगिक समाज में जिप्सियों की अपनी जगह बनाने, तलाशने की विडंबनाओं का धीमे-धीमे एक मार्मिक कोलाज़ बनती चलती है. जिसमें समाज, जीवन, इतिहास, प्रेम, आधुनिकता सब आपस में इस तरह घुलेमिले हैं कि एक को दूसरे से अलग करके देखना लगभग असंभव-सा बना रहता है. निजी तौर पर मेरे लिए फ़ि‍ल्‍म का प्रभाव अभी तक इतना मार्मिक है (सोचिए, ऐसे लगता है जैसे फेल्लिनी, थियो आंगेलोपोलुस, इमिर कुस्‍तुरिका, ऑल्‍टमैन सबको एक साथ और खामख्‍वाह की किसी भी नाटकीयता से मुक्‍त, वास्‍तविकता के ज्यादा नज़दीकी में देख रहे हैं!) फ़ि‍ल्‍म व अलेकसांद्र पेत्रोविच पर थोड़ी और समझ के लिए यहां नज़र डालें.

1 comment:

तुरीय said...

सिलेमा में फिल्मों के साथ - साथ फिल्म के शिल्प पर भी इसी तरह थोड़ा फोकस हो तो सच्चे सिनेमा के प्रति पाठकों की समझ और अच्छी हो पाएगी । यदि मुमकिन हो तो अच्छी
फोटोग्राफी या बैकग्राउंड म्यूज़िक या एडी‍‍िटंग को समझाते हुए इस संदर्भ की फिल्मों की चर्चा, सिनेमा की वैश्विक परिभाषा को जानने के साथ साथ कलात्मक समझ को सुरुचीपूर्ण बनाने में सहयोगी होगी ।