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5/23/2007

यूगोस्‍लावियन अनमोल हीरा

अलेकसांद्र पेत्रोविच की 'आई इवन मेट हैप्‍पी जिप्‍सीस', 1967

अच्‍छी फ़ि‍ल्‍म क्‍या होती है? मुझे मालूम नहीं पारंपरिक समीक्षा इस सवाल पर क्‍या नज़रिया रखती है, मगर निजी तौर पर, मेरे लिए फ़ि‍ल्‍म- कहानी रेयरली होती है.. फ़ि‍ल्‍म देखते हुए अब ज्‍यादातर मैं फ़ि‍ल्‍म के प्‍याज की खोज में रहता हूं.. जितनी ज़्यादा फ़ि‍ल्‍म की बुनावट में परतें (लेयरिंग), उतना ही ज़्यादा व्‍यूइंग का आनंद! मतलब ये कि कहानी तो भइया, जो हो सो हो, देर-सबेर वह सामने आएगी ही, हमारी चिंता रहती है कि प्रोजेक्‍शन के शुरू होते ही बिम्‍बों व ध्‍वनियों की दुनिया कैसी खड़ी हो रही है.. फॉरग्राउंड में जो दिख रहा है, उसके पृष्‍ठ में क्‍या है, साउंड और इमेज़ की कटिंग कैसी हो रही है.. बैकग्राउंड स्‍कोर विज़ुअल्‍स को सिर्फ़ सपोर्ट कर रहा है, या एक दूसरे तल पर चलते हुए नैरेटिव को ज़्यादा गहरे अर्थ दे रहा है?

शायद फ़ि‍ल्‍म जैसे लोकप्रिय माध्‍यम में ये थोड़ी अभिजात किस्‍म की इच्‍छाओं, अपेक्षाओं का इम्‍पोज़ि‍शन है. खरी उतरना तो दूर, ज़्यादातर फ़ि‍ल्‍में ऐसी अपेक्षाओं के आसपास भी नहीं फटकतीं. इस लिहाज़ से पिछले दिनों अपने पूर्ण अज्ञान में- मात्र जिज्ञासावश, निरे संयोग से- 1967 में बनी एक यूगोस्‍लावी फ़ि‍ल्‍म- ‘स्‍कूपलाजी पेरया’ (अंग्रेजी में ‘आई इवन मेट हैप्‍पी जिप्‍सीस’ देखना अच्‍छा रोमांचकारी अनुभव साबित हुआ. फ़ि‍ल्‍म देख चुकने के बाद हमने डायरेक्‍टर अलेकसांद्र पेत्रोविच और फ़ि‍ल्‍म की खोजबीन की तब पता चला वह 1967 में ऑस्‍कर की सर्वश्रेष्‍ट विदेशी फ़ि‍ल्‍मों वाले दौड़ में भी थी, और ज़ि‍री मेंज़ेल की ‘क्‍लोज़ली गार्डेड ट्रेन्‍स’ जैसी एक दूसरी अनोखी फ़ि‍ल्‍म की वजह से इनाम पाते-पाते रह गई (अलबत्‍ता कान में स्‍पेशल ज़ूरी अवार्ड से नवाजी गई).

दरअसल 1960 के यूगोस्‍लावी सिनेमा की नई धारा को खड़ा करनेवाले लोगों में ज़ि‍वोइन पावलोविच और दुसान माकायेव के साथ-साथ अलेकसांद्र पेत्रोविच की मुख्‍य भूमिका रही. 1961 की बनी उनकी ‘दो’ ने नई धारा का रास्‍ता खोला, और 1965 की ‘तीन’, बताते हैं- ने उस आंदोलन की सशक्‍त अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान बनवाई.

‘स्‍कूपलाजी पेरया’ पारंपरिक स्‍तर पर कोई व्‍यवस्थित कहानी नहीं कहती. कुछ चरित्रों के साथ घूमते हुए हमें आधुनिक, औद्योगिक समाज में जिप्सियों की अपनी जगह बनाने, तलाशने की विडंबनाओं का धीमे-धीमे एक मार्मिक कोलाज़ बनती चलती है. जिसमें समाज, जीवन, इतिहास, प्रेम, आधुनिकता सब आपस में इस तरह घुलेमिले हैं कि एक को दूसरे से अलग करके देखना लगभग असंभव-सा बना रहता है. निजी तौर पर मेरे लिए फ़ि‍ल्‍म का प्रभाव अभी तक इतना मार्मिक है (सोचिए, ऐसे लगता है जैसे फेल्लिनी, थियो आंगेलोपोलुस, इमिर कुस्‍तुरिका, ऑल्‍टमैन सबको एक साथ और खामख्‍वाह की किसी भी नाटकीयता से मुक्‍त, वास्‍तविकता के ज्यादा नज़दीकी में देख रहे हैं!) फ़ि‍ल्‍म व अलेकसांद्र पेत्रोविच पर थोड़ी और समझ के लिए यहां नज़र डालें.

2/17/2007

बहुत सारे तमाशों के बीच बहुत सुरीला संगीत

किच, कलर और नंगी भावनाओं का पेंटर: पेद्रो अलमोदोवार

पिछली सदी के उत्‍तरार्द्ध में बडी लडाई के बाद यूरोपीय समाज के संग-संग यूरोपीय सिनेमा का जो चेहरा बदलना शुरु हुआ, उसमें स्‍पेन की उपस्थिति कहीं नहीं थी. इटली के न्‍यू रियलिज़्म और फ्रांस के न्‍यू वेव और जर्मनी के न्‍यू सिनेमा के हस्‍ताक्षरों ने उनकी अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान बनाई, मगर तीन दशकों के इस लंबे अर्से में स्‍पानी सिनेमा का बस दो नाम लोगों की स्‍मृति पर चढा था: लुई बुनुएल और कारलॉस साउरा. बस. इसके आगे? इल्‍लै.

अस्‍सी के आखिर की तरफ इस उनींदे, बोझिल परिदृश्‍य में स्‍पेन की ओर से एक नाटकीय हस्‍तक्षेप हुआ. स्‍पेन की एक फिल्‍म ‘अ वुमेन ऑन द वर्ज ऑव नर्वस ब्रेकडाउन’ विदेशी फिल्‍मों वाली श्रेणी में नामांकित होकर ऑस्‍कर (1988) पहुंची थी. फिल्‍म के तीखे, चुटीले संवाद और भडकीले रंगों की लयकारी, चरित्रों की आंतरिक दुनिया की एक ऐसी उठा-पटक जिसे लोगों ने अपने जीवन में जीना शुरु तो कर दिया था, मगर वह कैमरे की जबान में अनुदित होकर अभी पर्दे तक पहुंची नहीं थी. फिल्‍म ने एकदम से लोगों का दिल जीता और फिल्‍मकार के प्रति लोगों की जिज्ञासा बढी. फिल्‍मकार थे पेद्रो अलमोदोवार.

डॉन किहोते के कारनामों की पृष्‍ठभूमि के एक साधारण, गरीब परिवार में जन्‍मे अलमोदोवार के आस-पास कोई सांस्‍कृतिक शिक्षण का माहौल नहीं था. खुद पेद्रो के पिता अंतोनियो लिखना-पढना नहीं जानते थे, गधे की पीठ पर वाईन बैरेल ढोकर आजीविका चलाते थे. मां फुरसत में लोगों के खत पढने और लिखने के काम से घर में कुछ पैसे और जोडती थी. मां-बाप ने नन्‍हें पेद्रो को पादरियों के स्‍कूल में दाखिल करवाया. अपने बच्‍चे को वह पादरी बनाना चाहते थे. मगर पेद्रो की नसों में सिनेमा का ज़हर चढ चुका था. घरवालों का दिल तोडकर वह 1967 में मैड्रिड भाग आये. यह साठ की चहल-पहल और बेशुमार गतिविधियों वाला मैड्रिड था. खुराफाती मगर एक्‍स्‍ट्रीमली फॉकस्‍ड पेद्रो के पैर जमाने की आदर्श जगह. और बावजूद एक पिछडे प्रांत से आने के, शहर के सांस्‍कृतिक परिदृश्‍य में पेद्रो ने धीमे-धीमे अपनी उपस्थिति दर्ज करनी शुरु कर दी. एक पंक-रॉक बैंड के लिए पै‍रोडियां गाईं, काटूर्न और कॉमिक्‍स लिखे, और राष्‍ट्रीय फोन सेवा की बारह साल लंबी अपनी नौकरी में दोपहर तीन बजे खाली होकर अपने फिल्‍मी कीडों की व्‍यवस्‍था में पूरे दमखम के साथ लग गए (फ्रांको ने स्‍पेन का फिल्‍म स्‍कूल बंद करवा दिया था, चुनांचे पेद्रो को खुद से ही शिक्षित होना था). तनख्‍वाह से सुपर 8 का कैमरा खरीदकर अपने प्रयोग शुरु किये, छोटी फिल्‍में बनाईं, और ढेरों बनाईं. उसको घूम-घूमकर मैड्रिड के बार और कफै में दिखाते. जल्‍दी नाम कर लिया. 8 से 16 में शिफ्ट हुए, और फिर अपनी दोस्तियों के जुगाडू कौशल से बडी फीचर्स की दुनिया में.

अलमोदोवार की पहली बडी फिल्‍म 1980 में बनकर तैयार हुई- पेपी, लुची, बॉन एंड अदर वुमेन ऑन द हीप. फिल्‍म ने खुलकर अपने समय की सांस्‍कृतिक और यौन स्‍वतंत्रता को जगह दिया. किच और प्रोवोकेशन के उस्‍ताद अलमोदोवार ने खुराफाती ह्यूमर और भडकाऊ सैक्‍स के इस्‍तेमाल से तत्‍काल अपनी एक कल्‍ट फॉलोइंग खडी कर ली. नंगे इमोशंस और जानलेवा इच्‍छाओं के बीच फंसी पहचानों को लिये घूमते चरित्रों की यह रंग-बिरंगी दुनिया धीरे-धीरे और मंजती और परिष्‍कृत होती गई. पेपी, लुची से शुरु हुई कडी में अबतक सत्रह फिल्‍में और जुडी हैं. थोडी बहुत आंख खुली रखनेवाले बंधुओं को 1999 में ‘ऑल अबाउट माई मदर’ के ऑस्‍कर की याद होगी. उसके बाद अलमोदोवार ने सेंसेशनल ‘टॉक टू हर’ बनाई, ‘बैड एजुकेशन’ की सिक्रेट, डिस्‍टर्बिंग दुनिया रची, और अभी पिछले वर्ष पैनेलुप क्रुज के स्‍पानी सिनेमा में पुनर्वापसी के मीडियाई हो-हल्‍ले के बीच धीमी, सुलगती ‘बोल्‍वर’ तैयार हुई.

ऊपर अपने चहेते एक्‍टर गायेल गार्सिया बेरनाल के साथ अलमोदोवार

अलमोदोवार पर विशेष सामग्री के लिए यहां देखें.

2/09/2007

बेरनार्दो बेर्तोलुची की बदमाशियां

पारमा के उच्‍च-मध्‍यवर्गीय परिवार में जन्‍मे बेरनार्दो के पिता अतिल्‍यो बेर्तोलुची जाने-माने कवि, पुरातत्‍वविद् और कला इतिहासकार थे. गाहे-बगाहे फिल्‍मों पर भी लिखा करते. माहौल का असर था, बेरनार्दो ने भी पंद्रह की उम्र में कवितायें लिखनी शुरु कर दीं, और जल्‍दी ही अपनी पहली किताब पर प्रेमियो वियारेज्‍यो जैसा बडा ईनाम भी जीता. मगर साहित्‍य बेरनार्दो का तक़दीर नहीं होनी थी. वह भाग-भागकर पैरिस के सिनेमाथेक जाते. सिनेमाथेक के जादुई नशे में डूबे रहते. उस संसार का गहरा अध्‍ययन कर सकें इसके लिए उन्‍होंने फर्राटे से फ्रेंच बोलना सीखा.


बडे कवि व मार्क्‍सवादी पसोलिनी अपनी पहली फिल्‍म अक्‍कातोने की तैयारियों की जोड-तोड में लगे हुए थे. पिता की साहित्यिक मित्रता बेरनार्दो के काम आई. पसोलिनी का पहला उपन्‍यास छपवाने में अतिल्‍यो की भूमिका रही थी. पसोलिनी ने उस ऋण को उनके बेटे को अपनी पहली फिल्‍म का असिस्‍टेंट रखते हुए उतारा. और शुरु हो गया बेरनार्दो का सफर. वह रोम विश्‍वविद्यालय में आधुनिक साहित्‍य की पढाई कर रहे थे. बेरनार्दो ने वह पढाई बिना स्‍नातक हुए छोड दी और 1962 में, महज 21 वर्ष की उम्र में अपनी पहली फीचर ‘ला कोम्‍मारे सेक्‍का’ निर्देशित की. यह अपेक्षाकृत आसान एक छोटी मर्डर मिस्‍ट्री थी, बेर्तोलुची की तरफ लोगों का असल ध्‍यान उनकी अगली फिल्‍म ‘प्रिमा देल्‍ला रेवोल्‍युत्‍ज़ोने’ (बिफोर द रेवोल्‍यूशन) के साथ गया (1964). इटली में एक से बढकर एक दिग्‍गजों के बीच किसी कमउम्र नौजवान का अपनी पहचान बनाना टेढी खीर थी, लेकिन बेर्तोलुची की वैचारिक बेचैनियों व फ़ॉर्म की विविधता ने बडे फलक पर उनका रंग जमाना शुरु किया.

1970 में बेर्तोलुची की दो फिल्‍में प्रदर्शित हुईं. पहली ‘द स्‍पाईडर्स स्‍ट्रैटेजेम’ बोर्खेस की रचना पर आधारित थी, तो दूसरी मोराविया की कहानी पर (द कन्फर्मिस्‍ट). दोनों अपनी बुनावट की जटिलता और कौशल में चौंकानेवाली फिल्‍में थीं. द कन्‍फर्मिस्‍ट में वित्‍तोरिया स्‍तोरारो का कैमरा जिस सघनता और स्‍केल पर तीसरे दशक की फासिस्‍ट इटली की अंदरुनी व बाहरी परतों को पकडता है, वैसे चाक्षुष अनुभवों से पहले लोगों का साबका नहीं पडा था. इस फिल्‍म ने एक सिनेमाटॉग्राफर स्‍टार पैदा कर दिया था. स्‍तोरारो और बेर्तोलुची की अगले दो दशकों तक रही और इस जोडी ने कुछ बहुत ही विशिष्‍ट सिनेमाई अनुभवों को साथ-साथ रचा.

लास्‍ट टैंगो ईन पैरिस’ दो साल बाद 1972 में आई. ज्‍यादातर बंधुओं के बीच यह फिल्‍म सैक्‍स के अपने विशद चित्रण के लिये जानी जाती है, मगर कम लोग जानते होंगे कि इस फिल्‍म ने बेर्तोलुची को साईकोअनालिस्‍टों के बीच कितना पॉपुलर किया था. भयानक परिस्थितियों में पत्‍नी की मौत के बाद इस फिल्‍म का नायक पॉल एक गुमनाम से सैक्‍सुअल रिश्‍ते में जीवन के अर्थ तलाशता है. मार्लन ब्रांडो के बहुतेरे चहेतों के लिये अब भी पॉल उनके करियर का सबसे बेहतर रोल है. लास्‍ट टैंगो के प्रदर्शन के दौरान सैक्‍स दृश्‍यों की वजह से ढेरों दिक्‍कतें हुईं. चर्च नाराज़ था, सरकार नाराज़ थी, तो दूसरी ओर अपने खेमे के चहेते फिल्‍मकार को इस कदर भटकता देख मार्क्‍सवादी बंधु भी बहुत प्रसन्‍न नहीं थे. मगर सैक्‍स और राजनीति की चाशनी बेर्तोलुची का खास मसाला रही है, और प्रोवोकेशन से उन्‍होंने कभी बचने की कोशिश नहीं की. लास्‍ट टैंगो की पूरी बुनावट- संपादन, कैमरा-वर्क, एक्टिंग, संगीत- सभी फिल्‍म मेकिंग के पारंपरिक प्रतिमानों को लगभग नकारती-सी खुद को रचती है.

इटली में पारंपरिक बैकिंग का आसरा छोड फिल्‍म की नींव बडी हस्तियों को साथ लेकर मजबूत करने की लीक भी बेर्तोलुची ने ही डाली. लास्‍ट टैंगो की मार्लन ब्रांडो व मारिया स्‍नाईडर वाली बडी कास्टिंग में मास्सिमो जिरोत्‍ती सिर्फ इकलौते इतालवी नाम थे. अगली फिल्‍म ‘1900’ में यह जलवा और परवान चढा. बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों की इतालवी देहातों में सामंती दबदबे को दर्शानेवाली इस फिल्‍म में ज्‍यादातर किरदार हॉलीवुड के बडे नाम बर्ट लैंकास्‍टर, डोनाल्‍ड सदरलैंड और रॉबर्ट डी’नीरो सरीखे स्‍टार निभा रहे थे. फिल्‍म में भावुकता और मजमेबाजी ज्‍यादा और राजनीतिक गहराई कम थी. यह सिलसिला आगे भी ज़ारी रहा. 1987 में ‘द लास्‍ट एम्‍परर’ और 1990 में ‘द शेल्‍टरिंग स्‍काई’ दोनों सिनेमाई अर्थों में भव्‍य फिल्‍में थीं (एम्‍परर को ऑस्‍कर में नौ अकादमी पुरस्‍कारों के लिए नामांकित किया गया था, उसने सारे ईनाम जीते), मगर बेर्तोलुची के सिनेमा से मोहब्‍बत करनेवालों को लगता था जैसे कुछ उनकी धार मिसिंग है.

बाद के वर्षों में बेर्तोलुची ने ‘लिटिल बुद्धा’, और ‘स्टिलिंग व्‍यू‍टी’ जैसी किशोर प्रेम कथा बनाई. 2003 में ‘द ड्रीमर्स’ के साथ फिर से साठ के दशक में वापस लौटे, उसकी एक भावुक, सैक्‍सुअल पडताल की. 2007 में उन्‍होंने जुम्‍मा-जुम्‍मा अपनी नई फिल्‍म ‘बेल कांतो’ की घोषणा की है. उनकी लुभावनी शैली के पुराने दिवाने फिर बेसब्री से इंतज़ार करेंगे कि देखें, अबकी ऊंट किस करवट बैठता है.

ऊपर बायें कैमरे के पीछे बेर्तोलुची, दायें उनकी फिल्‍म 'द कन्‍फर्मिस्‍ट' का एक दृश्‍य.
बेर्तोलुची संबंधी किसी जिज्ञासा के लिये देखें: दुनिया के दिग्‍गज निर्देशक/बेर्तोलुची

2/06/2007

ओरहान पामुक के देश का फिल्‍मकार

यिलमाज़ गुने (1937-1984): थोडी उम्र बडे काम


सामाजिक द्वंद्वों की पडताल में जिनकी दिलचस्‍पी हो, और जिनके पास खोजने का कौशल हो, वे यिलमाज़ गुने की फिल्‍में ज़रुर खोजकर देखें. यह थोडा दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि डीवीडी की मार्फत फिल्‍मों की पहुंच जब जेन्‍युनली खोजक आत्‍माओं के लिए काफी हदतक आसान हो गई है, फिर भी चंद बडे फिल्‍मकार हैं जिन्‍हें लोकेट करना कुछ वैसा ही मुश्किल है जैसा पिछली सदी के शुरुआती दौर में छपनेवाले हिंदी के जासूसी उपन्‍यास!
गुने की फिल्‍मों में मणि रत्‍नम की मोहनेवाली सिनेमाटॉग्राफी नहीं मिलेगी. वह निहायत अनगढ, बहुत बार अमेच्‍यरिश होने का-सा भ्रम देती बिंबों में खुद को बुनती है. उनके किरदार झुग्‍गी-झोपडियों व शहर के भीड-भडक्‍कों में भटकते, नई खडी होती इमारतों के गिर्द टहलते आवारागर्दों-चोट खाये लोगों की दुनिया है जिनका अपनी पीछे छूटी जगहों से संबंध काफी उलझ-सा गया है और नई जगहें भी जिन्‍हें अपनाने से कतराती हैं.
गुने की खुद की कहानी भी सिनेमा के दिग्‍गजों की पारंपरिक कथाओं से बहुत मेल नहीं खाती. तुर्की के दक्खिन अदना शहर से लगे एक देहात के कुर्द परिवार में जन्‍मे यिलमाज़ ने अंकारा व इस्‍तान्‍बुल में कानून और अर्थशास्‍त्र की शिक्षा ली, मगर इक्‍कीस की उम्र पहुंचते-पहुंचते बंदे ने तय कर लिया था उसे जीवन में क्‍या करना है. यह उन दिनों की बात है जब तुर्की में सरकारी संरक्षण की युद्ध फिल्‍में, भारी मैलोड्रामा व नाट्य रुपांतरणों की भरमार थी. आतिफ यिलमाज़ जैसे चंद लोग थे जो स्‍टुडियो सिस्‍टम के भारी दबदबे के बीच सिनेमा को अवाम की जिंदगी की तक़लीफों से जोडने की कोशिशों में लगे थे, और इन प्रयासों से धीमे-धीमे एक अलग किस्‍म की तुर्की/कुर्दिश सिनेमा अपनी पहचान खडी कर रही थी. गुने ने इन्‍हीं आतिफ साहब का पल्‍ला पकडा, उनके यहां असिसटैंटी की, पटकथायें लिखीं, और फिर एक्टिंग के मैदान में कूद पडे. लोगों ने इस ‘बदसूरत सुलतान’ को पसंद करना शुरु किया, और यिलमाज़ साल में कुछ बीसेक फिल्‍में करते हुए जल्‍दी ही तुर्की सिनेमा के धर्मेंद्र बन बैठे. मगर इस आसान शोहरत का आनंद लेते रहने की बजाय गुने ने सन् पैंसठ में निर्देशक होने की ठानी, अडसठ तक उन्‍होंने अपनी एक प्रॉडक्‍शन कंपनी खडी कर ली थी, गुने फिल्‍मसिलिक.
उमुत (1970) दो मरियल घोडों व लॉटरी टिकट की उम्‍मीदों पर पांच बच्‍चों, बीवी और एक बूढी दादी का घर चलानेवाले एक असफल व्‍यवसायी की कहानी है जिसके चारों ओर कर्जदार बढ रहे हैं, और जो फिल्‍म के आखिर में घर-परिवार से भागे हुए बंजर मैदानों में दौडता दिखता है; हम धीमे-धीमे समझते हैं वह पागल हो गया है. उमुत में स्‍पष्‍ट: ईटली के ज़वात्तिनीदीसिका के सिनेमा की छाप थी.
इसके बाद की फिल्‍में थीं: आजित, आचि, उमतसुजलार. मगर सन् बहत्‍तर के बाद से गुने का ज्‍यादा वक्‍त सलाखों के पीछे बितना लिखा था. गिरफ्तारी और अट्ठारह महीनों की सज़ा एक दफा पहले भी हुई थी, 1961 में, तब आरोप एक ‘कम्‍युनिस्‍ट’ उपन्‍यास लिखने का था. इस बार सरकार उन्‍हें अराजक छात्रों को उकसाने का दोषी बता रही थी. गिरफ्तारी के समय गुने अपनी फिल्‍म ‘जावालिलार’ के प्री-प्रोडक्‍शन में लगे थे (1975), पहले की एक और फिल्‍म एनदिस (1974) अभी अधूरी पडी थी (जिसे गुने के असिसटेंट सेरिफ गोरेन ने पूरा किया. आनेवाले वर्षों में गोरेन व गुने के सहयोग के इस उलझे साथ ने काफी उत्‍पादक काम किये. सलाखों के पीछे गुने पटकथायें लिखते, फिल्‍म की विस्‍तृत रुपरेखा व उसकी फाईनल कटिंग डिज़ाईन करते, और गोरेन का काम बाहर उसे अंजाम देने का होता).
सरकारी नीतियों के फेर व एक आम माफीनामे की छांह में गुने जेल से छोडे गये लेकिन उन्‍हें तत्‍काल एक जज की हत्‍या के आरोप में धर-दबोचा गया. इस बार जेल की यह संगत लंबी होनेवाली थी. इसी दरमियान गुने ने सुरु (1978) और दुश्‍मन (1979) जैसी चर्चित पटकथायें लिखीं (दोनों ही फिल्‍में बाहर ज़ेकी ओकतेन ने निर्देशित कीं). सुरु के बारे में गुने ने अपने आखिरी इंटरव्‍यू में कहा था कि सुरु दरअसल एक तरह से कुर्द लोगों का इतिहास है, मगर मैं इसमें कुर्दी ज़बान तक का इस्‍तेमाल नहीं कर सकता था, क्‍योंकि कुर्दी ज़बान का इस्‍तेमाल करने का मतलब होता फिल्‍म के हिस्‍सेदार सभी लोगों को जेल की हवा खिलवाना!
1981 में गुने जेल से भागकर फ्रांस पहुंचे, जहां उनकी फिल्‍म ‘योल’ को बयासी में पाम दॉर से पुरस्‍कृत किया गया (पहले की तरह बाहर फिल्‍म की असल शुटिंग सेरिफ गोरेन ने की थी). फ्रांसीसी सरकार की मदद से सन् तिरासी में जाकर गुने को कैमरे के पीछे जाकर फिर दुबारा निर्देशन का मौका मिला. इस बार कहानी जेल में कैद बच्‍चों की लौमहर्षक कथा थी (दुवार, 1983). अगले ही वर्ष पेट के कैंसर ने इस रोमांचक, अनोखे जीवटवाले व्‍यक्तित्‍व की कहानी का पटाक्षेप कर दिया.

2/04/2007

कौन है काउरिसमाकी?

अब लगभग पचास की तरफ खींच रहे, आकि काउरिसमाकी की आप नज़दीक से तस्‍वीर देखें तो यही लगेगा जैसे कोई शराबी अपनी चौथी बोतल ढूंढता किसी गलत जगह पहुंच गया है. उनकी उंगलियों में सिगरेट कांपता रहता है, और आंखें मीडिया के किसी भी तमाशे से अपने को दूर बनाये रखने को छटपटाहट लिये अधमुंदी दिखती हैं. भले ही कान, बर्लिन व वेनिस जैसी जगहों पर काउरिसमाकी व उनकी फिल्‍मों को अपार स्‍नेह मिलता रहा हो.
आकि फिनलैंड जैसे छोटे उत्‍तरी युरोपीय देश से हैं जहां न तो कोई रमणीय लैंडस्‍कैप है या अदरवाईस ऐसी कोई खास चीज़ जिसके लिए वह मशहूर हो. बकौल खुद आकि, हेलसिंकी का सामान्‍य नज़ारा बर्फीली चादर की परत और सडकों पर एक सूनी उदासी की होती है. ऐसे में वहां कोई किस तरह की फिल्‍म बनाये. मगर इसी उदास दुनिया को आकि ने लगभग अपना ट्रेडमार्क-सा बना लिया. और सन् ईक्‍यासी से सालाना एक के एवरेज़ के साथ उनकी अब तक की छब्‍बीस फिल्‍में इन्‍हीं उदासियों की बहुरंगी कहानियां कहती हैं. उनके ज्‍यादातर किरदार निजी व सामाजिक दिक्‍कतों का शराब व अपने निहायत हयूमरस दार्शनिक वैचारिक बैसाखियों के सहारे पार पाने की कोशिश करते हैं, और बावजूद अस्‍वाभाविक, लगभग असंभव-सी स्थितियों के, उसे, कई बार, जीतते भी हैं (याद कीजिये शैडोज़ ईन पैराडाइज़, एरियल या फिर आई हायर्ड अ कंट्रैक्‍ट किलर जहां हताशा और अंधेरों की भरमार है, फिर भी आकि के चरित्र अपनी जिद व शिद्दत से अपने लिए रोशनी खडा कर लेते हैं. लेनिनग्राद काउबॉयज़ गो टू अमेरिका में एक बरबाद नमूनों का रॉकर्स बैंड फिल्‍म की शुरुआत में अपनी किस्‍मत आजमाने अमरीका निकलता है, जिसे न तो बहुत म्‍यूजिक की समझ है और न अंग्रेजी की, मगर फिल्‍म के आखिर में उन्‍होंने टॉप टेन के चार्ट में अपने लिये जगह बना ली है- अमरीका में नहीं, मैक्सिको में! प्‍यार भी आकि के चरित्र अपनी खास फिलसॉफिकल शैली में करते हैं. बदसूरती, पैसों का अभाव आकि के आशिकों को हताश व दीवार पर सिर तोडने को मजबूर नहीं करता. वे शराब और अपनी हार न माननेवाली जिजिविषा के सहारे धीमे-धीमे ठंडी, विरोधी स्थितियों को मात करते हैं) सरवाईवर्स के चुटीले व्‍यंग्‍य, सन् पचास के आस-पास का रॉक एंड रॉल का बैकग्राउंड व पिछले बीस वर्षों में यूरोप में हुए कुछ सबसे बेहतरीन काले-सफ़ेद फिल्‍मांकन के ठप्‍पे के साथ आकि का सिनेमा अपनी ठाठदार पहचान बनाता है.होटलों में बर्तन धोने, डाक पहुंचाने जैसे धंधों के साथ आजिविका चलाते हुए आकि ने थोडा वक्‍त फिल्‍म समीक्षा में भी हाथ आजमाया; उसके बाद बडे भाई मीका के साथ एक फिल्‍म प्रोड्क्‍शन कंपनी शुरु की (आकि की तरह भाई मीका भी फिल्‍मकार हैं, और उतने ही प्रॉलिफिक भी. हेलसिंकी में कहावत मशहूर है कि फिनलैंड में सन् अस्‍सी के बाद से अब तक की बनी फिल्‍मों की एक-चौथाई काउरिसमाकी भाईयों की देन है.). अपने किरदारों की ही तरह आकि मजबूत सरवाईवर हैं.

काउरिसमाकी बंधु संबंधी किसी जिज्ञासा के लिये देखें: http://www.sci.fi/~solaris/kauris
आकि की कुछ चुनींदा फिल्‍मों की समीक्षा के लिये यहां देखें: http://www.filmref.com/directors/dirpages/kaurismaki.html